म्यांमार में लोकतांत्रिक संकट एवं सैन्य शासन..

जनता से अपील करती सुकी

हाल ही में म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार में जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई और पूर्ण बहुमत की सरकार के विरुद्ध तख्तापलट किया गया।यह वहां के ना सिर्फ जनता ,बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ ,मानव अधिकार एवं समस्त वैश्विक और क्षेत्रीय संगठनों के विरुद्ध है।

लोकतांत्रिक शासन प्रणाली सर्वोत्कृष्ट शासन पद्धति मानी जाती है।इससे बनी सरकार जनप्रतिनिधियों के रूप में कार्य करती है।आम नागरिक भी समस्त गतिविधियों में अपना ही निर्णय समझते है। हाल ही में म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार में जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई और पूर्ण बहुमत की सरकार के विरुद्ध तख्तापलट किया गया।यह वहां के ना सिर्फ जनता ,बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ ,मानव अधिकार एवं समस्त वैश्विक और क्षेत्रीय संगठनों के विरुद्ध है। किसी भी चुनी हुई सरकार के विरुद्ध सैन्य शासन शुभ संकेत नहीं होता है।
म्यांमार में पिछले वर्ष नवंबर, 2020 में चुनाव संपन्न हुए थे और संसद के ऊपरी और निचले स्तर पर 476 सीटों में 396 सीटों पर ‘नेशनल लीग फार डेमोक्रेटिक पार्टी ‘(एनएलडी) ने जीत हासिल की । इसी पार्टी ने लगभग 83 % फ़ीसदी बहुमत के पश्चात ‘यू मीन विंट’ को राष्ट्रपति बनाया। म्यांमार के ‘सैन्य मसौदे’ (2008) के तहत वहां 25% सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं और महत्वपूर्ण मंत्री पदों पर भी उनके लिए व्यवस्था की गई है । पूर्ण बहुमत की सरकार बनने पर पार्टी के अध्यक्ष ‘आंग सान सू की’ पर सेना ने दोषारोपण किया की जनता के इच्छा के विरुद्ध और अनैतिक ढंग से जीत उन्होंने हासिल किया है । इसमें संवैधानिक नियमों का पालन नहीं हुआ। परंतु इतना बड़ा जनसमुदाय ‘नेशनल लीग फार डेमोक्रेटिक पार्टी ‘के साथ था तो यह अनैतिक और धांधली कैसे हुई। चुनाव तो चुनाव आयोग ने संपन्न कराए थे।इस प्रकार के तर्क का समर्थन कोई भी लोकतांत्रिक व्यक्ति और देश नहीं कर सकता।सैन्य शासन लागू कर देने के बाद अचानक आपातकाल लागू कर देना और वह भी 1 वर्ष के लिए यह लोकतांत्रिक कार्य नहीं है। क्या इंटरनेट सेवाओं को रोकना? समाचार पत्र और टीवी चैनलों पर प्रतिबंध लगाना लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया हो सकती है। कदापि नहीं हो सकती। ‘कमांडर इन चीफ इन डिफेंस सर्विसेज’- ‘मिन आंग हाइंग’ का राष्ट्र प्रमुख बनना और ‘माइंण्ट स्वे’ को अचानक राष्ट्रपति बनाना पूर्णतया लोकतंत्र के विरुद्ध है।
म्यांमार में अचानक सैन्य शासन लागू करके वहां की ‘आंग सान सू की’ और ‘मिन विंट’ को जेल में डालना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। भारत के विवेक विदेश मंत्रालय ने इस घटना की घोर निंदा करते हुए कहा है कि भारत म्यांमार में पूर्णतया लोकतंत्र का समर्थन करता है और जनता के द्वारा चुनी गई सरकार के विरुद्ध यह कार्य ठीक नहीं है।इससे पहले भी म्यामार में सैन्य शासन लागू था ‘आंग सान सू की’ ने लोकतंत्र के स्थापना के लिए कठिन संघर्ष भी किया जिस कारण उनको कई वर्ष जेल में रहना पड़ा। लोकतांत्रिक मूल्यों के कार्य के लिए उन्हें शांति नोबेल पुरस्कार (1991) से सम्मानित किया गया था।प्रेस की स्वतंत्रता को इस सैन्य शासन ने पूर्णतया प्रतिबंधित कर दिया। म्यांमार का सरकारी चैनल एमआर टीवी ने तकनीकी समस्याओं का हवाला देते हुए सेवाएं बंद कर दी। अन्य कई चैनलों की सेवाएं भी बंद हो गई। बंद हुई है ,या प्रतिबंधित कर दी गई हैं ।यह सोचने का विषय है।
ऑनलाइन समाचार पत्र ‘म्यांमार नाऊ’ के मुताबिक अचानक सुबह प्रमुख नेताओं ( आंग सान सू की और विंट) को गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया जो लोकतांत्रिक कार्य नहीं है और ना ही लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए शुभ संकेत है।भारत अमेरिका, ब्रिटेन एवं संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ‘एंटोनियो गुटेरेस’ आदि ने भी इस कृत्य की घोर निंदा की है।लोकतांत्रिक सरकार में कुछ वर्षों के लिए चुने गए केवल प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि संपूर्ण उस देश के नागरिक अपने -प्रशासन वैश्विक प्रतिष्ठा और जन इच्छाओं को आधार देने के लिए नियुक्त करते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि वह इन सभी आयामों को अच्छा आधार दे सकेंगे। म्यांमार में सरकार का तख्तापलट भी जनमत और जन- इच्छा के विरुद्ध हुआ है। ऐसे में प्रमुख वैश्विक शक्तियों और संगठनों को चाहिए कि वहां लोकतंत्र वापसी के लिए कार्य करें। जनता द्वारा चुनी सरकार पुनः स्थापित हो ,तभी लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान होगा।


विकास कुमार ‘विश्लेषक’
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