माटी के लाल : आजाद भारत में घोसी का यह पहला सांसद, भारत के ‘संविधान-सभा’ का सदस्य बना..

माटी के लाल आजमगढ़ियों की तलाश में..

पंडित अलगू राय शास्त्री : आजाद भारत में घोसी का यह पहला सांसद, भारत के ‘संविधान-सभा’ का सदस्य बना..

० हिन्दी को पहली राजभाषा और उर्दू को दूसरी बनाए जाने की मांग की थी.

@ अरविंद सिंह #अलगूरायशास्त्री

“24 जनवरी 1950 को भारत के संविधान सभा की आखिरी बैठक चल रही थी. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर सहित तमाम गणमान्य सदस्य उपस्थित थे. उसी सभा में संयुक्त प्रांत ( अब के उत्तर प्रदेश) के पूर्वी पट्टी के आजमगढ़ से एक विद्वान उठकर सीमांत और पूर्वोत्तर राज्यों जम्मू -कश्मीर, असम आदि के रास्ते विदेशी घुसपैठियों के भविष्य के आमद को देख रहा था और इसको लेकर संविधान सभा को अगाह करते हुए संशोधन का प्रस्ताव रख रहा था, कुछ बुद्धिजीवी उसकी बातों पर परिहास कर रहे थे, लेकिन लगभग आठ दशक बाद जब उसी जम्मू कश्मीर के रास्ते पाकिस्तानी घुसपैठ की ख़बरें आती हैं तो अनयास ही हम सोचने लगते हैं कि वह विद्वान कितना दूरदर्शी और बौद्धिक चेतना से भरा हुआ था.”
क्या आप जानते हैं वह कौन था- जी हाँ, वह अविभाजित आजमगढ़ के घोसी लोकसभा क्षेत्र के पहले सांसद पंडित अलगू राय शास्त्री थे. जो भारतीय संविधान सभा के संयुक्त प्रांत यानि यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश) से सदस्य चयनित थे. यह सभा नये भारत के संविधान का निर्माण कर रही थी और ये बैठक अब के संसद भवन के सेन्ट्रल हाल या कांस्टिट्यूशनल हाल में चल रही थी.
पंडित अलगू राय शास्त्री आजाद भारत के आजमगढ़ पूर्व यानि घोसी सीट से दिल्ली पहुंचने वाले कांग्रेस के पहले राजनेता, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, विधि विशेषज्ञ, शिक्षाविद और आर्यसमाजी थे. वे कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष भी थे.
जो आजादी से पहले स्वतंत्रता संग्राम में ब्रितानिया हुकूमत के विरुद्ध आवाज उठाने पर परिवार( पत्नी और पुत्र) सहित जेल की सजाएं भोगी और नौजवान पुत्र का सही ढंग से इलाज न करवा पाने से बूढा़पे में जवाब बेटे की लाश को कंधा भी दिया है. लेकिन जनता की आवाज़ कभी दबने नहीं दिया.
अमिला(अब मऊ) में 29जनवरी-1900 में पैदा हुए.उनके पिता का नाम द्वारिका राय तथा माता का नाम कमल देवी था.अलगू राय की प्रारंभिक शिक्षा भी बनारस में हुई और बरस 1923 में उच्च शिक्षा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हुई. जहाँ से शास्त्री की उपाधि ग्रहण करते ही अलगू राय का एक नया परिचय ‘अलगू राय शास्त्री’ हो गया.
1920 में असहयोग आंदोलन में विद्यार्थी होते हुए भी जेल यात्रा किए। जेल से छूटने के बाद 1923 में विद्यापीठ से शास्त्री की डिग्री प्राप्त कर सक्रिय राजनीति में भागीदारी की.उन्होंने राजनीति के आलवा साहित्य के क्षेत्र में भी काम किया.वे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग को लेकर संविधान सभा में भी सवाल उठाए. वे उर्दू को दूसरी राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे. उन्होंने हैदराबाद जेल में रहने के दौरान ‘शहीदाने उर्दू’ नामक किताब लिख डाली.इसके अलावा उन्होंने लखनऊ जेल में बंदी जीवन बिताने के दौरान ‘ऋग्वेद रहस्य’ नामक पुस्तक भी लिखी.जिस पर आजादी के बाद उन्हें ‘मंगला प्रसाद पारितोषिक साहित्यिक पुरस्कार’ भी मिला. अंग्रेजी शासन काल में 1937 में संयुक्त प्रांत के सगड़ी-नत्थूपुर से मेंबर चुने गए. देश के आजाद होने के बाद 1952 में आजमगढ़ पूर्व सीट( घोसी) से सांसद चुने गए। प्रधानमंत्री नेहरू की नाराजगी की परवाह न कर इन्होंने 1955 में संसद में मोरार जी देसाई द्वारा संविधान संशोधन का समर्थन किया।
संविधान सभा में भूमिका :-
सदन में अलगू राय शास्त्री का उद्घाटन भाषण, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पेश किए गए एक प्रस्ताव के जोरदार समर्थन में से एक था-जिसका उद्देश्य एक स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य के रूप में भारत की स्थिति की पुष्टि करना और प्रमुख मौलिक सिद्धांतों के आधार पर सभी नागरिकों को अधिकार प्रदान करना था.
उनके भाषण ने उन क्षेत्रों को भी रेखांकित किया, जो देश का हिस्सा नहीं थे, उन्होंने कहा कि उन्हें भारत का हिस्सा होना चाहिए।
“वर्तमान में विदेशी प्रभुत्व के तहत पांडिचेरी, गोवा, दमन और दीव के क्षेत्र भी भारत के हिस्से हैं.मेरी इच्छा है कि नेपाल, भूटान और सिक्किम, जो हमारी सीमा का निर्माण करते हैं, के साथ इन सभी को भी इस मुक्त भूमि में शामिल किया जाना चाहिए”
खास बातें यह थी कि-इस भाषण के दौरान उन्होंने केवल हिंदी में सदन को संबोधित करने के अपने संकल्प पर जोर दिया.
इसी तरह धर्म परिवर्तन पर उनके विचार बहुत महत्वपूर्ण थे. शास्त्री ने ‘जबरन’ धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाने के लिए एक संशोधन का जोरदार समर्थन किया, विशेष रूप से यह तर्क देते हुए कि -बच्चों को किसी भी कीमत पर ऐसे धर्मांतरण के आगे झुकने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, भले ही कुछ अपरिहार्य कारणों से उनके माता-पिता को करना पड़े।
“आप उन मासूम बच्चों को, जिन्हें आप अपनी गोद में लेते हैं, कपड़े के एक सूट, रोटी के टुकड़े और एक छोटे से खिलौने से लुभाते हैं और इस तरह आप उनके जीवन को बर्बाद कर देते हैं. बाद में उन्हें इस बात का पछतावा हुआ कि उन्हें अपनी पसंद का धर्म रखने का मौका नहीं मिला”

