माटी के लाल : मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर सीधे रिक्शा पे बैठ घर चले गएं..

माटी के लाल आजमगढ़ियों की तलाश में..

०मध्यप्रदेश के राज्यपाल के रूप में कार्य किया

@अरविंद सिंह #रामनरेश_यादव

70 का दशक, देश की पोलिटिकल पावर सेंटर के रूप में इंदिरा गांधी का कोई मुकाबला नहीं था. इंदिरा को इंडिया का पर्याय बताने वालों ने इस ‘गूंगी गुड़िया’ का तेवर और कलेवर दोनों ही देख लिया था. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सीट रायबरेली की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती देने वाले सोशलिस्ट राजनारायण ने इस पावर सेंटर के नाक में दम कर दिया था और हाईकोर्ट से आए फैसले ने इंदिरा गांधी के नीचे की जमीन खिसका दिया. इन परिस्थितियों से तत्काल निपटने के लिए देश की सर्वोच्च सत्ता शिखर पर बैठी इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगा, पूरे देश को कै़दखाने में बदल दिया. विरोध और विषम परिस्थितियों को देखते हुए जनवरी 1977 को लोकसभा भंग करते हुए मैडम इंदिरा ने आमचुनाव कराने की घोषणा कर दिया. 23 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ, राजनैतिक बंदी जेलों से छोड़ें गये. लेकिन देश इंदिरा के इस तानाशाही से अंदर तक आहत था- परिणाम स्वरूप 1977 में तीन दशक बाद, पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार, जनता पार्टी की प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी.
‘इसी 1977 के चुनाव में आजमगढ़ से जनता पार्टी के टिकट से जिस राजनेता ने दिग्गज कांग्रेस नेता चन्द्रजीत यादव को भारी वोटों से हराया. उन्हें अगले कुछ महिनों बाद ईनाम के रूप में (यानि 23 जून 1977 को) सीधे देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया. तबके गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह ने उस समय मुलायम सिंह यादव से, आजमगढ़ के इस यादव को ज्यादा बड़ा नेता माना और उत्तर प्रदेश जैसे विशाल आबादी को सौप दिया. लेकिन हार की बौखलाहट से तिलमिलाए इंदिरा गांधी ने सत्ता में पुनः वापसी की विसात बिछाने शुरू कर दिए थे.1978 में कांग्रेस और इंदिरा कांग्रेस में बंटे संगठन में इंदिरा, अपने हिस्से की कांग्रेस में पचास के करीब एमपी को लेकर जनता पार्टी की आंधी से टकराने की दिलेरी दिखाते हुए मैदान में उतर गयी और 1978 के लोकसभा उपचुनाव में आजमगढ़ सीट से मोहसिना किदवई और अपने कर्नाटक के घाटियों के बीच बसे चिकमंगलूर से वापसी की. चिकमंगलूर सीट के चयन के पीछे राजनीतिक कारण थे. आपातकाल का असर दक्षिण में उत्तर भारत से कम था और कर्नाटक कांग्रेस का क्षेत्र था. यहाँ के मुख्यमंत्री देवराज ने नारा दिया था-
” एक शेरनी,सौ लंगूर- चिकमंगलूर ..चिकमंगलूर..! ”
दरअसल, “आपातकाल के बाद इंदिरा की आंधी चिकमंगलूर से उठी और उसका तूफ़ानी सियासी बवंडर उत्तर भारत के आजमगढ़ तक पहुँच गया. यहाँ भी इंदिरा कांग्रेस की उम्मीदवार मोहसिना किदवई की जीत हुई और जनता पार्टी की आंधी..जैसे गुबार बन कर उड गयी. यह इंदिरा कांग्रेस की वापसी थी. या यूँ कहें कि जिस इंदिरा को एक साल पहले जो जनता, उत्तर भारत के हिंदी पट्टी से एक सीट तक नहीं दी, उसके लिए इन विजयों ने देश की सियासत, खास तौर पर ‘भानुमती का पिटारा’ कहे जाने वाली ‘जनता पार्टी’ के लिए, विस्मयकारी और टर्निंग प्वाइंट थी.जनता पार्टी के प्रत्याशी रामबचन यादव को देश और प्रदेश में अपनी सत्ता के बाद भी हारना पड़ा. मुख्यमंत्री रामनरेश यादव की आजमगढ़ सीट, जिसे वे जनता पार्टी की आंधी में जीते थे, उसे भी बचा नहीं सकें.
और फिर दिल्ली ने इसे रामनरेश यादव की नाकामी के तौर पर लिया, चौधरी चरण सिंह को लगा कि उन्होंने रामनरेश यादव को मुख्यमंत्री बना कर गलत निर्णय लिया और परिणाम स्वरूप उनसे 27 फरवरी 1979 को इस्तीफा लेकर बनारसी दास को मुख्यमंत्री बना दिया गया.
सच तो यह है कि-जिस कुर्सी पर बैठकर रामनरेश ने उत्तर प्रदेश को संभाला, उनकी सादगी इतनी कि उस कुर्सी से जब इस्तीफा दे दिया तो किसी राजकीय वाहन से नहीं, बल्कि रिक्शे पर बैठकर अपने आवास चले गयें.”
यह थे आजमगढ़ के आंधीपुर गांव में 1 जुलाई, 1928 में जन्मे रामनरेश यादव. जिस मुंशी गया प्रसाद ने अंबारी और फूलपुर क्षेत्र में शिक्षा की बयार बहाने की कोशिश आंधीपुर से पूरे क्षेत्र में की, जिसने गांधी, नेहरू और लोहिया की विचारधारा को आत्मसात किया, उनकी संतान के रूप में रामनरेश यादव ने गांधी,नेहरू और लोहिया के सिद्धांतों और दर्शनों को ही अपने जीवन में उतारा. प्राथमिक शिक्षा गाँव की पाठशाला से लेने के बाद वे आगे की शिक्षा के लिए बीएचयू चले गयें, जहाँ उन्होंने बीए, एमए और एलएलबी किया. यही पर उन्होंने एक कालेज में तीन बरस तक बतौर शिक्षक अध्यापन भी किया. इसके बाद जौनपुर के पट्टी के नरेंद्रपुर इंटर कॉलेज में लेक्चरार भी रहे. 1953 में उन्होंने आजमगढ़ में वकालत की शुरुआत की. इसी दौरान उनकी मुलाकात पूर्वांचल के गांधी सोशलिस्ट बाबू बिश्राम राय से हुई. बाबू साहब, लोहिया के समकालीन और खांटी सोशलिस्ट थे. जिनके साथ काम करने से रामनरेश भी समाजवादियों की करीब आ गए. इस समय उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल की सियासत में कांग्रेस और उसकी धुर विरोधी लोहिया, बिश्राम राय, राजनारायण आदि लोग थे. सोशलिस्ट सड़क पर संघर्ष करते थे और कांग्रेसी सत्ता में रहते थे. लेकिन आंदोलन का वाहक सोशलिस्ट ही थे.
इसी दौरान रामनरेश रूचि राजनीति में बढ़ती गई. उन्होंने समाजवादी विचारधारा के तहत जाति तोड़ो,बराबरी के मौके, बढ़े नहर रेट, किसानों की लगान माफी, समान शिक्षा, आमदनी और खर्च की सीमा बांधने, जमीन जोतने वालों को उनका अधिकार दिलाने, अंग्रेजी हटाओ आदि आंदोलनों को लेकर कई बार गिरफ्तारियां दीं. इमरजेंसी के दौरान वे मीसा और डीआईआर के अधीन जून 1975 से फरवरी 1977 तक आजमगढ़ जेल और केंद्रीय जेल नैनी, इलाहाबाद में बंद रहे.

