कथा-व्यथा : क्या आज भी हमारे विश्वविद्यालयों में लड़कियों को देखने का नज़रिया वेश्या और रंडी से ऊपर नहीं उठ सका है?.

०बीएचयू की रिसर्च स्कॉलर और लेखिका प्रियंका नारायण की यह आपबीती बहुत खतरनाक संकेत दे रही है

० कैसे यहाँ पढ़ने वाली गर्ल्स स्टूडेंट, स्कॉलर और महिला अध्यापिकाओं के बारें मर्दवादी कुत्सित धारणा की परतें खोल रही है यह रिसर्च स्कॉलर

विस्तृत जानकारी के लिए प्रियंका नारायण की यह फेसबुक पोस्ट गंभीरता से पढ़े और उनकी आपबीती जुड़ें...

बहुत दुःख और अफसोस के साथ मैं ये पोस्ट आज लिख रही हूँ जिसे मैंने इस विश्वविद्यालय में आने के साथ से महसूस किया था और आज तक मेरे सारे संघर्षों के पीछे केवल यही कारण था कि स्थिति बदले। मेरी कोशिश होगी कि विश्वविद्यालय से संबंधित ये मेरी आख़िरी पोस्ट हो।
वर्ष 2009 में मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, म. म. वि में अपना एडमिशन लिया था। मैं बहुत हंसने – खिलखिलाने वाली लड़की थी। हालाँकि शायद पारिवारिक संस्कार था कि बाहरी जीवन को मैंने हमेशा गंभीरता और संतुलित व्यवहार के साथ लेने की कोशिश की। असल में विश्वविद्यालय आना लगभग हर किसी के लिए सपनों को पूरा करने का बेहतरीन मौका होता है। लेकिन किसी कवि ने कहा है न कि एक सपने को पूरा करने के लिए सौ सच का सामना करना पड़ता है। यहाँ सब कुछ था लेकिन सब के साथ मुझे यहाँ जीवन के सबसे वीभत्स सत्य से गुजरना पड़ा और वह यह कि
‘यहाँ हर लड़की वेश्या (रंडी) है। कोई चरित्रवान से चरित्रवान लड़की या हमारी शिक्षिकाएँ ही क्यों न सब यहाँ ‘वेश्या’ हैं।
दरअसल, यह मैंने बी. ए. के शुरुआती दिनों में ही समझ लिया था कि अगर मुझे पढ़ाई करनी है और आगे बढ़ना है तो सबसे पहले इस “वेश्या” शब्द को स्वीकार कर लेना होगा। जबकि इसके विपरीत मेरा परिवार जरुरत से ज्यादा आदर्शवादी और संस्कारी परिवार रहा है – कुछ इस हद तक कि आज जब मैं समाज देखती हूँ तो वो बस एक साँचा लगता है जिसमें आदर्श तैयार किया जाता है। मेरे कुछ मित्र तो हँसते हुए कहते हैं – ये सब मत सुनो तुम “पाॅल्ट्री फाॅर्म” की बच्ची हो। मेरे जूनियर्स जब कुछ मजाक करती (थोड़ा इधर – उधर) तो कहतीं- इस मामले से बच्चियों को दूर रहना चाहिए। आप कुछ देर के लिए दूसरे कमरे में चले जाइए।
अब सोचिए आते से इस पाॅल्ट्री की बच्ची को इस शब्द को अपने जीवन में स्वीकार करने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी, कितना टूट जाना पड़ा होगा।

