मत- मतांतर : इस्लाम ने अपना पहला क़दम दक्षिण भारत में रखा…

कुफ़्र
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इस्लाम ने अपना पहला क़दम दक्षिण भारत में रखा… मान्यता है कि यह लगभग तब की ही बात है जब अरबी पयम्बर मुहम्मद साहब ने उगते सूर्य के सामने अपनी पलकें मूंदे यह फ़रमाया था– “जाओ! हिन्दूस्तान की ओर… जहाँ से मुझे दीं की खुश्बू आती है..!”

जब यूरोप और अमेरिका लोहे के हथियार लिए मार-काट करते वहशियाना-इतिहास लिख रहे थे… उस समय भारत का कालिदास स्वर्णिम-लेखनी उठाए किसी यक्ष की प्रेम-याचना को पक्षाभकपासी मेघों पर रच-रच सुलेख कर रहा था… जब मिश्र-रोम-बेबीलोन की चमत्कारी-सभ्यताएँ मिट्टी में विलुप्त हो चुकी थीं… उस समय कोई वीतरागी समूह एलोरा के पत्थरों से देवताओं को प्रकट करने में संलग्न था तथा कोई भिक्षुक-संघ अजंता की विकट-गुफाओं में विरक्त-सौंदर्य की अनुपम छवियाँ अंकित कर रहा था… ऐसी कलात्मक छवियां जिनकी कोई एक लकीर सारे के सारे “रेनसा” को लज्जित कर सकती हो… जब यहूदी-ईसाई और मुसलमानों के बीच “पवित्र कौन” का संघर्ष निरंतर “रक्तपात” से भर रहा था… उस समय दक्षिण भारत में कोई राजराजा विश्व के सबसे विशाल देव मन्दिरों का निर्माण करवा रहा था ताकि लोग अपनी जीवन का वैभव और पीड़ा दोनों को महाजीवन के समक्ष अर्पित कर सकें… निःसन्देह ऐसे सुन्दर देश की सुगंध किसे आकर्षित नहीं करती..!

मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि- “धार्मिक असहिष्णुता की अनुमति दिया जाना एक धर्मनिरपेक्ष देश के लिए अच्छा नहीं है और एक धार्मिक समूह द्वारा किया गया ‘विरोध’ दंगे एवं विवाद में तब्दील हो सकता है, यदि अन्य समूहों द्वारा भी पारस्परिक विरोधी रवैया अपनाया जाए…!”

जस्टिस एन. किरुबाकरन और जस्टिस पी. वेलमुरुगन की पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें तमिलनाडु के पेराम्बलुर जिले के कलाथुर गांव में ग्रामीणों द्वारा मंदिर से संबंधित जुलूस को एक खास रास्ते से निकालने को लेकर याचिका दायर की गई थी, जिसका स्थानीय मुस्लिम विरोध कर रहे थे…!

मद्रास कोर्ट ने अपना फैसला देते हुए कहा– “भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और सिर्फ इस आधार पर कि किसी एक क्षेत्र में एक धार्मिक समुदाय बहुसंख्यक है, तो यह किसी अन्य धर्म के त्योहार या जुलूस निकालने की इजाजत न देने का आधार नहीं बन सकता है. यदि इस दलील को स्वीकार किया जाता है तो इसके चलते ये स्थिति बन जाएगी जहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भारत के अधिकतर इलाकों में जुलूस नहीं निकाल पाएंगे..!”

यह घटना कोई अप्रत्याशित घटना नही है… मुस्लिम समुदाय में फैले “पवित्रतम-गर्व” के परिणामतः ऐसे विकृत-अवसर प्रायः आते रहते हैं जब इस समुदाय का एक बड़ा संकीर्ण-तबका जिसे अपने शुद्ध(मोमीन) होने और अन्य लोगों के पापी(काफ़िर) होने का ‘अटल-वहम’ है… उसके चलते यह समुदाय जहाँ भी बलशाली या बहुसंख्यक होता है वहाँ “अन्य-विश्वासों” को समूल नष्ट करने अथवा उसका खुल कर विरोध करने में तनिक नहीं हिचकता (यद्धपि यह सारे मुस्लिम समाज की बात नही किन्तु उनमें अधिकतर की है)… यहाँ हमे यह याद रखना होगा कि ऐसा दुर्गुण बौद्ध, ईसाई, यहूदी, उग्र-वामपंथियों और “छद्म सेक्युलर” में भी भरपूर मिलता है और अब तो ‘नए हिंदुत्व’ में भी इसका प्रवेश हो चुका है! कुल मिला कर यह एक ऐसा भयानक ‘भावनात्मक-वायरस’ है जो सम्पूर्ण मानव समाज को लीलने पर तुला है..!

