माटी के लाल : कभी बाबू विश्राम राय की दस्तखत से समाजवादी मुलायम को टिकट मिला था

माटी के लाल आजमगढ़ियों की तलाश में..

०पूर्वांचल के गांधी बाबू विश्राम राय ने आजमगढ़ को समाजवादियों का केरल बना दिया था…

० बाबू साहब के लिए 1953 में रामगढ़ बूथ पर उनके एजेंट तक बन गए राजनायायण
@ अरविंद सिंह #बाबूविश्रामराय
आजमगढ़ का बीबीपुर गांव याद है न!, वैसे आप इसे भूलना भी चाहें तो भी भूल नहीं पाएंगे. क्योंकि यह कोई साधारण गाँव नहीं है, बल्कि आजादी के दीवानों, लोकतंत्र के प्रहरियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का मादर-ए- वतन है.. यह एक तरह से सियासत की नर्सरी और विचार धाराओं को तैयार करने वाली देश के शिल्पकारों की सरजमीं रही है.
आज के समय में यह चाहे जिन वजहों से जाना जाए, लेकिन आजादी से पहले और इसके ठीक बाद जिन महान और बड़ी शख्सियतों के कारण, बीबीपुर लोगों की जुबान पर था- वो सभी नाम, एक पूरी विचारधारा और संघर्ष के पर्याय थे. आजादी के दीवाने और लोकतंत्र के सजग पहरूएं थे.
स्मृतिशेष लोकतंत्र सेनानी -दीनपाल राय से एक साक्षात्कार में हमने इस गाँव के इतिहास को जानने की कोशिश की थी और तब यह एहसास होने लगा था कि- “कैसे कोई भूखंड अपने जने हुए मानवों से महान और गर्वित हो जाता है” बाबू रघुनाथ राय जो 1897 में इसी बीबीपुर गाँव के उत्तर पट्टी में पैदा हुए थे. जो महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और कांग्रेस के बड़े नेता थे. दीनपाल इन्हीं के पुत्र थे.शिवराम राय गाँव के दख्खिन पट्टी में पैदा हुए थे, जो अपने समय में कांग्रेस के बड़े राजनेता और देश की सबसे बड़ी पंचायत के सदस्य भी थे.जबकि पूर्वांचल के गांधी के नाम से जाने गये बाबू विश्राम राय बरस 1910,10 जनवरी को पैदा हुए थे.
यहाँ बात हो रही है बाबू विश्राम राय की.
कहते हैं जमीदार परिवार से होने के बाद भी ये महामानव संत सा जीवन बिताया और आखिरी वक्त तक बिजली की लाइट और पंखे की हवा कैसी होती है नहीं जाना, चाहे विधायक बने या एमएलसी. उनका मानना था कि- “जिस समाज में लाखों- लाख लोग बगैर बिजली के, अंधेरे में जीवन बसर कर रहे हैं, उस समाज के प्रतिनिधि को ऐसी सुविधाओं का भोग करने का कोई अधिकार नहीं है ”
आजमगढ़ के अराजीबाग में डा० ओमप्रकाश कुशवाहा के मकान में किसी मनीषी की तरह सादगी भरे जीवन को ‘समाजवाद की जमीन’ तैयार करने में काट दिया. प्रारंभिक शिक्षा गाँव के पाठशाला से ग्रहण करते हुए हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के लिए नगर के सबसे प्रतिष्ठित कालेज वेश्ली कालेज की ओर रूख किया और उच्च शिक्षा हेतु तबके एक सबसे बड़े केन्द्र बीएचयू गयें. जहाँ वे स्नातक (बीए) किए.
विश्राम राय सोशलिस्ट थे और लोहिया के समकालीन. अविभाजित आजमगढ़ की जमीन जिन महान लोगों के त्याग और आदर्श के कारण ‘समाजवादी’ बनी. उसकी प्रारंभिक बीजारोपण करने वाले बाबू विश्राम राय ही थें, जिनके कारण समाजवादी आचार्य राममनोहर लोहिया लगभग 50 बार आजमगढ़ आएं होगें. यहाँ की गली-गली और गांव-गाँव में सभाएं कर समाजवाद का पौधा रोपण किया है. आजमगढ़ की धरती किसी पार्टी या उसके नेता के कारण समाजवादी नहीं हुई, बल्कि ऐसे महान समाजवादियों के कारण हुई. हमारे समय के सबसे बड़े समाजवादी कूनबे के नेता मुलायम सिंह यादव के भी, एक समय में नेता और आदर्श, यही बाबू विश्राम राय ही थे. और बाबू विश्राम राय के दस्त़खत से मुलायम जैसे लोगो को टिकट मिला था. बाबू साहब के अंतिम समय तक मुलायम ने उन रिश्तों को निभाया भी.
