भारतीय किसानी में नये कार्पोरेट जमीदार पैदा करने की कोशिश, एक दिन सरकार के लिए ही भस्मासुर साबित होगी..?

@ अरविंद सिंह
यह भारतीय किसानी का निजीकरण के बहाने कार्पोरेटे के हवाले करने का विधेयक है या सदियों से मौलिक और भारतीयता की मूलाधार रही किसानी को, उसके मूल चरित्र में ही बदलाव कर देने का कानून? आखिर मोदीराज के इस नये विधेयक का विरोध देश का किसान और नौजवान क्यों कर रहा है.कृषक मजदूर और विशेषज्ञ भी इसके खिलाफ क्यों जा रहें है. आखिर विरोध के इस कड़ी में मोदी कैबिनेट की सदस्य और पंजाब की शिरोमणि अकाली दल की नेत्री, सियासी बादल खानदान की बहु हरसिमरत कौर ने इस बिल के विरोध में इस्तीफा तक क्यों दे दिया. इस पर विचार भी कभी मोदी सरकार ने किया. सरकार के अनुसार अगर किसानों के जीवन में बेहतरी के लिए यह कानून बनाया जा रहा है तो इसको लेकर देशभर में बहस क्यों नहीं चलायी गयी, और कम से कम भारतीय किसानों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया. क्या इस कानून के परिणाम की कल्पना सरकार ने किया है, यदि हां, तो फिर देशभर में पढे़ लिखे किसानों और मजदूरों के साथ साथ आम भारतीयों को भी इस बिल के विरोध में क्यों उतरना पड़ रहा है.यह सवाल है.
दुनिया में इंसानियत की बसावट के बाद इंसान ने जीवन जीने के लिए पहला जो हुनर और उद्यम सिखा, वह खेती और किसानी थी. सभ्यताओं के विकास और खानाबदोश जीवन को स्थायित्व प्रदान करने वाली यही किसानी, उसे नागरिक के तौर पर और नागरिकता के मूल चरित्र को विकसित करने की आधार बनी थी, तो क्या एक बार फिर इंसान को खानाबदोश बनाने की तैयारी चल रही है. तो क्या एक बार फिर जमीदारी प्रथा को खत्म कर चुके इस महादेश में, नये जमीदारों को पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जो सिर्फ खेती और उसकी उपज को ही नियंत्रित नहीं करेगा, बल्कि किसान के समूचे अस्तित्व को ही नियंत्रित करने की अदृश्य ताकत से लैश होते जा रहा है. कृषि विशेषज्ञों की माने तो मोदी सरकार का नया कृषि विधेयक ऐसी ही परिस्थितियों को जन्म देगा. जहाँ धरती को मां और अपनी जीवन का आधार समझने वाला किसान और उसकी स्वतंत्र जिंदगी रेहन पर चलने जा रही है. उसे क्या बीज उगाने हैं, क्या पैदा करने हैं और किसे, किस कीमत पर बेचने हैं, उसे भी नियंत्रित किया जाएगा. इस देश की कृषि मंडियां सरकारी खर्चे पर भले बनी एक हाट भर हों, लेकिन किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य, उपज उगाने, बेचने, परिवहन आदि की आज़ादी देती एक स्वतंत्र और स्वायत्त इकाई हैं. लेकिन इस कानून के आने के बाद, इन कृषि मंडियों पर निजीकरण और कार्पोरेट की जमीदारी हो जाएगीं, और निजी कंपनियां इस देश के किसानों के लिए नये जमीदार बन जाएंगे.
इस देश में आवश्यक वस्तु अधिनियम एक सशक्त कानून है, जिसके अंतर्गत हर आवश्यक वस्तु के भंडारण, वितरण, और जमाखोरी पर सरकार का नियंत्रण और समन्वय है, इस कानून के आने के बाद पुराने कानून शिथिल हो जाएगें, और नये जमीदार, कृषि उपज और आवश्यक वस्तुओं को किसानों से औने पौने दाम में खरीद कर जमाखोरी करेगा, और जितना चाहें कर सकेंगा, कोई नियंत्रण न तो सरकार का होगा, और नही किसान का, वही यह कंपनी भंडारण के बाद, ऊंचे दामों पर कृषि उत्पाद को बेचेंगी. और वही किसान ऊंचे दामों पर खरीदने पर विवश होगा. रिलायंस फ्रेस जैसी कंपनियों का विस्तार होकर अडानी और अंबानी सरीखे बड़ी बड़ी कंपनियां नये साहूकार और ज़मीदार बनके इस देश के कृषि का भाग्य विधाता बन जाएगीं. और सरकार नामक संस्था कृषि जैसी मौलिक और प्राचीन भारतीय पेशे में निजीकरण लाकर कार्पोरेट के हाथों सौंपना क्यों चाह रही है. वह भी तब जब अर्थव्यवस्था की इतने बुरे दौर में यही कृषि क्षेत्र ने उसे संभाला भी है. हमारे कृषि और उसकी मौलिकता पर एक बात कही जाती है कि आखिर मुगल और फिर बाद में अंग्रेज हमारी कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नष्ट क्यों नहीं कर पायें, – एक बार की बात है, शायद मध्यकालीन भारत के समय दो राजाओं के बीच में युद्ध चल रहा था, सेनाएं आपस में लड़ रही थीं, लोग मर और मार रहे थें. लेकिन वहीं बगल में किसान हल चल रहा था. जिस राज्य में किसान हल चला रहा था, उस राज्य का राजा परास्त हो गया और दूसरे राज्य के राजा का आधिपत्य इस राज्य पर हो गया, तब विजित क्षेत्र के विस्तार को लेकर विजेता राजा के मंत्री ने उस किसान से बोला, जो अब भी खेत जोतने में ही मग्न था कि- तुम्हारे राजा हार गयें, अब यह खेत और राज्य हमारे राजा का हो गया है, तुम्हे डर नहीं लग रहा है, तो किसान ने उत्तर दिया, हे मंत्री वर! हमें क्यों डर लगेगा, पहले हम अपने राजा को लगान देते थें, अब नये राजा को, तब भी हम कृषि कार्य करते थे, आज भी हम कृषि कार्य ही करेंगे. “कोई नृप होई हमे का हानि..” हमारा मूल पेशा और चरित्र तो किसानी ही है, यानि इस देश की किसानी के साथ छेड़छाड़ न तो मध्यकाल में हुआ और नहीं उसके पहले प्राचीन काल में. अंग्रेजों ने जरूर हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विनष्ट करने के लिए इसके चरित्र में परिवर्तन करने की कोशिश की. बावजूद हमारी कृषि ने हमारे देश को हर बार संभाला.
कल्पना करिए जिस भारतीय कृषि में 52 फीसदी किसानों पर कर्ज हो,जिस देश का 82 फीसदी कृषि और कृषि आधारित उद्यम देश को रोजगार देता हो, भारत की आत्मा जिन गांवों और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर जीती हो, उसे कार्पोरेट की रखैल बनाने की सरकारी कोशिश इस देश में नये आंदोलन की जमीन तैयार करेगा और आने वाले दिनों में निजीकरण के विरुद्ध एक जनज्व़ार उठेगा. यदि सरकार अब भी नहीं चेती तो, देश का किसान और नौजवान देश की कृषि और रोजगार बचाने के लिए सड़कों की एक एक पग नाप कर दिल्ली तक पहुँच जाएगा. अगर यह दृश्य नही दिख रहा है तो मान लिया जाएगा कि मोदी सरकार घोर तंद्रा में है.

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