कपिलाजी की मंद-मंद मुस्कान को स्मरण करते हुए उन्हें विदा का प्रणाम

डॉ कपिला वात्स्यायन के निधन पर कुछ कहते नहीं बन पड़ रहा। यों उन्होंने कमोबेश पूरा (वे 92 साल की थीं) और सार्थक जीवन जिया। कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान पर बहुत कुछ कहा गया है। संस्थाएँ खड़ी करने पर भी। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र उन्हीं की देन है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आइआइसी) को सांस्कृतिक तेवर प्रदान करने में उनकी भूमिका जग-ज़ाहिर है। इतने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजन मैंने आइआइसी में देखे-सुने कि उससे दिल्ली के अलग दिल्ली होने का अहसास होता था।

जयदेव कृत ‘गीत-गोविंद’ पर अपने शोध और भरत के नाट्यशास्त्र के विवेचन से बौद्धिक हलकों में उन्होंने नाम कमाया। पारंपरिक नाट्य परंपरा पर भी उन्होंने विस्तार से लिखा है। बाद में उन्होंने शास्त्रीय और लोक दोनों नृत्य शैलियों पर काम किया। मूर्तिकला — ख़ासकर देवालयों में उत्कीर्ण नृत्य-मुद्राओं — का उनका गहन अध्ययन सुविख्यात है। साहित्य और चित्रकला के नृत्य विधा से रिश्ते पर भी उन्होंने शोधपूर्ण ढंग से लिखा है। सांसद के नाते उन्होंने कई बार राज्यसभा में पुराने वास्तुशिल्प और मंदिरों की मूर्तिकला को सहेजने का सरोकार ज़ाहिर किया।

मुझे उनका निजी स्नेह हासिल था। एक बार अनिल बोर्दिया जी ने संकेत किया था कि अज्ञेयजी का ज़्यादा ज़िक्र कपिलाजी के सामने न छेड़ बैठना। दरअसल अज्ञेय की शादी पहले 1940 में संतोष मलिक से हुई थी। दिल्ली में लेखिका सत्यवती मलिक (कपिलाजी की माँ) का लेखक समुदाय में बड़ा दायरा था। वह शादी चंद रोज़ में टूट गई। संतोष की शादी बाद में अज्ञेय के सहपाठी रहे फ़िल्म अभिनेता बलराज साहनी से हुई। दस साल बाद रेडियो में काम करते हुए संतोष की भतीजी कपिला मलिक से अज्ञेय की घनिष्ठता हुई और कुछ समय बाद विवाह। फिर वे भी अलग हो गए।

बहरहाल, बोर्दियाजी की सलाह पर मैं कुछ समय ही सावधान रहा। फिर वह सीख बिसरा गया। अच्छा ही हुआ। पाया कि कपिलाजी के मन में, आम धारणा के विपरीत, अज्ञेयजी के प्रति अब कटुता नहीं है। संबंध-विच्छेद के दौर में लोगों ने जो देखा-सुना, उससे धारणा बनी होगी। जबकि 2011 में अज्ञेय जन्मशती मनाई गई तो वे साहित्य अकादेमी में अज्ञेय रचनावली के लोकार्पण में शामिल हुई थीं। मैंने ‘अपने अपने अज्ञेय’ के संपादन के दौरान जो-जो सहयोग माँगा, उन्होंने दिया। सिवाय स्वयं कोई संस्मरण लिखने के। सुख-दुख के इतने लम्बे साथ पर क्या लिखतीं, क्या नहीं!

उन्हें पहले-पहल मैंने अज्ञेयजी के अंतिम संस्कार में देखा था, निगम बोधघाट पर। तब वे बड़ी अधिकारी थीं। दूरदर्शन उनके अधीन था। फूट-फूट कर रोते वक़्त दूरदर्शन का कैमरा उनकी ओर हुआ तो उन्होंने ग़ुस्से से उसे परे धकेल दिया। घाट से पहले वे अज्ञेयजी के घर भी गई थीं। इला डालमिया ने उन्हें फ़ोन कर निधन की सूचना दी थी।

संस्कृति के बौद्धिक परिवेश में कमलादेवी चट्टोपाध्याय, रुक्मिणी देवी अरुंडेल और कपिला वात्स्यायन की एक विदुषी-त्रयी बनती है। कल अंतिम कड़ी भी टूट गई। पता नहीं, एक साथ ऐसा समर्पित समूह अब कब अवतरित होगा।

कपिलाजी की मंद-मंद मुसकान को स्मरण करते हुए उन्हें विदा का प्रणाम।

वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक रहे

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