लोकतांत्रिक सहभागिता में प्रगति का सूचक है पंचायती व्यवस्थाएं

(उत्तर प्रदेश पंचायती चुनाव पर विशेष)
विकास कुमार-लेखक- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय केंद्रीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के राजनीति विज्ञान में रिसर्च स्कॉलर हैं)

शासन का सर्वोत्कृष्ट रूप लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को माना जाता है जिसमें सहमति के साथ विरोधी विचारों को भी सम्मान दिया जाता है ,क्योंकि इसमें सर्वसम्मति और सहभागिता की अवधारणा को स्वीकार किया जाता है। भारत की शासन व्यवस्था तीन स्तरों पर काम करती है जिसमें तीसरा और सबसे निचला स्तर पंचायती व्यवस्थाएं होती हैं जो वास्तव में लोकतंत्र की बुनियाद और लोकतांत्रिक सहभागिता के उसके मूल्यों में संवर्धन करती हैं । पिछले आंकड़े देखा जाए तो सर्वाधिक मतदान पंचायतों के चुनावों में ही हुआ है ,क्योंकि इसमें मतदाता और प्रतिनिधि में प्रत्यक्ष संबंध पाया जाता है। प्रारंभ में पंचायतों को संवैधानिक आधार नहीं प्रदान किया गया था। इसे केवल भारतीय संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद ,40 में स्थान दिया गया जो प्रवर्तनीय नहीं है। 73वें संवैधानिक संशोधन 1993 में नरसिम्हा राव की सरकार ने इनको संवैधानिक दर्जा दिया जिसको भाग ,9 और अनुच्छेद, 243 में (A – O ) उपबंधित किया गया । पूरे देश में लगभग 2 लाख 39 हजार ग्राम पंचायतें हैं जिसमें केवल उत्तर प्रदेश में 59 हजार 163 ग्राम पंचायतें हैं । उत्तर प्रदेश में 2011 की जनगणना के अनुसार 16 करोड़ की आबादी गांव में निवास करती है। उत्तर प्रदेश में इस समय ग्राम पंचायत के चुनाव संपन्न होने जा रहे हैं। पहले चरण का मतदान भी उत्तर प्रदेश में संपन्न हो गया जिसमें लगभग 71% लोगों ने मतदान किया जो कम है परंतु यह सहभागिता शायद इसलिए कम हुई, क्योंकि महामारी का चक्र चल रहा है। इस चुनाव को जीतने के लिए कितनी मशक्कत की जा रही है। मतदाताओं को कई प्रकार के लुभावनी वस्तुएं भी दी जा रही हैं और सबसे बड़ी बात बड़े- बड़े वादे भी किए जाते हैं जिन्हें ना पूरा किया जाता है और ना ही आगामी चुनाव में मतदाता को उसके वादे याद रहते हैं। संविधान अनुसूची 11 के अनुसार 29 विषय ग्राम पंचायतों को दिए गए हैं । इन्हें सुचारू रूप से संचालित करने के लिए राज्य सरकार और समय-समय पर केंद्र सरकार द्वारा अनुदान दिया जाता है जिसका धरातल स्तर पर बहुत कम काम होता है। वह पैसा आकर कहां चला जाता है? इसके लिए ना तो निष्पक्ष जांच होती है और ना ही मतदाता को इतना फिक्र होती है कि वह इस अनुदान के बारे में विचार -विमर्श कर सके। ग्राम प्रधान का मानदेय केवल 3500 रूपए महीने का होता है फिर भी इस चुनाव को जीतने के लिए कितने हथकंडे अपनाए जाते हैं , यहां तक कि हिंसा का भी सहारा ले लिया जाता है। यह सोचने और विचार- विमर्श का विषय है जिस व्यक्ति की आय चुनाव लड़ते समय इतनी कम होती है। चुनाव जीतने के 5 वर्ष बाद उसकी संपत्ति इतनी कैसे बढ़ जाती है ? कई प्रकार की योजनाएं और परियोजनाएं ग्रामीणों के लिए चलाई जाती हैं जिनकी स्पष्ट जानकारी ना तो ग्राम प्रधान को होती है