पहली बार लोहिया ने 1946 में समाजवादी विचारों को लेकर अतरौलिया के अतरैठ बाजार में एक जनसभा किया . फिर तो विश्राम राय के कारण यह समाजवादी सिलसिला चलता ही रहा और देशभर के समाजवादी आजमगढ़ में जुटते रहें.
बरस 1952 के विधानसभा चुनाव में जब विश्राम राय कांग्रेस के शिवराम राय से हार गये तो, पूरे सोशलिस्ट विचार मंथन करने लगे कि- ‘यह हार केवल बाबू विश्राम राय की नहीं, बल्कि समाजवादी विचारधारा की है’.और फिर 1953 के विधानसभा के उपचुनाव में समाजवादी विचारक बाबू विश्राम राय को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट से सगड़ी सीट से कांग्रेस के मुकाबले उतारा गया. आचार्य नरेन्द्रदेव, लोहिया, जयप्रकाश नारायण. प्रोफेसर मुकुट बिहारी लाल, राजनारायण सरीखे समाजवादी नेताओं ने यहाँ जैसे कैंप कर दिया था. लोहिया ने तो एक सप्ताह तक आजमगढ़ की जमीन को पग-पग से माप दिया था. यहीं बाबू विश्राम राय के चुनाव में सगड़ी के रामगढ़ बुथ पर ‘राजनारायण’ स्वयं एजेंट तक बन गए. यह समाजवादी विचारधारा और पार्टी के प्रति त्याग व समर्पण की पराकाष्ठा थी. जिसे समाजवादियों ने एक मिसाल के रूप में जनमानस में स्थापित किया. यही पर बाबू विश्राम राय के नेतृत्व में 1953 में ही ‘भूमि आंदोलन’ की शुरुआत हुई जिसमें लोहिया ने अविभाजित आजमगढ़ की मधुबन से लेकर फूलपुर तक सभी छह तहसीलों तक जनसंवाद किया था. कम्युनिस्टों का केरल भले केरल की सरजमीं थी, लेकिन आजमगढ़ सोशलिस्टों का केरल था. जहाँ समाजवादी विचारों की खेती करने वाले आचार्यों ने तबके समय की सत्तासीन पार्टी कांग्रेस से मोर्चा लिया था और 6 की 6 सीटों को जीतकर सोशलिस्टों का झंडा गाड़ दिया. इस सबके मूल में बाबू विश्राम राय का त्याग, सादगी पूर्ण जीवन और विचारधारा के प्रति दीवानगी थी.
महात्मा गांधी और उनके विचारों से प्रभावित बाबू विश्राम राय आजमगढ़ के गांधी बन गये. और जीवन पर्यंत उन मूल्यों की रक्षा करते रहे.