बात शुरू होती है इब्राहम और उसके धार्मिक-दृष्टिकोण से… जिसमे एक नई बात थी “कुफ़्र”… यह कुफ़्र भारत या अन्य सभ्यताओं में “पाप” से बहुत भिन्न था… “पाप” में जहाँ अनैतिकता और अमानवीय व्यवहार की विवेचना मिलती है वहीं कुफ़्र में “आदेश की अवहेलना” की अवधारणा है.. और हास्यास्पद यह है कि ये “महान आदेश” लोकतंत्र से या संयुक्त विचार से नहीं अपितु “एकतंत्र” या एक ही व्यक्ति की समझ से थोपे गए होते हैं..! सो इसी “कुफ़्र” की दुहाई दे कर पिछले दिनों उसी दक्षिण भारत के एक कोने में बसे एक गाँव (तमिलनाडु में स्थित) में हिन्दूओं की मान्यता के एक उत्सव को “कुफ़्र” करार दे कर… उसका भरपूर विरोध किया गया(ऐसा भारत के कई अन्य मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में भी होता रहता है)… भारत में इसी “साम्प्रदयिक-अंधता” का भयानक दृश्य रह रह कर धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में दिखता रहता है… हज़ारों वर्षों तक वैदिक-धर्म का सिरमौर रहे हिमालय का हृदय कश्मीर केवल कुछ शताब्दियों में मुस्लिम-धर्मांधता का आखेट हो कर “अत्याचार-व्यभिचार और हत्याओं” की ज़मीन में बदल गया… लाखों कश्मीरी पंडितों को बेघर कर दिया गया.. और कुफ़्र के नाम पर उनको जीवित ही जला दिया गया… दुःखद यह है कि उनके समर्थन में देश और विदेश के मुसलमानों का विशाल तबका भी शामिल रहा(और आजतक है)… यह विडम्बना है कि “फिलस्तीन पर इज़राइल के अत्याचार की दुहाई देते मुस्लिम समाज को कोई कश्मीर, कोई बलूचिस्तान और कोई तिब्बत दिखाई नहीं देता…न ही उन्हें अफगानिस्तान में शान्ति के प्रतीक तथागत बुद्ध का प्रशांत मुख ही डायनामाइट से धड़ाम कर उड़ता याद आता है..!”

मद्रास कोर्ट ने अपने निर्णय में यह बात स्पष्ट की है कि यदि इस देश मे साम्प्रदयिक आधार पर असहिष्णुता का वातावरण पैदा किया गया तो अल्पसंख्यक समुदाय को देश भर में समस्याओं का सामना करना होगा… यह बात कितनी न्यायप्रिय है कि भारत की अदालत इस निर्णय के समय भी अल्पसंख्यक वर्ग का ध्यान रखते हुए ही यह निर्णय दे रही है… जबकि यदि यह विवाद किसी भी मुस्लिम बाहुल्य देश मे होता तो इसके निर्णय का अनुमान उतना सरल होता जितना कि सरल होता है जून में सूरज की गर्मी का..! वस्तुतः भारत की जनता (हिन्दू-मुस्लिम) में साम्प्रदायिक-सद्भाव सदियों से व्याप्त रहा है(कुछ बड़ी वैमनस्यताओं के पाश्चत भी) किन्तु पिछली एक सदी में जबसे “तब्लीक-संस्कृति” या “वहाबियों के विचार” का प्रचार मुस्लिम समुदाय में बढ़ा है तबसे “मोमिनगिरी” नाम का वायरस भारतीय उपमहाद्वीप में तबाही मचा रहा है… मुस्लिम बौद्धिक समाज में उर्दू के महान शायर “सर इकबाल” इस वायरस के सबसे बड़े संवाहक सिद्ध हुए हैं.. उनकी कविताओं में “ग़ज़वाए-हिन्द” की बू साफ साह सूंघी जा सकती है… चुँकि वह वहाबी विचारों से ग्रस्त थे अतः उनके लेखन में “फासिज़्म” का ज़हर बड़ी चाशनी में डूब कर छलकता है… यद्धपि इकबाल की शायरी में एक विद्रोह भी मिलता है रवायत से किन्तु वह भी “इस्लामी-शासन” का बिगुल ही बजाने का काम करता है… परन्तु मैं इसमे इकबाल का दोष कम मानता हूँ … वह केवल एक “मज़हबी शायर” थे जो अपने समाज को जगाने और आगे बढ़ने को कहते हैं… जो हर मज़हबी शायर करता है… लेकिन कष्ट यह है कि उसी इकबालिया-सोच के सहारे “अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी” तथा “जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी” से निकलने वाली मुस्लिम-विद्वानों की एक बड़ी खेप “वैश्विक-यथार्य” से जुड़ने की बजाय “झूठे-दम्भ” की प्रचारक बन जाती है… जो अंततः मुस्लिम समाज के ही विरुद्ध होती जा रही बात है..!

