नारी सौन्दर्य: साहित्य का नहीं फिल्म और विज्ञापन का विषय है

– गुंजेश्वरी प्रसाद
बहुत वर्ष पहले दो बहुचर्चित नायिकाओं ने आपस में बातचीत की। बातचीत करने वाली दोनों नायिकाएं रेखा और शबाना आजमी थीं। पत्रकार के रूप में रेखा ने शबाना आजमी से कहा कि सुन्दर तो मैं हूँ लेकिन दिखने में तुम सुन्दर दिखती हो। रेखा ने शबाना आजमी को उसके सौन्दर्य से उसे अवगत कराया। इसी आन्तरिक और उद्देश्यपूर्ण सौंदर्य को आगे चलकर सुष्मिता सेन ने अपने जवाब से प्रासंगिक बनाया। 1994 में जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बनी तो उसने कहा था कि वह देश की सांस्कृतिक राजदूत बनना चाहती थी। स्त्री सौंदर्य की परिकल्पना हमारे यहां ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ को थी और यही साहित्य की भी रही है, जो अब कालीदास और बिहारी का विषय नहीं रहा।
आज परिभाषाएं बदल गयी हैं। सौन्दर्य की भी परिभाषा बदली। विज्ञापन के युग में सौन्दर्य का प्रदर्शन विज्ञापन से जुड़ गया है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सौन्दर्य की आवश्यकता है। सिनेमा जगत् में भी मर्मस्पर्शी अभिनय करने वाली अभिनेत्रियों ने अपने सौन्दर्य के जलवों से एक विशेष जगह बनायी जो रेखा और शबाना आजमी की बातचीत से स्थापित होती है, परन्तु सांस्कृतिक राजदूत बनने की इच्छा रखने वाली सुष्मिता सेन भी मिस यूनिवर्स बनते ही विज्ञापन के बाजार में खो गयीं और ‘वन्उर विंगस’ जैसे विज्ञापनों के जरिए धन की कमाई में लग गईं। दूसरी तरफ फिल्मों में काम करने की ललक को पूरा करने की शुरुआत भी महेश भट्ट की फिल्म ‘दस्तक’ से शुरू हो गयी। 15 वर्ष पूर्व जब ‘मिस इण्डिया’ बनी तभी सुष्मिता ने कहा था कि महेश भट्ट अपनी फिल्म में काम करने का आॅफर देंगे तो वह फिल्मों में काम करेंगी। महेश भट्ट जैसे प्रबुद्ध निर्माता की फिल्म ‘दस्तक’ देखने से समझ में नहीं आता कि उनकी फिल्म का मकसद क्या था? हां यह तय था कि ‘मिस यूनिवर्स’ के माध्यम से निर्माता को आर्थिक लाभ काफी होने वाला था और सुष्मिता सेन को मिले पूर्व अर्जित सम्मान को धूमिल भी करना था।
उद्देश्यों से भटक जाने की मिसालों के चलते ही कुछ वर्ष पूर्व में हुई विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता का विभिन्न स्तरों पर विरोध हुआ। यह मानना बिल्कुल जायज है कि इन आयोजनों के घोषित उद्देश्यों का आगे चलकर कभी पालन नहीं होता। इस ायोजन का विरोध करने वाले जरूर राजनीति से प्रेरित थे। अरबों की धनराशि व्यय होने के बाद कुछ सीमित दायरे तक ही लाभ की स्थिति दिखाई पड़ती है और इस तरह के आयोजन के परिणामों की सफलता भी विज्ञापनों की दुनियां और सौंदर्य सामग्री के धंधे को बढ़ाने तक ही है। सौंदर्य प्रतियोगिताएं भी इसीलिए आयोजित की जाती हैं।
पूर्व माॅडलों से बनी ‘मिस इण्डिया’ युवतियों का दायरा भी विज्ञापन और फिल्मों में पदार्पण और उसके बाद फिल्म फ्लाप हो जाने का इतिहास भी उनका रहा है। 1960 की ‘मिस इण्डिया’ लीला नायडू से लेकर अब तक भारत की मिस इण्डिया युवतियों में जीनत अमान, मीनाक्षी शेषाद्रि, जूही, संगीता बिजलानी जैसा नाम ही फिल्म अभिनय के क्षेत्र में अपनी थोड़ी बहुत पहचान बनाने में सफल हो सका है।
