फिल्म समीक्षा : एक था दानिश..!

झरोखा :-

@ सीमा संगसार
खिड़की पर सर्द रातों में कोहरे की परत से जमा हुआ कांच के दरवाजों पर जिस तरह से सब कुछ धुंधला दिखाई देता है और जिसके पार देखने के लिए हमें पूरी तल्लीनता और धैर्य के साथ रात भर कोहरे के छंटने का इंतजार करते हैं , ठीक उसी तरह आप अक्टूबर फिल्म में वरुण धवन के कैरेक्टर दानिश उर्फ डैन में देखते हैं ..
एक हास्य कलाकार के रुप में पहचाने जाने वाले वरण धवन को सुजीत सरकार ने इतना संजीदा किरदार कैसे प्ले करवाया यह हैरत का विषय है …
लेकिन आज के युग में किसी को हँसा देना सबसे कठिन काम होता है इसलिए वरुण अगर यह कर सकते हैं तो वे दर्शकों को रुला भी सकते हैं ….
लेकिन यह फिल्म दर्शकों को रुलाती नहीं है उसे बस स्थिर होना सिखाती है …
इस फिल्म के शुरुआती दौर में दर्शक वरुण धवन को देखकर इरिटेट होते हैं क्योंकि वरुण खुद ही इरिटेट होते हैं । झुंझलाहट उनके चेहरे पर साफ झलकती है ।
दर्शक उनके अजीबोगरीब हरकत पर भी हँस सकते हैं लेकिन कुछ ही देर में उन्हें बोरियत होने लगती है इसकी सबसे खास वज़ह यह है कि वरुण खुद अपनी ज़िंदगी से बोर हो रहे होते हैं । होटल मैनेजमेंट कोर्स करने वाले इस बंदे को जीवन में अनुशासन बिल्कुल भी पसंद नहीं …
कोर्स करने का मकसद बस इतना ही है कि वे भविष्य में अपना एक होटल खोलेंगे और सामान्य रुप से अपनी ज़िंदगी जिएंगे जिसमें कोई झंझट नहीं होगा …
उनके चेहरे पर यह बेरुखी बेतरतीबी से बढ़े हुए उनके दाढ़ी के बाल वयां करते हैं । लापरवाही उनके जीवन का एक हिस्सा है और यही वजह है कि उनके सीनियर्स उनसे खार खाए रहते हैं ….
उनकी सूनी आँखों में जहाँ कोई सपना पलना चाहिए वहाँ उदासियों का मौसम होता है ये उदासीनता की झलक है.जी हाँ तब तक उनके जीवन में दुख का पर्दापण नहीं हुआ था क्योंकि दुख आपके जीवन म़े तभी आता है जब आपसे कोई सुख छीन ले …
दानिश अभी ऑटम का वह पीला पत्ता होता है जिसे टूट कर झड़ने का मतलब ही नहीं पता होता है।
इसकी कीमत उन्हें बार – बार छोटी से बड़ी सजा के रुप में चुकानी होती है । मच्छर मारने से लेकर लाउंड्री वाले बेहद उबाऊ और फालतू काम सजा के तौर पर उन्हें करने पड़ते हैं। वे खीजते हैं और उन कामों को भी उटपटांग तरीके से करते हैं जिसे उनके कुलिग्स और सीनियर्स से अधिक दर्शक झेलते हैं …
ईमानदारी से सच बयां करुं तो मैं उनकी इस हरकत को देखकर फिल्म के शुरू होने के आधे घंटे के बाद ही मूवी छोड़ कर घर वापस आ गई थी ….
बाद में जिस तरह से इस फिल्म और इस किरदार की चर्चा हुई तो मैं अजमंजस में पड़ गई साथ ही यह उत्सुकता भी बढ़ी कि आखिर में क्या हुआ होगा ?
इस तरह से किसी फिल्म को बीच में ही छोड़ कर आने का यह मेरा पहला अनुभव था खासकर तब जबकि आप दो तीन सौ की टिकट खरीद कर उसे देखने गए हों ….
यही उत्सुकता मुझे एक दिन इस फिल्म को फिर से मोबाइल पर देखने को मजबूर कर गई.
कहा जाता है कि प्रेम खुद एक भरपूर ज़िन्दगी है और जब यह नहीं होता है तो वह ज़िन्दगी दानिश होता है जिसका कोई मकसद नहीं होता है …
अगर आप इस फिल्म को प्रेम कहानी समझ कर देखने जाएंगे तो हो सकता है कि आपको घोर निराशा हाथ लगे ।