लेकिन जानते हैं तब धीमे – धीमे मैं भी शांत होती चली गई जब रिसर्च में मेरा एडमिशन हुआ। सारे उठापटक के बीच मैंने देखा कि अरे कोई नहीं – यहाँ तो ये मैम इसलिए नियुक्ति पाई हैं क्योंकि वो वी. सी. के साथ सोई हैं और सिंह साहब की रखैल थी। अच्छा!!!! …फलानी मैम का प्रोमोशन इसलिए हुआ था क्योंकि काशी के किसी कथाकार ने सुबह – सुबह उसे ‘एक्सपर्ट’ के कमरे से निकलते हुए पाया था । अच्छा …फलानी मैम की शिष्या इसलिए नियुक्ति पायी हैं क्योंकि वो उनके पति और उनके रिसर्च स्काॅलर से ‘मरवाती’ थी। (बेहद अभद्र भाषा, माफ़ी चाहूँगी)। फलानी तिवारी जी… अरे वो तो हर जगह पैसे पर जाती है। परसों रेडिसन से निकलते देखनी ओकरा के । फलानी.. अरे वो…जॉन रेडियो उआ पर बोलेला… उ त बड़का गुरू जी के बेटवा से फँसल ह… अरे ह उ… जागरफ़िया वाली उ त रेक्टरे से चक्कर चला रहल बिया…। वो गायन वाली… अरे ओकर …वो तो दो – दो से चक्कर चला रही।
का गुरु…. डिपार्टमेंट चलबा…. अरे नाहीं…. अरे चला हो …. हरियाली आइल बा…. नया माल सब आइल बा…. कुछ लोग तो “हरियाली” के नाम पर ‘परिचयात्मक पत्रिकाएं’भी निकाल देते हैं। वास्तव में ये सभी प्रात: पूजनीय- वंदनीय, श्री श्री 108 ‘आश्रमवासी’ हैं और इन्हीं के इशारे पर यहाँ सारी लड़कियाँ अपनी सारी उज्जवलता के बाद भी वेश्या हो जाती हैं।
बस इतना ही कहना था… मुझे। अभी मेरे साथ जो घटना घटी है और मानसिक क्लेश से गुजर रही हूँ वो लगातार लड़कियों के साथ दोहरी सोच रखने वालों की वजह से ही घटा है।
आदरणीय शत्रुघ्न मिश्रा जी इसके लिए बधाई के पात्र हैं।

(-प्रियंका नारायण, शोधार्थी और लेखिका, बीएचयू वाराणसी की 27 नवंबर की फेसबुक पोस्ट से)