70 के दशक में रामनरेश यादव किसानों के नेता के तौर पर भी उभरे थे. वे मुलायम से बड़े नेता माने जाते थे. इसीलिए 1977 में चौधरी चरण सिंह ने लगातार 3 बार से विधायक रहे मुलायम सिंह यादव को नजरअंदाज कर रामनरेश को मुख्यमंत्री बनाया था. उस वक्त रामनरेश आजमगढ़ से सांसद थे.वर्ष 1977 के चुनाव के बाद हुए उपचुनाव में रामनरेश जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार विधान सभा के सदस्य चुने गए. एटा के विधान सभा क्षेत्र निधौलीकलां से. चौधरी चरण सिंह ने रामनरेश से प्रभावित होकर लगातार 3 बार से विधायक रहे मुलायम सिंह यादव को नजर अंदाज कर के 1977 में राम नरेश यादव को संयुक्त उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्हें दो साल के भीतर ही अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी.
कभी चरण सिंह यूथ ब्रिगेड के सदस्य रहे जदयू नेता केसी त्यागी के मुताबिक ”आजमगढ़ की हार चौधरी चरण सिंह के लिए बहुत ही चौंकाने वाली थी, जिसने रामनरेश यादव से उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली. आजमगढ़ की हार ने चौधरी चरण सिंह को ये भी एहसास कराया कि मुलायम सिंह की अनदेखी कर रामनरेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना उनकी बड़ी भूल थी.”
रामनरेश यादव की सरकार में ही मुलायम सिंह पहली बार राज्यमंत्री बने थे. और पहली बार उनको ‘नेताजी’ भी इसी समय कहा गया था. सरकार तो चली नहीं और मुलायम सिंह यादव राजनारायण का साथ छोड़कर चौधरी चरण सिंह के साथ चले गए