प्रेम कहानी के लिए हीरो रोमांटिक होना चाहिए उसे नाचना – गाना आना चाहिए और सबसे बड़ी बात कि लड़कियाँ उसे देख कर आहें भरें लेकिन दानिश को देख कर उसकी रुममेट और कुलिग्स नजरें चुराते हैं कि अगले ही पल न जाने उन्हें किस वजह से शर्मिंदगी झेलनी पड़े …
प्रेम कहानी पनपने से पहले ही अगर वह मुरझा जाए तो आप सोच सकते हैं कि फिल्म किस दिशा में जाएगी ….
सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह फिल्म बेहद मंथर गति से चलती है और आम दर्शकों के लिए यह खूबी भी बोरिंग हो सकती है…..
लेकिन यह फिल्म उन लोगों के लिए है जो जीवन को समझना चाहते हैँ , ठहरना जानते हैं , उन्हें कहीं भी जाने या पहुंचने की कोई जल्दी नहीं है …..
वे रात भर कांच की खिड़कियों के पास बैठ कर चुपके से बर्फ का गिरना उनके एक एक कण को गिरते हुए देख सकते हों ….
जो चीज जैसी है वैसे ही निराकार भाव से घंटों देखना बुद्ध के विपश्यना की भांति उसे जीना आप इस फिल्म को देखते वक्त सीख सकते हैं बशर्ते कि आप उसके लिए तैयार बैठे हों …..
एक शांत नदी का किनारा जिसके सारे हलचल आपके सामने से गुजरता रहे और आप स्थिर निराकार भाव से समाधिस्थ हो सके ….
दानिश के जीवन में यह परिवर्तन तब आता है जब उसे महसूस होता है कि उसके बंजर दिल के किसी कोने में प्रेम का अंकुरण हुआ है । प्रेम न तो भोग विलास का साधन है और न ही दर्शकों के अतृप्त इच्छा पूर्ति का साधन ….
प्रेम में मौन हुआ जा सकता है इसे आप इस फिल्म को देखकर सीखेंगे ….
संवाद की अनुपस्थिति में भी प्रेम अपनी भाषा खुद गढ़ लेता है …
दानिश को शिउली पहचानती है कि नहीं यह उसकी आँखों की पुतली एक खास दिशा में घुमाने से तय होती है और शिउली के ऐसा करने या न करने से दानिश को बहुत फर्क पड़ता है.
एक लड़की के लिए या अपने प्रेम के लिए अपनी ज़िन्दगी गुजार देना यह प्रेम की परकाष्ठा है जिसे आज तक किसी धर्म गुरुओं ने व्याख्या नहीं की है ….
दानिश के चेहरे पर जिस तरह की तटस्थता और निश्चिंतता के भाव चिपके हुए रहते हैं वह बहुत दुर्लभ है ….
हर्ष , विषाद , रोग, शोक से परे दानिश का जीवन एक मात्र शिउली है जो सिर्फ और सिर्फ अक्टूबर के महीने में ही जनमती है और जिसकी जिन्दगी थोड़ी होती है …
वह जन्म ही लेती है खिल कर धरती पर बिछने के लिए लेकिन दानिश के जैसा प्रेमी उसे जीवन में कभी – कभार ही मिलता है जो उसके इंतजार में रात भर उस पेड़ की छांव में उसके झरने का इंतजार करता हो ….
दानिश जिसका जीवन ही शिउली है उसके होने से वह है और उसके न होने से वह उस हर जगह से अनुपस्थित है जहाँ जीवन है.
डेविड धवन मार्के के इस हीरो को जरा भी पसंद नहीं करने वाले दर्शक भी उन्हें इस रुप में देखकर उनसे इश्क कर बैठेंगे ….
जिस दिन मैंनें इस फिल्म को दानिश और शिउली की नजरों से देखा मुझे भी वरुण से प्यार हो गया .
सच है कि तमाम उम्र गुजर जाने के बावजूद भी कोई एक कविता , कहानी , किरदार या कृति ही आपको आपकी पहचान दे जाती है.
कोई तो प्रेमी ऐसा हो जो अपनी प्रेयसी के कहे एक पंक्ति को ही अपने जीवन में उतार ले.
कहाँ है ऐसा वो प्रेमी.
व्हेयर इज़ डैन.
एक था दानिश..!

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