प्रधानसेवक यह भूल रहे हैं कि- यह देश आज भी कृषि और ऋषि प्रधान है!

@ अरविंद सिंह
देश के प्रधानसेवक को यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदुस्तान की मूल पहचान-एक कृषिप्रधान देश के रूप में है और इसकी यह पहचान लाखों करोड़ों धरतीपुत्रों, खेती-किसानी और धरती माँ के प्रति उनका अगाध प्रेम और पीढ़ियों से चले आ रहे लगाव से है. यह धरती माँ न केवल उसकी उदरपूर्ति करती है बल्कि देश की आबादी की भी उदरपूर्ति करती है. महात्मा गांधी ने जिस भारत की पहचान इसके नगरों से नहीं, बल्कि इसके गाँवों से करायी और उसे भारत की आत्मा कहा, उस गांव की पहचान भी यही खेतीबाड़ी और स्वरोजगार से जुड़े किसानों से है. देश की अर्थव्यवस्था को मुश्किल वक्त में संभालने वाली कृषि और उस पर आधारित व्यापार भी इन्हीं खेतों से निकली किसानों की खून- पसीने की श्रमशक्ति से है.
भारतीय लोकतंत्र की जड़ें जिन माध्यमों और उपक्रमों से गहरी होती गयीं हैं, उसमें बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की कालजयी रचना ‘आनंदमठ’ और उसके अमरगीत ‘बंदेमातरम’ का महत्वपूर्ण स्थान है. इसी उपन्यास में सन् 1773 के ‘संन्यासी विद्रोह’ का जीवंत वर्णन है. ये संन्यासी कौन थे और उनका शासक के विरुद्ध विद्रोह क्यों हुआ. यह सभी को जानना चाहिए.
दरअसल, ये संन्यासी कोई और नहीं थे, बल्कि वे इस हिन्दुस्तान के पहले राष्ट्रवादी किसान थें, जिनकी जमीनें छिन ली गई थी. इसके लिए जगह-जगह किसानों ने आंदोलन किया और तत्कालीन शासकों की चूलें हिला दीं. लोकतंत्र की जड़ें इस संन्यासी किसान चेतना से प्रभावित और प्रेरित होती हैं. आज इस संन्यासी राष्ट्रवादी किसान आंदोलन के दो सौ सैतालीस बरस बाद एक बार फिर उसी भारत की आत्मा की मूल पहचान ‘किसान’ देशभर से चलकर, राजधानी दिल्ली के बार्डर पर डेरा डालें हुएं हैं. और सत्ता के शिखर पर भाजपा के शिखरपुरूष नरेंद्र दामोदर दास मोदी की सरकार है. सरकार कृषिप्रधान देश के किसानों की आय बढ़ाने के लिए कोरोना काल में बिना राज्यों और किसानों से सलाह मशविरा किए संसद में तीन नये कृषि कानून बना देती है और दावा करती है कि- इससे किसानों के जीवन में बहार आ जाएगा, जबकि किसानों का कहना है कि यह कानून नहीं बल्कि उनके लिए काला कानून है, इसके द्वारा किसानों का अस्तित्व ही खतरे में है, इसके द्वारा सरकार अपने कारपोरेट मित्रों को लाभ पहुंचाना चाहती है और उनकी निजी कंपनियों को कृषि क्षेत्र में उतार कर भारतीय किसानी को खोखला कर देना चाहती है. यह सरकार अंबानी और अडानी की चाकरी कर रही है. इसलिए उसे किसानों के हितों की चिंता नहीं बल्कि कारपोरेट की हितों की चिंता है.
फिक्की की 93वीं सालाना बैठक में भी प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह कारपोरेट जगत की सहुलियतों के लिए तीन नये कृषि कानून बनाएं है. इसलिए औद्योगिक घरानों को इस कृषि क्षेत्र में आगे आना चाहिए. विगत दिनों पीएम मोदी का भाषण यह बताने के लिए काफी था कि वह कारपोरेट जगत के कृषि क्षेत्र में प्रवेश के लिए किस तरह से पलक पांवड़े बिछाए हुए हैं. कैसे हरियाणा में अडानी का भंडारण गृह का निर्माण युद्धस्तर पर चल रहा है और निजी रेल लाइनें बिछाने की तैयारी चल रही है, कैसे बिहार में इसकी बड़ी परियोजना की तैयारी चल रही है. कैसे पहले किसानों की जमीनों को औने-पौने दामों पर सरकारों ने लिया और फिर उसे अपने कारपोरेट मित्रों दे दिया.
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब तीनों नयें कानून को देश के किसान अभिशाप मान रहे हैं तो फिर देश के प्रधानमंत्री इन कानूनों को भारतीय किसानों के ऊपर जबरन थोपकर वरदान साबित क्यों करना चाहते हैं. भारत में लोकतंत्र है और इस लोकतंत्र में हर किसी की आवाज़ सुनी जानी चाहिए, जब देश का अन्नदाता सरकार के कानूनों को अपने लिए ‘काला कानून’ मान रही है तो फिर सरकार उनके हितों को ध्यान में रखकर इन कानूनों को वापस क्यों नहीं कर ले रही है. इसके लिए उसकी हठधर्मिता आखिर क्यों है. इस आंदोलन में उसे अब यह तो तय करना होगा कि वह देश के किसानों के साथ है या फिर देश को औद्योगिक घरानों के साथ. क्योंकि देश तो इस हिन्दुस्तान की मूल चेतना किसान के साथ. यह देश आज भी ऋषि और कृषि प्रधान है. जिसकी पहचान को कोई सत्ता खत्म नहीं कर सकती है. यह विश्वास भी उसी किसान चेतना से निकल रही है.

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