1962 में जब प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के राज्यसभा का टिकट पूर्वांचल के इस गांधी को मिला तो इस समाजवादी विचारक और मनीषी ने चन्द्रशेखर को अपना यह टिकट देते हुए कहा कि- “इस टिकट को चन्द्रशेखर जैसे प्रखर वक्ता और सोशलिस्ट की जरूरत है, जो दिल्ली पहुंचकर समाजवादी आवाज़ को मुखर करेगा ” जबकि बाबू साहब के इस निर्णय से लोहिया संतुष्ट नहीं थे. इस बात को पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने स्वीकार भी किया और अपने किताब में लिखा भी है कि-आजमगढ़ के बाबू विश्राम राय का सादगी भरा जीवन और राजनीतिक समझ बहुत ऊंचा थी
उच्च कुलीन भूमिहार जाति में पैदा होने के बाद भी बाबू साहब ने 1960 के दशक में पिछड़े और वंचित वर्ग का आगे बढ़कर नेतृत्व किया।
समाजवादी संजय श्रीवास्तव उन्हें याद करते हुए एक घटना का जिक्र करना नहीं भूलते- “बनारस में -आचार्य नरेंद्र देव जी का जन्म शताब्दी समारोह कार्यक्रम था. तमाम विद्वान उपस्थित थे,तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी भी थे. देश के शीर्ष नेताओं की उपस्थिति में इटावा के समाजवादी कैप्टन आनंद भदौरिया ने संबोधित करते हुए कहा था कि-“पूरा जनता दल और पूरी कांग्रेस पार्टी, बाबू विश्राम राय जी के घुटने के बराबर नहीं है”. यही कारण है कि कांग्रेस के शिखर के दिनों में भी बाबू विश्राम राय जी के आभामंडल से अविभाजित आजमगढ़ में सोशलिस्ट पार्टी के 6 से 7 विधायक चुने जाते थे, जिसमे रामसुन्दर पांडे, सत्यदेव सिंह, दलसिंगार यादव, दौलत लाल जी, भाभी यादव, भीमा यादव,पदमाकर लाल जैसे अन्य लोग भी शामिल थे। बाबू साहब अनेकों बार सदन का सदस्य रहने के बाद भी पेंशन नहीं लेते थे।
बरस 74 का विधान सभा चुनाव पूरे सबाब पर था- आजमगढ़ सीट पर बाबू विश्राम राय के मुकाबले उनके ही चेले कांग्रेस दल से भीमा यादव मैदान में थे. एक दिन की घटना है कि- आजमगढ़ के साहित्यिक मंचों के संचालक शिरोमणि दानबहादुर सिंह- ‘सूंड फैजाबादी’ नगर के शंकरजीमूर्ति तिराहे से गुजर रहे थे. देखा कि- बाबू साहब मोती मिठाई वाले के पास चारपाई बिछाकर सो रहे हैं और उनकी गाड़ी (जीप) बगल में खड़ी है. यह देख सूंड जी को आश्चर्य हुआ कि चुनाव चल रहा है लोग प्रचार कर रहे हैं और बाबू साहब हैं कि सो रहे हैं- उन्होंने जब उन्हें उठाया तो बाबू साहब उठकर कहें – ‘दानबहादुर! गाड़ी का तेल खत्म हो गया है, इसलिए खड़ी हो गयी है. सूंड अब तक समझ चूके थे कि सादगी के प्रतीक इस फकीर के पास पैसा नहीं है, इस लिए गाड़ी खड़ी हो गयी है, उन्होंने ड्रम में तेल मंगवाया तो बाबू साहब आगे के प्रचार में गये.” और जब चुनाव परिणाम आया तो उन्होंने भीमा यादव को 21 हजार से अधिक मतों से हराया. यह थे बाबू विश्राम राय.
एकबार अपने घर पर सुबह- सुबह दातून कर रहे थे. आजमगढ़ के पुलिस कप्तान ओपीएस मलिक उनसे मिलने पहुंचे थे लेकिन वे बाबू साहब को पहचानते नहीं थे.
उन्होंने दातून करते हुए बाबू साहब को नौकर समझ बोला “जाओ! विश्राम राय जी से बोलो मैं( पुलिस कप्तान) मिलना चाहता हूँ. बाबू साहब ने कहा ठीक है आप बैठिए मैं बुलाता हूँ- जब दातून कर लिए तो आगे आकर बोले! जी बताएं मैं ही विश्राम राय हूं..! ” इससे मलिक इतना प्रभावित हुए कि- उन्होंने कहा-मैंने अपने पूरे जीवन में इतनी सादगी और त्यागी चरित्र वाला महापुरुष नहीं देखा.
बाबू विश्राम राय राजनीति की पूरी एक पाठशाला थे, जिसमें मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक निकले. इस पाठशाला ने समाजवादी नर्सरी तैयार किया और रामनरेश यादव से लेकर चन्द्रशेखर जैसे लोगो को प्रशिक्षित और दीक्षित किया. जीवन भर सादगी और समर्पण से समाज का निर्माण किया और 19 दिसम्बर 1990 में समाजवादी यह विचारक, लखनऊ में हमेशा हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया, जिसे कंधा देने स्वयं मुलायम सिंह यादव आए थे. समाजवादियों की यह धरती बाबू विश्राम राय के योगदान को कभी भूला नहीं सकती.

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