मुद्दा : लखनऊ और दिल्ली की आती-जाती सरकारों से हर बार छला गया पूर्वांचल

पूर्वांचल को सभी सरकारों ने छला है..?

@ अरविंद कुमार सिंह

सन्-1947 से लेकर अब तक गंगा-यमुना, घाघरा,और तमसा में कितना पानी बह गया, यह किसी को क्या पता. उस वक्त पैदा हुई पीढ़ी, आज जवानी के बाद बूढ़ापे की ओर अग्रसर हो गयी है. समय की धारा में जब सब कुछ तेजी से बदलता गया. सियासत ने तकनीक और औद्योगिक विकास के ऊपर चढ़ कर आयी जवां उम्मीदों का सियासी तिजा़रत कुछ ऐसा किया कि-सब कुछ सियासी हो गया. उसने सपने बेचें और उन सुनहरे सपनों के सहारे हर बार अपने लिए सत्ता का सफ़र तय किया लेकिन इस आबादी की युवा सपनों को उड़ान भरने के लिए खुले और स्वछंद आकाश में आवारा छोड़ दिया. सियासत ने सब कुछ सियासी बना दिया. संवेदना और इंसानियत भी. और इसके सहारे उसने सबकुछ बदल कर रख दिया.. यहाँ तक कि मानस और मंशा भी..

         और अगर कुछ नहीं बदला तो उत्तर प्रदेश के पूरब का भाग्य और उसका भविष्य. सच कहें तो पूरब के पानी और पूरब की ज़वानी को सभी ने छला है. यहाँ की नौजवानी के साथ सभी ने छल किया है. क्या राष्ट्रीय , क्या क्षेत्रीय, सभी सियासी दलों ने बारी-बारी से पूर्वांचल की मेधा और सोच के साथ विश्वासघात किया है. सभी ने इसे अपनी सियासत की प्रयोगशाला बनाकर, इस जमीन को नेतृत्व विहीन और आवाज़ रहित बनाया है. सभी ने अपनी सियासी अस्तित्व के लिए यहाँ की मेधा और चिंतन के साथ साजिश किया. जाति-पात और धर्म के खांचे में बांट कर पूर्वांचल की समग्रता, सांस्कृतिक एकता और मौलिकता का कत्ल किया. यहाँ की आबादी और संसाधनों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया. यहाँ की औद्योगिक इकाईयों के साथ छल किया गया है.

सच कहें तो लखनऊ और दिल्ली की आती-जाती सत्ताओं ने केवल जाहिलों और मूर्खों का लोकतंत्र बना, इसे वोटबैंक भर समझा है और इसे कुछ-कुछ देकर टूकड़खोर बना दिया है, और बदले में इस महान समृद्धि वाली सरजमीं का सबकुछ छीन लिया है. तेवर-कलेवर और बागी़पन भी. सत्ता लोगों को टूकड़खोर कैसे बनाती है, इसका सबसे नायाब उदाहरण पूर्वांचल की जवानी और पानी की कहानी है.

  सबसे अधिक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री देने वाली धरती, सबसे अधिक अवतारी पुरूष और विद्वानों को देने वाली धरती बदलते दौर में औद्योगिक क्रांति और क्षेत्रीय विकास में त्रासद भरी कहानियाँ क्यों कहती है. इस सवाल का जवाब सत्तर साला लोकतंत्र में किसी के पास नहीं है. राम और बुद्ध की धरती अध्यात्मिक रूप से समृद्ध होकर आर्थिक और औद्योगिक रूप से बंजर क्यों बना दी गयी. यहां की प्रतिभा का पलायन और दोहन महानगरों में आखिर क्यों होता है. यहाँ रोजगार और व्यापार के अवसर क्यों सिकुड़ते जा रहे हैं. सरकारें हमारे संसाधनों और औद्योगिक इकाइयों को एक एक कर क्यों बंद करती जा रहीं है.

चीनी का कटोरा के नाम से प्रसिद्ध गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज में ही अकेले 26 चीनी मीलें थीं, आखिर ये औद्योगिक इकाईयां तिल-तिल कर क्यों मरती गयीं. आजमगढ़, मऊ, बलिया, गाजीपुर की चीनी उद्योग की क्या स्थिति है. गन्ना किसानों का बकाया भुगतान समय से क्यों नहीं दिया जा रहा है. मऊ की काटन मिल, गाजीपुर के बहादुरगंज की बंद काटन मिल आखिर कब तक चलेंगी. इलाहाबाद का फूलपुर और जौनपुर का सतहरिया का औद्योगिक विकास आखिर अपेक्षित ढंग से क्यों नहीं हो सका.

संसद में पहली बार पूर्वांचल की गरीबी, बेकारी और आर्थिक एवं भौगोलिक पिछड़ेपन को नेहरू काबिना में सन्-1963-64 के लगभग उठाने वाले गाजीपुर के विश्वनाथ सिंह गहमरी जैसा दूसरा नेता आखिर पूर्वांचल में क्यों नहीं पैदा हुआ. उसके बाद गठित पटेल आयोग की संस्तुतियां को आखिर लागू क्यों नहीं किया गया. आखिर उन सिफारिशों को संसद के तहखाने से निकाल कर उसे जनमानस के बीच सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया. आखिर इन सिफारिशों के अनुरूप पूर्वांचल का विकास क्यों नहीं किया गया. पूर्वांचल के पिछड़ेपन के लिए केवल सरकारें भर दोषी नहीं हैं बल्कि स्वयं पूर्वांचल भी है, वह केवल भीड़तंत्र का हिस्सा बनकर पार्टियों का गुलाम बनना स्वीकार कर लिया. उसने अपने समृद्ध अतीत से सिखने की बजाय सरकारों के मकड़जाल में फंसकर खाड़ी देशों और महानगरों की ओर पलायन शुरू किया, लेकिन सरकारों से सवाल नहीं पूछा कि- हमारे हिस्से का विकास कहाँ है. हम हमारी माटी छोड़ गरीबी के हिंद महासागर को पाटने के लिए कब तक बाहर जाते रहेंगे, कब तक मुम्बई और दिल्ली, हरियाणा को कंधों पर ढो़ते रहेगें, हम पूर्वांचल में ही दिल्ली और मुम्बई क्यों न बना लेते हैं. और अगर सरकारें ऐसा नहीं कर सकतीं हैं तो ये सरकारें क्यों हैं? आखिर हम उनका वोटबैंक भर बन कर क्यों रह जाएं . कबतक अपने परिवार और खेत-खलिहान से दूर जाकर रोजी रोटी कमाते रहेगें. गाजीपुर के ही लोककवि रामआधार त्रिपाठी सरस के शब्दों में पलायन में विरह की जो असीम पीड़ा है उसे अभिव्यक्त भोजपुरी के इन शब्दों में किया गया है-

“रहि गइनीं रहियां में अंखियां अगोरतें,

घिसि गइलें अंगुरी के पोर/ 

कौउन बरन बाटें हमरों सनेहियां, 

नाहि जानि सांवर गोर.”

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