मैं अपने जीवन मे अनेक मुस्लिम मित्रों से जुड़ा हूँ जो भारत की मिट्टी को मुझसे भी अधिक चाहते हैं… और जो मुझसे कहीं अधिक “विश्व मानव” हैं… अतः मेरे इस लेख का अर्थ कत्तई मुसलमानो के विरुद्ध विष वमन करना नहीं अपितु मेरा उद्देश्य इस समस्या की ओर उन्ही मुसलमान-साथियों का ध्यान आकृष्ट करना है जो उनके समाज से निकल कर उन्ही को नष्ट करने पर आमादा है… वास्तव में यही वह पल हैं जब भारतीय मुसलमानों को इस तरह की विकृत सोच की आलोचना करते हुए कोर्ट के निर्णय का स्वागत करना चाहिए और राष्ट्र की “सेक्युलर-छवि” को सच साबित करना चाहिए..!

दुनिया भर में जितने भी सम्प्रदाय हैं वह सब अपने अपने ढंग से समाज की एकजुटाता की बात करते रहे हैं… और यह बहुत सुंदर भी था… परन्तु आज के परिपेक्ष्य में जब हम “वेब-विश्व” का अंग हो चुके हैं.. जब हम “फास्टफूड-टेबल” पर ही भोजन करते हैं… और जब हमारे मनोरंजन का बड़ा अंग “नेटफ्लिक्स” जैसी “स्क्रीन” पे उभरता है…आज हममें से कोई भी स्वयम को “ग्लोब से काट कर” समय मे बना नही रह सकता ऐसे में मुसलमानों का विश्व को “चाँद-तारे” वाले झंडे के नीचे ले आने का स्वप्न उन्हें “आत्मघाती” बनाता जा रहा है… जब संसार चंद्रमा और मंगल पर मनुष्य के लिए नगर बनाने के प्रयास में लगा हो ऐसे में चौदह सौ साल पहले की नीतियों के आधार पर “पवित्र-अपवित्र” की व्याख्या करते हुए उग्रवादी हो जाना वास्तव में स्वयम सबसे बड़ा कुफ़्र सिद्ध होगा जो यक़ीनन अल्लाह को भी पसन्द नही आता है… क्यों कि अबू हुरैरा से वर्णित हदीस है के- ‘एक आदमी ने पैगंबर (ﷺ) से कहा, “मुझे सलाह दीजिये!” पैगंबर (ﷺ) ने कहा, “गुस्सा करने से बचो और उग्र मत बनो।” आदमी ने (वही) बार-बार पूछा, और पैगंबर (ﷺ) ने प्रत्येक मामले में कहा, “क्रोध से बचो..!”

ओमा The अक् ©(लेखक के अपने निजी विचार हैं) 

(तमिलनाडु में हुए धार्मिक विवाद और ऐसे ही कई दृश्यों के प्रभाव में लिखी मन की बात)

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