सवाल : अनपढ़ और जाहिलों को हम पढ़े लिखे चुनते रहेंगे और मूर्ख इस महान लोकतंत्र की विधायिका में कानून बनाएंगे

साहित्य और सियासत के बीच समाज कहाँ खड़ा है ?

@ अरविंद सिंह
यह सवाल कितना गंभीर और मौजूं है कि- हमारी सामाजिक सत्ता पर सियासत जिस प्रकार से हावी होती जा रही है और साहित्य की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है, जीवन के हर रंग और अवस्था में सियासत का दखल बढ़ता जा रहा है तो क्या उससे पूरा समाज एक दिन सियासी हो जाएगा. फिर जीवन मूल्यों का क्या होगा? क्या वे मूल्य हमारी सामाजिक चेतना में सियासत पर चढ़कर आ सकते हैं? तो फिर वही मूल सवाल कि- हमारी सियासत में आज मूल्य बचें कितने हैं, हम कितने मूल्य परक सियासत के पथगामी हैं, क्या लोकतंत्र का अपहरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ व्यभिचार ही सियासत के बचे खुचे नयें मूल्य हैं. क्या लूट, बलात्कार, लुच्चई और लोकतंत्र की चीख निकाल देने वाले उपक्रम ही हमारी सियासी मर्यादा की आखिरी पूंजी हैं. क्या भ्रष्टाचार और अनाचार से बटोरी संपत्ति और नवकुबेर ही हमारी राजनीतिक चेतना के रोल मॉडल बन गयें हैं. क्या पिछले तीन दशक में कोई ऐसा रेलमंत्री हुआ है, जिसने एक ट्रेन दुर्घटना पर अपनी विभागीय और लोक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया हो? क्या राजनीति में हमने शुचिता और आदर्श की कोई ऐसी नर्सरी तैयार की है, जो मूल्यविहीन नहीं बल्कि मूल्य परक सियासत को आगे बढ़ाए. जहाँ नैतिकता और विचार सत्ता उसका सियासी पूंजी निवेश हो और वैचारिक कार्यक्रम उसकी संजीवनी. क्योंकि हमारे लोकतंत्र ने ऐसे भी दिन देखें हैं. जहाँ चरित्र और नैतिकता इसकी मूल पूंजी रही है. क्योंकि इस देश और भूभाग पर लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी रही हैं. और वहीं से एक महान जनतंत्र की विरासत हम अपने कंधों पर ढोते चलें आएं हैं. यही हमारा राजनीतिक इतिहास रहा है. और यही हमारी राजनीतिक मूल्य.

दरअसल बदलते दौर में यांत्रिक जीवन और पूंजी केन्द्रित सोच ने हमारी मौलिकता और चिंतन प्रक्रियाओं पर जैसे अपहरण सा कर लिया है और नये जीवन मूल्य एवं नव आदर्श स्थापित किए हैं, जो दुर्भाग्य से जनमुखी न होकर सत्ता मुखी हो गयें हैं और भटकाव की स्थिति में हैं. इस भटकाव का कारण भी है.
क्या हमारी सियासत, कभी किताबों की दुनिया की तरफ भी जाती है, पिछले एक दशक में कितने दलों ने अपने नेताओं के लिए बौद्धिक प्रशिक्षण शाला चलाया. कितने नेताओं ने कितने साहित्य और किताबों का अध्ययन किया. कितने दलों ने अपनी वैचारिक नायकों और उनकी विचार सत्ता को पढ़ा और आत्मसात किया. कितने नेताओं ने पिछले एक दशक में कितनी खुबसूरत और शानदार फिल्में देखीं, कितने शानदार नाटकों और रंगमंचीय जीवन के रंग को करीब से देखा.कितनी बौद्धिक और साहित्यिक संगोष्ठियों में संवाद किया. कितने लिट्रेरी फेस्टिवल में संवाद और शिरकत किया. राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और इतिहास की कितनी किताबों को पढ़ा. सामाजिक अध्ययन का कितना अनुभव अर्जित किया है.
अगर इसमें से कुछ भी नहीं किया तो फिर ऐसे लोग सियासत का रोल मॉडल कैसे बन सकते हैं. क्या लूट और व्याभिचार से अर्जित धन संपत्ति और बनावटी इज्जत से सियासत में मूल्य स्थापित होगें. क्या ऐसे ही लोग हमारे नेता होगें, जो विधायिका में बैठकर हमारे लिए कानून बनाएंगे. फिर तो यह अनपढ़ और जाहिलों की फौज इस महान इतिहास वाले लोकतंत्र को मूर्खों का लोकतंत्र बना देगी और पढ़े लिखे लोग उन्हें चुनकर विधायिका में भेजते रहेंगे और इन प्रक्रियाओं से हर रोज सत्ता प्रतिष्ठान पर कब्जा जमाने वाले लोग मजबूत होते जाएगें, लेकिन लोकतंत्र कमजोर होता जाएगा.
दूसरे आज साहित्य समाज को दिशा क्यों नहीं देता दिखता है. क्या साहित्य के मूल्य समाज को प्रभावित नहीं कर रहे हैं? क्या आज कोई रामधारी सिंह दिनकर जैसा राष्ट्रकवि यह कहने की हिम्मत जुटा पाएगा कि -‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’
दरअसल, साहित्य शुरू से अपने समय की सत्ता के विपक्ष की भूमिका में रहा है। कुछ चारणकाल की कविताएं और सत्ता के लाभ-लोभ को समर्पित रचनाओं को यदि छोड़ दें, तो यह सत्ता और साहित्य का अंतर्विरोध सनातन है। हर समय की सत्ता का समीकरण धर्म, जाति, राष्ट्र आदि पर टिका रहा है, पर रचनाकार की भावभूमि इनसे परे, समस्त मानव समाज की बेहतरी के लिए समर्पित रहा है।
जहां सत्ता और उसकी राजनीति का विजन तात्कालिक और छोटा होता है, वहीं साहित्य का विजन व्यापक और दूरगामी होता है। यही कारण है कि सत्ता की साहित्य से अनबन हमेशा रहती है। इस संदर्भ में धार्मिक कट्टरवादिता और वैचारिक दुराग्रह भी साहित्य को रास नहीं आता है।हर युग के बड़े विचारकों ने इसे लक्षित भी किया है। कबीर से लेकर केदारनाथ सिंह तक और मीर से लेकर जान ऐलिया तक के रचना संसार इसकी तस्दीक करते दिखाई पड़ते हैं।
जब कबीर कह रहे थे कि- ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ’ या ‘सांच बराबर तप नहीं’ तो वे अपने समय की सत्ता के आधार पोथी और झूठ का क्रिटीक रच रहे थे। कुंभन दास के कहा कि ‘संतन को कहा सिकरी सों काम’, तो वे सत्ता को नकार रहे थे। अनायास ही नहीं, इस बात को केदारनाथ सिंह ने इसे समकालीन महत्त्वपूर्ण संदर्भ दिया- ‘संतन को कहा सीकरी सों काम/ सदियों पुरानी एक छोटी सी पंक्ति/ और इसमें इतना ताप/ कि लगभग पांच सौ वर्षों से हिला रही है हिंदी को।’
हर कवि-साहित्यकार अपने समय के सत्ता के विरुद्ध एक प्रतिपक्ष खड़ा करता दिखता है।

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