क्यों ऐसा होता है? खिताब जीतने के बाद फिल्मों और विज्ञापनों से अपने को जोड़ देना ही विजयी सुन्दरियों को अपने सौंदर्य के प्रदर्शन का मकसद धन कमाना हो जाता है, जबकि बौद्धिक परीक्षा के दौरान सुखद दुनिया का सपना, सांस्कृतिक विधाओं के प्रति आस्था बच्चों से लगाव और मदर टेरेसा, लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू, सिस्टर निवेदिता, एनी बेसेन्ट, कस्तूरबा गांधी, सुचेता कृपालानी, अरुणा राय और मेधा पाटेकर जैसी शख्सियत बनने की इच्छा जताकर नम्बर वन का ताज हासिल किया जाता है। सफल होने के बाद वे सभी मकसद शून्यता में परिणित हो जाते हैं। वे सिर्फ विज्ञापन या सिनेमा के बाजार का सबसे ताजा सामान बनकर बिकने लग जाती है।
सौन्दर्य की परिभाषा में आज उद्देश्यपूर्ण सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति की झलक हमारे समाज के कई क्षेत्रों में दिखती है मगर आर्थिक लाभ की गुंजाइश कम दिखने के कारण उस तरफ उपेक्षा है। मिसाल के तौर पर हमारे समक्ष किरण बेदी, मेधा पाटेकर, अरुणा राय, अरूधन्ती राय जैसी अन्य और सिनेमा जगत में अभिनय के अलावा सामाजिक कार्यों से जुड़ी शबाना आज़मी, जैसी महिलाएं भी हैं जिनका स्वस्थ सौन्दर्य खास उद्देश्यों से जुड़ा है। इन जैसों को सौंदर्य के खिताब दिये जायें, तो विरोध होगा ही नहीं, शायद ही कोई विरोध होगा। .
सुन्दर दिखने की चाहत अब हर किसी में बढ़ गयी है। सुन्दर बनने की फिराक में कई कठिन उपायों को करने की आज होड़ लग गयी है। बाजार में भारी तादाद में बहुत जल्द ही सुन्दर बनने का दावा करने वाली संस्थाएं हेल्थ सेंटर ब्यूटी के रूप मंें काम कर रही हैं। विदेशों में इनकी संख्या अधिक है। प्रत्येक सेंटर का अपना अलग-अलग दावा है, जो जल्द सुन्दर और फिटनेस चाहता है। वह अधिक धन व्यय करके इसे प्राप्त कर सकता है। इन हेल्थ सेंटरों में दवा देकर और कृत्रिम तरीकों से वजन कम किया जाता है। इस प्रकार पूंजीवाद का भवन मुनाफा कमाने के लिए सौंदर्य को भी माल बनाकर बेंच रहा है।
यह सौन्दर्य के प्रति ग्लैमर और कम समय में ज्यादा धन को प्राप्त करने के तरीकों को अपनाने के परिणाम भी बहुत भयावह है। सुन्दर बनने के इन उपायों से बीमारियां, नशे की लत और मानसिक यंत्रणा तथा अपराध की प्रवृत्तियां बलवती हो रही हैं। ग्लैमर के प्रति बढ़ते लगाव से आज हमारे समाज में सरल जीवन की सार्थकता मृतप्राय हो रही है, जबकि पश्चिमी देशों में लोग इस पाशविक जीवन से मुक्ति पाने की राह तलाश रहे हैं। नारी सौंदर्य का जो प्रतिमान महारानी लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू, सुचेता कृपालानी और मेधा पाटेकर ने रखा है वही सत्यम् शिवम् सुन्दरम् को परिभाषित भी करता है।
सच तो यह है कि वास्तविक सौंदर्य उसे कहा जाना या माना जाना चाहिए जिसे कोई भी धन्ना सेठ खरीद न सके। महात्मा गांधी, विवेकानन्द, जयप्रकाश, डा.लोहिया, महारानी लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू, मदर टेरेसा, फ्लोरेंस नाइटिंगेल, सिस्टर निवेदिता और मेधा पाटेकर का सौंदर्य ऐसा है जिसमें सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का वास है और ऐसे सौंदर्य को कोई बिल गेट्स या लक्ष्मी मित्तल नहीं खरीद सकता है। फिल्म अभिनेत्री रेखा ने इसी उद्देश्य से शबाना आज़मी से अपनी बात कहा था।

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