सोशल मीडिया पर कुछ प्रमुख टिप्पणियां जो प्रियंका की पोस्ट पर आयीं

भूपेन्द्र सिंह कहते हैं-
”दुखद तो है ही यह।आपराधिक कृत्य भी है।इस तरह से इतने बड़े संस्थान में भाषिक अराजकता उचित नही।नारियों के लिए अक्सर इसी तरह की बातें की जाती रही हैं।इन कृत्यों की निंदा की जाए.”
: प्रियंका नारायण, भूपेंद्र सिंह की टिप्पणी पर जवाब देती हैं-
Bhoopendra Singh सर, अब जो बच्चे आ रहे हैं उनकी सोच बदल भी रही है लेकिन अभी भी कुछ नीच मानसिकता के इंसान हैं जो गंदगी फैलाते रहते हैं। कोई लड़की किसी के साथ उठती – बैठती भी है तो वो “वेश्या” हो जाती है।
वेश्याओं के जीवन में कितना दुःख होता है इसका अनुमान भी कोई लगा सकता है। किस दुःख के साथ वो इस जीवन में प्रवेश करती हैं और ऐसे ऐसे लोग जो हर लड़की में यही देखते हैं वो किस स्तर के हैं
दिनेश पाल लिखते हैं कि-
“इस पोस्ट को पढ़कर समझा जा सकता है कि कितना दुःखी मन से लिखा गया है…….
”देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के मेधावी शोध- छात्रा व लेखिका को ऐसा लिखना पड़ रहा है इससे दुःखद और क्या हो सकता है…”
खुशबू झा लिखती हैं-
“दीदी आप मेरे से बहुत ज्यादा सीनियर हैं आपका अनुभव मेरे से कई गुना ज्यादा है.. आपने जो बात बोली ये सारी बातें महिला प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए मैं अपने कुछ मित्रों से सुनि हूँ। देश के दूसरे स्थान के विश्वविद्यालय में पढने वाले की ये स्थिति है तो बाकियों की कैसी होगी। More power to u didi 🌺.”
रिसर्च स्कॉलर अंकिता शांभ्वी लिखती हैं-
“मैं निःशब्द हूँ, इसपर कुछ कहना मुश्किल हो रहा है मेरे लिए, क्योंकि जब आदमी एक एक चीज़ relate करने लगता है तो कुछ नहीं कह पाता.. चुप रह जाता है बहुत देर तक. इसी चुप्पी की आवाज़ मुझे ख़ुद अंदर से सता रही है. कुरेद रही है, बहुत सारे ख़याल आ रहे हैं, मन अशांत हो गया है, एक स्त्री के साथ कथित हिंसा बिल्कुल आम हो गयी है यहाँ, बलात्कार और शारीरिक हिंसा तो छोड़ ही दें.
आपने जो दशा लिखी है यहाँ के माहौल की, इन सबसे हर एक लड़की को गुज़रना पड़ा है. या तो रोकर ख़ुद को ही ढाढ़स बँधाना पड़ा है, नहीं तो हिम्मत जुटा कर ख़ुद साहस से लड़ना पड़ा है.
इसमें भी विमुख कितनी लड़कियाँ जा पायीं या नहीं जा पायीं इसकी गिनती नहीं है. आवाज़ें दब गईं या उनका मखौल उड़ा दिया गया. मेरे साथ, एम. ए. में आते ही 2 ही दिन के भीतर कुछ मेरे ही साथ पढ़ने वाले लड़कों ने बहुत बुरा व्यवहार किया था, वो भी मुझे कुछ पता भी नहीं था तब, 2 दिन हुए थे आए, क्या ही जान लेती मैं यहाँ के लोगों के रवैये के विषय में. पहले से ही मैं चुपचाप अपनी पढ़ाई में ध्यान देने वाली और अतिशय संवेदनशील लड़की हूँ. चलती रिक्शा को रोककर मुझे उन लड़कों ने क्या कुछ कहा था, Ragging शब्द कम है उसके लिये. नहीं जानता ये बात कोई. मैं सड़क पर उस दिन जिस तरह से डरी थी और रो दी थी वो आज भी याद आ जाता है. अब तो इस विभाग से ख़ैर निकलने का वक़्त आ गया, शोध जमा करने का वक़्त आ गया. उसके बाद इन्हीं लड़कों ने क्लास में जत्थे में आकर तथाकथित झूठ मूठ की माफ़ी माँग कर तमाशा क्रिएट किया था, जिससे कि लोग मुझसे पूछें कि क्या हुआ था तुम्हारे साथ !
मैंने तब भी नहीं बोला किसी भी शिक्षक से कुछ. क्योंकि यहाँ की हवा मैं अब पहचान गयी थी. यहाँ कोई किसी की मदद नहीं करता, हाँ कुछ कहने से आप बदचलन, ओछी, characterless ज़रूर ठहरा दी जाती हैं.
आज आपके पोस्ट ने मेरे उन सारे घावों को कुरेद दिया है जो यहाँ के माहौल ने मुझे दिया है. स्वस्थ माहौल नहीं मिला यहाँ कभी. या हो सकता है मैं ही बद् दिमाग होऊँगी, झूठ नहीं बोल सकती मैं अब. मुझे सच को सच कहना और झूठ को झूठ कहना हमेशा से आता है.”
सुकेश लोहार लिखते हैं-
”चरित्र प्रमाण पत्र’ जारी करने का अधिकार किसी को क्यों मिल जाता है, ये अधिकार कौन देता है, इसकी बुनियाद कहाँ है? हम जानते है लेकिन लेकिन मानते नहीं!
प्रियंका! हम आपके साथ हुए और तमाम लड़कियों के साथ हुए ‘दुर्व्यवहार’ के विरुद्ध खड़े हैं!”
कबीर यूपी टिप्पणी करते हैं-
“संघर्ष जारी रहे ऐसे लोगो के मुखौटे को खोलने का हौसला किसी न किसी को दिखाना था आज आपने जो संघर्ष शुरू किया है शायद यह परिवर्तन की लहर बन जाए”
प्रेमपाल शर्मा जी कहते हैं कि-
“ऐसी हजारों लाखों आप बीती हैं ।इससे विश्वविद्यालयो के पतन का अंदाजा लगाया जा सकता है ।जाति से मुक्ति के लिए तो आपने आरक्षण आदि कर दिया, गंगा घाटी विशेष रूप से इस मानसिकता से मुक्ति के लिए क्या करेगी ?इतना भ्रष्टाचार तो नौकरशाही में भी नहीं है विशेषकर स्त्री विरोधी !काश विश्वविद्यालयों के लिए भी कोई नियुक्ति बोर्ड होता!? लेफ्ट ,राइट ,धार्मिक जातिवादी, आदिवासी कलंकी ,निष्कलंकी क्यों चुप बैठे हैं नियुक्तियों की इस अश्लील गोरखधंधे को जानते समझते हुए भी? धिक्कार है ऐसी मानसिकता की पूरी बिरादरी पर। आपने लिखकर बहुत अच्छा किया और बार-बार लिखते रहिए! किसी भी हालत में यह पोस्ट हटनी नहीं चाहिए।”
शिवानी अरूण सिंह कहती हैं कि-
‘कम है जिन्होंने बोलने की हिमाकत की । विभाग में मुँह पर राम बगल में छूरी की कहावत एकदम ठीक बैठती है । विभाग में रहना है तो जी हुजूरी करना जरूरी है यह विभाग के विशेष नोट में लिखित हो जैसे । आश्चर्य इस बात पर होता है कि विश्वविद्यालय का अंग बनने के साथ साथ हमें एक अलग समुदाय का भी हिस्सा बनना होता है जिसमें कुछ अलग अध्यापक अलग शोध छात्र अलग विद्यार्थी तय होते है ।
रही रिश्तों की बात तो दीदी भैया जैसे शब्दों की धज्जियां तो खुले आम उड़ती है दीदी कब *समझदार प्रेमिका * और भैया कब एक *गंभीर विद्वान् प्रेमी * बन जाते है यह खबर नहीं होती । साथ ही अध्यापक का पैर छूकर सादर चरण स्पर्श करने वाले विद्यार्थी कब पेंट में एक कॉपी शर्ट इन कर के गुरु जी के साथ ही लड़कियो पर या अन्य पर ठहाके बाजी करने लगते है कि का गुरु का चेला? लोग बोलते है चुप हो जाते है या चुप करा दिए जाते है पर ये विभागीय कारनामे अपना पाँव पसारने में जरा भी कोताही नहीं करते ।”

