फिल्म शकुंतला देवी : औरत का नाम जैसे-जैसे रोशन होने लगता है परिवार छूटने लगता है !

बच्चे अपनी मां को सिर्फ मां के रूप में देखते हैं, क्या मां एक औरत नहीं ?
एक बच्ची अपनी मां से चिढ़ती है क्योंकि वह पितृसत्तात्मक समाज की चुप रहने वाली कमज़ोर मां है। वह कभी नहीं बनेगी ऐसी कमज़ोर मां।
“मैं एक बड़ी औरत बनकर दिखाउंगी” – का प्रण करने वाली वह सचमुच एक दिन सफलता के शिखर पर पहुंचती है और अपनी माँ जैसी नॉर्मल मां नहीं “डिफरेंट मां” बनती है। तरक्की करके वह विश्वविख्यात हो चुकी है, गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में उसका नाम दर्ज हुआ है- ह्यूमन कंप्यूटर शकुंतला देवी।
शकुंतला देवी के सपने बहुत बड़े हैं उसके आगे बेटी अनु के सपने छोटे हो जाते हैं, माँ की ख्याति तले बेटी का वजूद दब जाता है। बेटी को नहीं चाहिए मशहूर मां उसे तो बस एक नॉर्मल मां चाहिए दूसरे बच्चों जैसी। उसे अपनी मां से चिढ़ हो जाती है और यह चिढ़ नफरत की हद तक पहुंच जाती है।

“शकुंतला देवी” के नाम से बनी बायोपिक में माँ बेटी के संवेदनशील रिश्ते के साथ नारी विमर्श को बहुत सशक्त ढंग से पिरोया गया है। फिल्म बहुत से सवाल उठाती है —

-औरत का नाम जैसे-जैसे रोशन होता जाता है परिवार क्यों छूटने लगता है ?
-औरत प्रेमी के सामने बहुत बड़ी हो जाए तो वह उसे क्यूँ छोड़ देता है ?
– सुलझे हुए पति को भी पत्नी का ‘ स्टेपनी’ बनना मंजूर नहीं, अगर पति के लिए पत्नी अपना करियर छोड़ सकती है तो पति अति कामयाब पत्नी के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकता?
-अपने करियर में महिला कितनी भी कामयाब हो निजी जीवन में परफ्केट हुए बिना उसे सफल नहीं माना जाता। क्या औरत के लिए परफेक्ट पत्नी या मां होना ही उसका मापदंड है ?
-बच्चे अपनी मां को ‘अच्छी मां’ के खांचे के बाहर क्यों नहीं देखना चाहते ?
एक असाधारण रूप से कामयाब अकेलेपन की शिकार शकुंतला देवी अपने अहं के कारण अपनी मां से दूर हो जाती है फिर बेटी के प्यार को तरसती है। फिल्म के अंतिम संवाद में अच्छी मां न बन पाने की उसकी पीड़ा को उकेरा गया है-
“हर मां चाहती है कि उसकी बेटी उसे मां नहीं कभी-कभी ‘जीनियस’ की तरह भी देखे।”

फ़िल्म का सुखांत सुकून देता है।
लेखिका और निर्देशक के रूप में अनु मेनन का पहला प्रयास काबिले तारीफ़ है। विद्या बालन का शानदार अभिनय फिल्म की जान है। सान्या मल्होत्रा ने अनु के किरदार को शिद्दत से निभाया है।
हर पुरुष और हर बेटी को यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए।

भावना शेखर की वाल से

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