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2022 की सियासी चौपड़ पर शह और मात का खेल शुरू- राजीव कुमार ओझा

ByAmarjit Rai

Jun 17, 2021

उत्तर प्रदेश विधान सभा 2022 के सियासी चौपड़ पर जोड़-तोड़, शह और मात का खेल शुरू हो चुका है।भाजपा के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है जबकि गैर भाजपा दलों के समक्ष भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकने का लक्ष्य है।

2022 के चुनाव मे भाजपा की राह बहुत मुश्किल है।पार्टी के भीतर खाने हिन्दूवादी गुट और संघवादी गुट मे घमासान मचा है।हिन्दूवादी गुट योगी के साथ खड़ा है जबकि संघवादी गुट मोदी के साथ।पंचायतों का दौर शुरू है।कहने को तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने कहा है कि 2022 के सियासी रण मे योगी आदित्य नाथ ही भाजपा का चेहरा होंगे लेकिन डैमेज कंट्रोल की भाजपा की कोशिस को योगी सरकार मे उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या यह कह कर पलीता लगा रहे हैं कि 2022 का चुनाव किसके नेतृत्व मे लड़ा जाएगा,कौन होगा पार्टी का चेहरा यह तय करना प्रदेश का काम नहीं है ।यह फैसला केन्द्रीय नेतृत्व करेगा। गौर तलब है कि भाजपा ने 2017 के यू.पी.विधान सभा चुनाव मे ओबीसी वोटरों को साधने के लिए केशव प्रसाद मौर्या को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी थी।भीतर खाने उनको यह भरोसा दिया गया था कि पार्टी जीती तब उनको मुख्यमंत्री बनाया जाएगा।

चुनाव परिणाम आने के बाद नाटकीय तरीके से भाजपा ने  यू.पी.मे पार्टी के ओबीसी चेहरे केशव मौर्या को धता बताते हुए योगी आदित्य नाथ की ताजपोशी कर दी। योगी की ताजपोशी के समय  केशव मौर्या का कोपभवन मे जाना, मुख्य मंत्री तय करने के लिये चला मैराथन बैठकों का दौर किसी से छिपा नहीं है। केशव मौर्या 2022 के चुनाव मे योगी के नाम पर सहमत होंगे उनके हालिया बयानों से ऐसा लगता नहीं है।2022 के चुनाव मे भाजपा का चेहरा कौन होगा ? इसे लेकर भाजपा के भीतर खाने संघर्ष जारी है। यह  दीगर बात है कि मीडिया मैनेजमेंट मे माहिर भाजपा भीतर खाने के संघर्ष की पर्दापोशी मे जुटी है।काफी हद तक वह इस पर्दापोशी मे सफल होती दिखती है।यू.पी. मे भाजपा के भीतर खाने जारी सत्ता संघर्ष की खबरों से ध्यान भटकाने के लिये खबरिया चैनलों पर पंजाब मे कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू- ,राजस्थान मे अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जारी जुबानी जंग का शोर है।

भाजपा को 2022 के चुनाव मे खुद के घर मे लगी असंतोष की आग झुलसाएगी वहीं उसके फुटकरिया सहयोगी दलों की प्रेशर पलिटिक्स भाजपा को घुटने टेकने को मजबूर करेगी।कोढ़ मे खाज योगी सरकार का परफार्मेंस बनेगा।इसमे कतई कोई संशय नहीं है कि योगी सरकार जनाकांक्षाओं की कसौटी पर एक असफल सरकार सिद्ध हुई है।कानून व्यवस्था, रोजगार,भ्रष्टाचार ,कोरोना प्रबंधन के मोर्चे पर योगी ने अवाम और  भाजपा नेतृत्व को निराश किया है।

योगी की कार्यपद्धति का आलम यह रहा है कि उनके खिलाफ भाजपा के 200+ विधायकों ने धरना देकर भाजपा आलाकमान  को अपने असंतोष की जानकारी दी थी।कोरोना कुप्रबंधन को लेकर योगी सरकार ,मोदी सरकार के मंत्रियों,सांसदों, विधायकों ने खतो किताबत भी की और सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरिये भी अपना आक्रोश सार्वजानिक किया।योगी के खिलाफ भाजपा विधायकों मे असंतोष का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अधिकांश विधायक रोना रोते हैं कि उनकी न तो अधिकारी सुनते हैं, न ही योगी जी सुनते हैं। भाजपा विधायक प्रेस कांफ्रेंस कर यह कहने से गुरेज नहीं  करते कि हम यदि सच बोलेंगे तब हमारे खिलाफ भी योगी सरकार देशद्रोह की एफआईआर करा देगी।