और ना ही नागरिकों को। जो भी अनुदान सरकारों के द्वारा आता है वह काम एक पंचवर्षीय में तो पूरा ही नहीं होता , आगामी पंचवर्षीय के अनुदान का खर्च भी उसी कार्य में कर दिया जाता है। यह सबसे बड़ी विसंगति है। यही कारण है कि 3500 रुपए के मानदेय के लिए इतनी होड चुनाव लड़ने में लगी रहती है। हालांकि अधिक प्रत्याशियों का चुनाव लड़ना, स्वच्छ सहभागिता और जनमत को बढ़ाता है परंतु इसमें संबंधित मूल्यों का अभाव होता है क्योंकि प्रत्याशी बिना जानकारी और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सहभागिता करते हैं। कुछ जन सेवकों का तो जनसेवा से कोसों दूर का रिश्ता होता है। मतदाताओं में भी जागरूकता की कमी है जो प्रतिनिधियों का चुनाव पूर्वाग्रह, जातिवाद, भाई- भतीजावाद और लालच में पड़कर चुनते हैं । क्या ऐसा प्रत्याशी गांव का विकास करेगा? यही कारण रहा कि मूलभूत आवश्यकताओं में भी ग्राम पंचायतों में आवंटित करने पर नैतिक मूल्यों और पात्रता को ध्यान में नहीं रखा जाता। मूलभूत आवश्यकताएं जैसे मकान, राशन कार्ड और अन्य प्रकार की सुविधाएं भी देख कर के दिए जाते हैं। उसमें यह देखा जाता है कि कौन सा मतदाता हमें वोटिंग किया है और आगे कौन करेगा ? उत्तर प्रदेश में 15 अप्रैल से 29 अप्रैल के बीच चुनाव संपन्न हो रहे हैं ।क्या इस बार भी मतदाता उन्हीं भावनाओं से ग्रसित होकर मतदान करेगा? मतदान केवल मतदाता का प्रतिनिधि निर्धारित नहीं करता ,अपितु क्षेत्र ,ग्राम और देश का भविष्य भी निर्धारित करता है ।
मतदाताओं को चाहिए कि अपनी मूलभूत समस्याओं की पहचान करें, उस क्षेत्र विशेष की समस्याओं को जाने और कौन सा प्रत्याशी उन समस्याओं को दूर करने में अपनी महती भूमिका अदा कर सकता है ,उसी को अपना समर्थन देना चाहिए । क्योंकि निष्पक्ष मतदान ही निष्पक्ष और स्वच्छ लोकतंत्र के मूल्यों को बढ़ाता है। इससे लोकतांत्रिक सहभागिता में प्रगति होती है। लोकतांत्रिक मूल्य और संस्कृति का विकास होता है। धर्म, जाति ,समुदाय एवं वर्ग को देखकर यदि मतदान किया जाता है तो सहभागिता और मूल्यों दोनों के विकास में बाधा हैं। पंचायतों के चुनाव में अधिकतम यह देखा जा रहा है कि प्रत्याशी कम पढ़े लिखे या बिल्कुल पढ़े लिखे नहीं होते हैं। ‌हालांकि नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता कम पढ़े लिखे में भी हो सकती है फिर भी शिक्षा का आधार सुनिश्चित होना चाहिए। मतदाता भी अपना प्रत्याशी योग और जागरूक व्यक्ति को चुने ।जिससे लोकतांत्रिक सहभागिता बढे । एक पंचवर्षीय विकास नहीं होता तो मतदाताओं को मतदान करने में रुचि नहीं रहती उनकी ऐसी धारणा बन जाती है।( ‘ को नृप होय हमें का हानी’ ) मतदान नागरिक का मूलभूत अधिकार है। इसका प्रयोग सोच समझ कर करना चाहिए। क्योंकि जब गांव आत्मनिर्भर बनेंगे तभी देश का विकास होगा। गांधी जी ने गांव को आत्मनिर्भर बनाने की संकल्पना दिया ।उनका मानना था कि जब गांव आत्मनिर्भर होंगे तभी देश का विकास हो सकता है। गांधी जी के शब्दों में ” जब पंचायत राज स्थापित हो जाएगा,
तब लोकमत ऐसे भी काम कर दिखाएंगे जो हिंसा कभी नहीं कर सकती”

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