बंगाली फ़िल्म सप्तपदी का एक दृश्य याद आता है।

साल इकसठ की बंगाली फ़िल्म सप्तपदी का एक दृश्य याद आता है।
@सुशोभित
उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी। फ़िल्म में इनका नाम है कृश्नेंदु और रीना। ये कभी प्रेम में डूबे थे। फिर विलग हो रहे। जीवन अलग अलग दिशाओं में ले गया। कालान्तर में फिर एक मोड़ पर साथ लाया है। एक मिलिट्री हस्पताल में कृश्नेंदु चिकित्सक है, उसने रीना की सेवा-टहल की है। रीना को सुध नहीं थी, पर होश आते ही डॉक्टर को धन्यवाद कहने आई है।

डॉक्टर उसकी तरफ़ पीठ दिए बैठा है। ये वैसी ही पीठ है, जिसे यूनानी कवि यानिस रित्सोस ने मृतकों से लदी पहाड़ी कहा होगा। पूर्व प्रेयसी डॉक्टर को पुकारती है। वह उठ खड़ा होता है। सामने की दीवार पर एक दर्पण है। उसमें उसके चेहरे का बिम्ब उभरता है।

रीना उसकी एक झलक भर देखती है, जैसे स्मृति का रंगमंच कौंध आया हो। हस्पताल के समीप से एक रेलगाड़ी गुज़रती है। उसके दोलन से समूचा भवन कांपने लगता है। दीवार पर टंगा दर्पण भी तरंगायित हो उठता है। उसमें कृश्नेंदु का चेहरा कम्पन से भर जाता है। विकृत हो जाता है। आलोक और तिमिर का एक छायालोक सजीव हो आता है, जैसे चित्रपट चल रहा हो।

आत्मा के दोलन और हृदय के कम्पन को दिग्दर्शक इस रंगयुक्ति से साकार कर देता है।

किसी तीव्र प्रतीति का क्षण वैसे नाटकीय आवेग से ही भरा हो सकता है, जिसमें जीवन के आशय गुंथ जाएं।

धीरे-धीरे दृश्य स्थिर होता है। दर्पण में अब पूरी छवि मूर्तमान होती है। एक गम्भीर साधु मुखमण्डल। ये वही चेहरा है, जो कभी कमनीय था, मन में संजोया था- पूर्व प्रेमिका मन ही मन सोचती होगी- किंतु अब उस पर एक लम्बी यात्रा के चिह्न उभर आए हैं।

इस दृश्य से बहुत बहुत पहले इसी चित्रपट में इन दोनों ने स्वप्न और आकांक्षा के देश में एक गाना गाया था-

“एई पौथ जदीइ ना शेष होय, तोबे केमोन होतो तूमि बोलो तो…” (“यह राह अगर अनंत हो जाए, तो तुम बोलो कैसा हो…”)

गाना गाते समय सोचा होगा, साहचर्य का ये पथ कभी समाप्त न होगा। ये तो कभी नहीं सोचा होगा कि यात्रा ही शेष रहेगी, राह तो किसी मोड़ पर अवश ही मुड़ जावेगी।

और पृष्ठभूमि में केवल दोलन का हाहाकार गूंजता रहेगा।

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