मानवीय-पारिवारिक मूल्य बनाम कोरोना

एन के सिंह

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जहाँ कोरोना महामारी दुनिया के अस्तित्व का संकट और मनुष्य के जीवन-मरण का सवाल बना हुआ है वहीँ भारतीय समाज के लिए एक नयी समस्या है –मानवीय-पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों से बंधे रहने की. पश्चिमी समाज की संरचना से अलग भारतीय समाज प्राथमिक संबंधों पर आधारित है और उसी के अनुरूप हजारों साल से उसके वैल्यू सिस्टम का विकास हुआ है. मां-बच्चे के सम्बन्ध (फिलीअल रिलेशंस), चाचा-भतीजे का रिश्ता(एवनक्युलर रिलेशंस), भाई-बहन (सिबलिंग रिलेशंस), पारिवारिक प्रतिबद्धता के नोर्म्स भारतीय समाज में और खासकर ग्रामीण परिवेश में बिलकुल अलग होते हैं. उसी तरह पड़ोसियों और गाँव के लोगों के साथ अंतरक्रियाओं में गरीबी-जनित कटुता चाहे जो भी हो, संकट के समय नजदीक रहना उस वैल्यू सिस्टम का अपरिहार्य अंग है. मुश्किल यह है कि वैज्ञनिक विमर्श में कोरोना इसकी इज़ाज़त नहीं देता और अनदेखी हुई तो नजदीक आने वाले व्यक्ति, उसके परिवार और बच्चों को भी लपेट सकता है. अगर पत्नी के अलावा सभी बेटे-बेटी, भाई-बहन (खून के रिश्ते वाले) किसी कोरोना पीड़ित व्यक्ति को आखिरी वक्त में देखने जाते हैं या मरने के बाद शमशान और बहु-स्तरीय १३-दिवसीय कर्मकांड में भाग लेते हैं तो संक्रमण के खतरे को रोकना नामुमकिन है क्योंकि ऐसे अवसरों पर मध्यम और निम्न वर्ग में सबके लिए अलग-अलग कमरा असम्भव होता है. एक उदाहरण लें. एक ५५-६० साल के व्यक्ति गाँव में अपनी ८५-वर्षीय माता के कोरोना-ग्रस्त होने पर सेवा के लिए बाहर से पहुंचे. अन्य परिजन भी अलग-अलग जगहों से आये. मां की मृत्यु के बाद श्राद्ध में भी लोग आये. परिजनों में कुछ को इन १३ दिनों में लक्षण दिखे. इनमें से एक गंभीर रूप से बीमार पडा. अन्य परिजन उसे बगैर इलाज छोड़ कर नहीं जा सकते थे. जब उनकी मृत्यु हुई तो फिर वही १३-दिवसीय प्रक्रिया और लोगों का इसलिए मजबूरन आना कि अन्य नाते-रिश्तेदार या गाँव के लोग क्या कहेंगें. इस बीच यह बीमारी दर्जनों लोगों में फ़ैल चुकेगी. जिन हजारों वर्ष में ये वैल्यूज बने उनमें न तो आबादी-घनत्व इतना था न हीं महामारी की संक्रामकता के बारे में जानकारी. आज जरूरत है कि ऐसे अवसरों पर केवल एक या दो खून के रिश्ते वाले हीं मरीज की तीमारदारी के लिए रहें और वह भी अपने परिवार को किसी सुरक्षित रिश्तेदार के घर रख कर. और कर्मकांड के आडम्बरों को कम से कम रखा जाये ताकि भावी पीढी सुरक्षित रहे. मरने के बाद चार दिन में किसी खुली जगह पर घर के मात्र तीन-चार लोग सामाजिक दूरी बनाते हुए हवन करवा दें. जिसका लाइव वीडियो सभी रिश्तेदारों को उपलब्ध हो. शायद यह नयी व्यवस्था हीं मरने वाले को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

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