सच तो यह है कि भाजपा जैसा फलक पर दिख रही है,मीडिया मैनेजमेंट कर जैसा खुद को दिखा रही है ,जमीनी सच उसके उलट है।

एक तल्ख हकीकत यह भी है कि अब योगी- मोदी का किरदार अजेय योद्धा का नहीं  रह गया है।बंगाल के जनादेश ने यह बात सिद्ध की है।भीतर खाने योगी का मुखर विरोध बताता है कि वह दिन दूर नहीं जब भाजपा के भीतर खाने मोदी के खिलाफ पनपता असंतोष भी फलक पर आ जाए। बहरहाल यू.पी.चुनाव मे हिन्दूवादी गुट और संघवादी गुट के बीच संघर्ष का ऊंट किस करवट बैठेगा फिलहाल कहना मुश्किल है। लेकिन यह तय है कि  भाजपा के लिए 2022 मे अपना किला बचा पाना टेढ़ी खीर है।उसके सामने एक तरफ  केशव मौर्या की नाराजगी के सबब ओबीसी वोट बैंक की नाराजगी का खतरा है वहीं योगी की अनदेखी से हिन्दूवादी वोट बैंक के खिसक जाने का खतरा है। भाजपा के लिये इधर कुंआ उधर खाई की स्थिति है।

फिलहाल 2022 के सियासी चौपड़ पर फाईनल मुकाबला भाजपा+ और सपा+ के बीच ही होता दिख रहा है।कांग्रेस और बसपा की भूमिका 2022 के सियासी मैच मे एक्स्ट्रा प्लेयर की होगी।सपा ने बसपा सुप्रीमो को धीरे से जोर का झटका दिया है ।मायावती ने जाने अनजाने बसपा के कद्दावर नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाने का जो आत्मघाती फैसला किया था उसका खामियाजा बसपा को पार्टी के 9 विधायकों की बगावत के रूप मे उनको भुगतना पड़ा है।पार्टी टूट के कगार पर खड़ी है।बसपा के 9  बागी विधायकों की मुलायम के सियासी वारिस अखिलेश यादव से हुई मुलाकात ने सपा के खाते मे  शुरूआती बढ़त दर्ज की है।

2022 के चुनाव मे ओबीसी वोटर गेम चेंजर बनने जा रहा है।जो परिस्थितियां हैं उनके आलोक मे हम कह सकते हैं कि ओबीसी वोट बैंक सपा के साथ जा सकता है।इस वोट बैंक मे भाजपा से खफा और निराश ओबीसी वोटर भी हवा का रुख भांप कर सपा + के साथ जा सकता है।सपा ने बड़े करीने से सियासी चौपड़ पर अपने मोहरे सजाने शुरू किये हैं। छोटे दलों से प्री पोल गठबंधन की रणनीति सपा की सियासी संभावनाओं को मजबूत करेंगे।

सपा का कमजोर पक्ष शिवपाल यादव हैं जिनको साधने की जुगत मे भाजपाई रणनीतिकार पर्दे के पीछे सक्रिय हैं। मुलायम परिवार की छोटी बहू अपर्णा विष्ट यादव की योगी आदित्य नाथ से गौशाला के जरिये नजदीकियां भी सपा की राह मे स्पीड ब्रेकर बन सकती हैं।

यू.पी .के चुनाव जातिय गोलबंदी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के पाले मे ही लड़े जाने हैं यह आज की सियासत का कटु सत्य है। जन सरोकारों से जुड़े सवाल अब चुनावी मुद्दे नहीं बनते यही वजह है कि चुनाव जातिय गोलबंदी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के हथियार से लड़े जाते हैं।

देखना दिलचस्प होगा कि 2022 के यू.पी.विधान सभा के चुनाव का जनादेश जातिय गोलबंदी की सियासत के पक्ष मे होगा या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के पक्ष मे ?

लेखक के अपने विचार है।

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