आप ने कसप पढ़ी है?

“जाने का लिख रहा ठेहरा?”माफ़ करियेगा जब से “कसप” पढ़ी है, कुमाऊँनी बोली का जादू सर चढ़ कर बोल रहा है l यह किताब मनोहर श्याम जोशी जी की रचना है जिन्हें टी वी सीरियलस के संसार का “पितामह” भी कहा गया है l “कसप” निश्चित तौर पर उनकी श्रेष्ठ रचनाओं में से एक मानी जायेगी l “कसप” है क्या? इस पर चर्चा करते हैं l

सब से पहले तो इस शब्द का अर्थ जानना जरूरी है कि कसप शब्द है क्या? इसका अर्थ होता है “क्या जाने”l जी हाँ, लेखक इस से बेहतर शीर्षक नहीं सोच पाए l कसप प्रेम की कहानी है l, पूर्ण हो या अपूर्ण, प्रेम तो आखिरकार प्रेम ही है l प्रेम की तलाश में इस उपन्यास के पात्र एक स्थान से दूसरे तक सालों तक की यतरा तय करते हैं l

चलिये, कहानी के मुख्य पात्रों से आपका परिचय करवाते हैं :

१. बेबी – हमारी खिलंदड, हँसमुख, अल्हड़ नायिका l पढ़ने लिखने में कोई खास रुचि नहीं है इनकी l पाँच भाई बहनों में सबसे छोटी l सबकी दुलारी, खासतौर से अपने पिता की l बेबी में पहाडों वाली लड़की का अल्हड़पन प्रचुरता में उपलब्ध है l इनके शास्त्रीय पिता ने इनका नाम “मैत्रियि” भी रखा है और इस नाम से शायद केवल वही पुकारते भी हैं l

2. डी डी – उर्फ़ देवदत्त उर्फ देबिया, तिवाड़ी है पहाडों वाला, गंगोलीहाट में बचपन बीता है l माँ, बाप बचपन में गुजर गए l बुआ ने पाल कर बड़ा किया, सारा जीवन करीब करीब अभावों में ही बीता है l किताबें लिख चुका है और खुद को सिनेमा में दिग्दर्शक के तौर पर स्थापित करना चाहता है l सहित्यानुरागी के साथ ही हमारा नायक डी डी दार्शनिक भी ठेहरा और सबसे महत्वपूर्ण ,पत्र लिखने में महारथ हासिल है इसे l अगर सिनेमा में इसका मन ना लगाता तो जरूर हिंदी साहित्य को एक अनमोल रत्न मिला होता l

३. शास्त्रीय जी – बेबी के पिता l काशी के पंडित, बचपन में पिता से शास्त्रों की शिक्षा ली l अल्मोड़ा शहर आ कर बस गए l साहित्य, कविता, दर्शन आदि कई विषयों पर इनकी पकड़ का क्या कहना l अफसोस शास्त्री जी को शास्त्रार्थ करने के लिए घर पर कोई नहीं है l घरेलू पत्नी हैं, चारो बेटे नौकरी पेशा वाले हुए और पुत्री बेबी को ये बातें पल्ले नहीं पड़ती हैं l शास्त्री जी स्वभाव से घुमक्कड़ भी लगे मुझे l काशी के बेनिया बाग़ से अल्मोड़ा की पहाड़ियाँ l वहाँ से फिर दिल्ली प्रवास और अंत में बिन्सर में प्राण त्यागे l

४. अन्य किरदार कहानी में आते जाते रहेंगे जैसे बेबी के भाई, भौजाई और चचेरी, मेमेरि बहनें l डी डी का मित्र बब्बन, इसी के यहाँ एक शादी में हमारे नायक नायिका पहली बार मिलते हैं l गुलनार जी भी हैं जो हमारे नायक की पथ प्रदर्शिका बन कर उसे पाश्चात्य संस्कृति से अवगत कराती हैं l गुलनार जी आधी हिंदुस्तानी हैं और शादी व्याह जैसी दकियानुसी चीजों में जरा कम आस्था रखती हैं l