जिस सीएम की कुर्सी से रामनरेश यादव का इस्तीफा लेकर डैमेज कन्ट्रोल करते बनासीदास को मुख्यमंत्री बनाया गया, उसी बनारसी दास के मंत्रीमंडल में उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन 17 फरवरी 1980 को उनकी ये कुर्सी भी चली गई. 1982 में वे चरण सिंह के लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष बने. 1985 में लोकदल से ही विधायक बनने पर उन्हें नेता विरोधी दल की भूमिका मिली. चरण सिंह के लिए अपना विश्वास खो चुके राम नरेश यादव धीरे-धीरे राज नारायण के करीबी बन गए जो खुद एक बागी थे. राजनीति में खासा मोड़ तब आया जब राम नरेश यादव मुलायम सिंह यादव का मुकाबला करने के लिए चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह की बनाई पार्टी में शामिल हो गए और यही वह वक्त था जब वो कांग्रेस में शामिल होने के लिए प्रेरित हुए.

1985 में फिरोजाबाद के विधान सभा क्षेत्र शिकोहाबाद का प्रतिनिधित्व किया. रामनरेश 1988 में राज्यसभा सदस्य बने और 12 अप्रैल 1989 को राज्यसभा के अंदर उप नेता, पार्टी के महामंत्री और अन्य पदों से त्यागपत्र देकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस में आ गये. मतलब ये है कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस विरोधी गतिविधियों से की थी. वे इंदिरा गांधी के खिलाफ केस करके उनके चुनाव को अवैध साबित करने वाले राजनारायण के साथी थे. उनकी विचारधारा से प्रभावित होकर जनता पार्टी में शामिल हुए थे. रामनरेश यादव इमरजेंसी से पहले लगभग 10 बार गिरफ्तार हुए थे. इमरजेंसी के दौरान 19 महीने जेल में रहे.
1988 से 1989 तक लोकदल से राज्य सभा में रहे. 1989 से 1994 तक कांग्रेस से राज्य सभा पहुंचे थे. संसद की पहली मानव संसाधन विभाग की संयुक्त संसदीय समिति के पहले अध्यक्ष (1993) राज्यसभा में राष्ट्रीय जनता पार्टी के उप नेता रहे. 1996 से 2007 तक वो आजमगढ़ के फूलपुर से विधायक रहे. 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने राम नरेश यादव का सावधानी से इस्तेमाल किया. राम नरेश को कांग्रेस ने राज्यसभा में पहुंचा दिया और फिर उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्यता भी मिल गई. पार्टी ने उनको यादवों के बीच कैंपेन करने की भी जिम्मेदारी दी थी. 2011 में जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए तैयारी कर रही थी, तो उसी दौरान राम नरेश को मध्य प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया.
राज्यपाल बनने के बाद रामनरेश के वो दिन आये जो उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा. फरवरी का महीना हमेशा उनके लिए समस्या बनकर आया है. मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री का पद उनको फरवरी में ही छोड़ना पड़ा था. और फरवरी 2016 में ही इनका नाम मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले में आया. वो घोटाला जिसमें 50 से ऊपर लोग मार दिये गये. रामनरेश का बेटा शैलेश यादव भी इस मामले में फंसा था.
कांग्रेस इसके बाद इनसे इस्तीफा मांगने लगी पर इन्होंने इस्तीफा नहीं दिया. जब इनका काफिला राजभवन से रवाना हो रहा था तव एनसीपी के नेता मनोज त्रिपाठी ने आत्मदाह कर लिया. हालांकि पुलिस ने उसे बचा लिया. इससे पहले राज्यपाल के तौर पर 2013 में वो मध्य प्रदेश विधानसभा सत्र को खत्म करने के मसले पर सोनिया गांधी से मिलने गए थे. इस बात को लेकर बहुत विवाद हुआ कि राज्यपाल एक पार्टी प्रेसिडेंट के पास क्यों जा रहा है. 22 नवंबर 2016 को रामनरेश यादव का लखनऊ में निधन हो गया.
( रिसर्च और स्रोत सहयोगी- ऋषभ, लल्लनटॉप, गुगल, जनसंवाद)

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