हिंदी को लेकर वे कितने गंभीर थे. उसका उदाहरण इससे मिलता है कि- संविधान में संशोधनों को पटल पर हिंदी में रखने के लिए बार-बार अनुरोध करते रहे, शास्त्री जी ने विधानसभा के सत्रों के दौरान संविधान के प्रारूप संस्करणों पर चर्चा के लिए हिंदी को अपने पसंदीदा भाषा के रूप में मांग की।
यद्यपि संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने शास्त्री को याद दिलाया कि संविधान का अंतिम संस्करण हिंदी में तैयार किया जाएगा, शास्त्री न केवल यह तर्क देने में अडिग रहे कि संविधान का मूल मसौदा न केवल हिंदी में तैयार किया जाए बल्कि जो संशोधन पेश किए जा रहे थे विधानसभा में, उन्हें भी हिन्दी में होना चाहिए, अंग्रेजी में नहीं.
दिसंबर 1933 में एक भाषण में, अखिल भारतीय अछूतधार समिति के सचिव के रूप में (अछूतों के जीवन के उत्थान की दिशा में काम किया), उन्होंने ‘दलित वर्गों’ के सामाजिक कद को ऊंचा करने में समाजवाद की भूमिका को रेखांकित किया।
12 फरवरी 1967 को मां भारती के इस अमर सपूत और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का निधन हो गया।

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