कहानी का कथानक बेजोड़ है l हम इंटरनेट युग में प्रेम को परिभाषीत करने वालों को थोड़ा अटपटा भी लगे कि कैसे किसी ज़माने में प्रेमी एक दूसरे को खत लिखकर एक दूसरे का हाल समाचार दिया करते थे l अपने यात्रा वृतान्त से लेकर रोजमर्रा की बातें, भविष्य की योजनायें और यहाँ तक कि प्रेमियों के मध्य होने वाली बातें सब पत्राचार से l नो व्हाट्सएप, नो फेसबुक 😉 यकीन हो रहा है या आप सब के लिए यह गल्प की श्रेणी में आ रहा है ? हमारे दार्शनिक, विद्वान लेकिन अनाथ गरीब नायक का प्रेम बेबी जैसी संभ्रांत घर की लड़की के भाईयों को कतई नहीं सुहाता है l फ़िर भी फिल्मी स्टाइल में नायक अपने प्यार का इज़हार करने में कोई कसर नहीं रखता है l शास्त्रीजी वैसे तो नायक को अपना जमाता बनाने के योग्य मानते हैं लेकिन घर परिवार, समाज के दबाव के आगे असह्या महसूस करते हैं l हमारी नायिका वैसे यहाँ बाजी मार ले जाती है l चाहे अपने प्यार के लिए घर वालों की रजामंदी लेनी हो या फिर अपने माँ बापू के सुख के लिए खुद को नायक से अलग करना, नायिका तटस्थ रहती है l ऐसे सारे फ़ैसले वो अपनी मर्ज़ी से लेती है बिना किसी के दबाव में और एक अल्हड़, दबंग, खिलंदडी बेबी से संभ्रांत, कुलीन, विदुषी मैत्रेयी बनने तक का सफर तय करती है l नियति को इनका मिलना मंजूर है या बिछड़ना यह आपको उपन्यास पढ़कर पता लगेगा l

इस कहानी को सिर्फ प्रेम कहानी कहना भी उपन्यास के साथ अन्याय होगा l कहानी में सन् 1910 का काशी है, 1950 के दशक का का नैनीताल, अल्मोड़ा, वराणसी, बंबई, और थोड़ा दिल्ली भी l कहानी का अंत 80 के दशक में आकर होता है l इतने लंबे अंतराल में देश में भी कई बदलाव आते हैं l कला, समाज, राजनीति, साहित्य, धर्म आदि हर तरफ़ नवीनिकरण और आधुनिकता की बयार बह रही है l 80 के दशक में तो पहाडों तक पर कच्चे मकान अब पक्के होते जा रहे हैं, घर बड़े, पैसे ज्यादा पर आपसी मेलजोल कम होता चला जाता है l भौतिक सुख सुविधा अर्जित करने के बाद भी नायक वैमनस्य की स्थिति में रह जाता है l उपन्यास की भाषा कुमाऊनी हिंदी है ,आंचलिक शब्दों की भरमार है और आंचलिकता का यह पुट भाषा तथा भाव को और निखार ही देता है l कई बार मुझे किंडल पर उपलब्ध राजपाल हिंदी शब्दकोश का भी सहारा लेना पड़ा l कुछ हिस्से जो मुझे बहुत पसंद आये, उन्हें यहाँ नीचे लिख रहा हूँ :-

“जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं वे लौकिक अर्थ में एक-दूजे के लिए बने हुए होते नहीं।”

“बेबी बैडमिण्टन में जिला-स्तर की चैम्पियन है, यह बात अलग है कि इस जिले में बैडमिण्टन स्तरीय नहीं!” (हास्य)

“दो लोग, दो घड़ी, साथ-साथ इतना-इतना अकेलापन अनुभव करें कि फिर अकेले न रह पायें।”

“प्यार एक उदास-सी चीज है, और बहुत प्यारी-सी चीज है उदासी।”

“प्यार के कैमरे के दो ही फोकस हैं—प्रिय का चेहरा, और वह न हो तो ऐसा कुछ जो अनन्त दूरी पर स्थित हो।”

“वर्षों-वर्षों बैठा रहूँगा मैं इसी तरह इस गाड़ी में जिसका नाम आकांक्षा है। वर्षों-वर्षों अपनी ही पोटली पर, मैले फर्श पर, दुखते कूल्हों, सो जाती टाँगों पर बैठा रहूँगा मैं। संघर्ष का टिकट मेरे पास होगा, सुविधा का रिजर्वेशन नहीं।”

“और याद रखना, सभी निर्णय गलत निर्णय होते हैं, किसी-न-किसी सन्दर्भ में, किसी-न-किसी के सन्दर्भ में। हमें वही निर्णय करना चाहिए जो हमारे अपने लिए, हमारे विचार से सबसे कम गलत हो।”

तो पढ़ें और आनंद ले “कसप” की अनोखी कहानी का

लेखक : मनोहर श्याम जोशी

प्रकाशन :- Rajkamal Prakashan Samuh

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