विडंबना यह है कि यह सभी के पास आँख है लेकिन सभी धृतराष्ट्र है क्योंकि बहती गंगा में हाथ धोकर निकल जाने में लगभग सभी को मजेदार लगने लगा है ।
मरीषा झा लिखती है-
“मैंने भी कई बार ऐसा सुना है, कितनी ही प्रोफेसर्स ओर reseach scholars के बारे में। अगर कोई महिला अपनी प्रतिभा से आगे बढ़ती हैं तो उसे हमेशा शक की नज़र से देखा जाता है। आपने उन बातों को सामने रखा है जिसे हम सबने सुना है, इसके लिए हिम्मत चाहिए। Hats off.”
आरसी अर्शी टिप्पणी करती हैं-
“सच्चाई है बात में यह भारत के हर विश्वविद्यालय में है लोग व्यक्ति (लड़की) को नहीं जानते लेकिन उसके संबंधों के बारे में जरूर दावा करते है”
ज्योतिष ज्योति लिखते हैं-
“बहुत बुरा, निंदनीय और लज्जाजनक है यह सब। यह हमारे समाज की असल तस्वीर है। क्या कहें, निंदा या भर्त्सना शब्द भी अर्थहीन है इसके लिए।”
: गीता प्रजापति लिखती हैं-“आपने जो आवाज़ उठाई है उसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए और आपके इस हिम्मत को हम सलाम करते हैं…”

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