मुद्दा: यूपी जैसा आबादी-रोक कानून क्यों न केंद्र भी बनाये.?

एन के सिंह
एडिट

—-
सबसे बड़ी आबादी वाले सूबे यूपी के सीएम आदतन मजबूर हैं अच्छे प्रयास में भी समुदाय का “छौंका” लगाने को. वह नयी आबादी नीति और कानून ला कर दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर राज्य-प्रदत्त कई सुविधाएँ और अधिकार रोकेगें और कम बच्चो पर अभिभावकों को पुरष्कृत करेंगें. आबादी नियंत्रण की नरम और “समझाने-बुझाने” वाली कोशिशें चार से ज्यादा दशकों से फेल रहीं. सरकारी सख्ती जब विरोधी स्वर के खिलाफ याने सोशल मीडिया या पत्रकारों को सरे आम अफसरों से पिटाई करवा कर दिखाई जाती है तो वह “प्रशासनिक गुंडई” होती है लेकिन जब आबादी रोक के नरम प्रयास लगातार फेल हो रहे हो और देश की खुशहाली को कुछ लोगों की अज्ञानता दीमक की तरह खोखली कर रही हो तो यह सख्ती सभी को अच्छी लगेगी. यह संविधान-सम्मत भी है क्योंकि अनुच्छेद १४ समानता के अधिकार के साथ राज्य को “बोधगम्य विभेद” (इंटेलिजिबल डिफरेंशिया) की इज़ाज़त देता है याने बच्चे कम पैदा करने वाले और ज्यादा पैदा करने वाले में विभेद. आज़ादी के बाद से राजनीतिक कीमत के मद्देनज़र सरकारों ने सख्ती नहीं की. लिहाज़ा जीडीपी में भारत पांचवें नंबर पर होते हुए भी प्रति-व्यक्ति आय (जो आबादी से भाग देने पर मिलता है) में १४४ वें स्थान पर फिसल जाता है और मानव-विकास सूचकांक में १२९ वें पर. लेकिन चूंकि आबादी नियंत्रण समवर्ती सूची की प्रविष्टि २०-अ है लिहाज़ा बेहतर होता कि केंद्र इस पर कानून बनाता क्योंकि यूपी (कुल प्रजनन दर २.७) के अलावा बिहार दूसरी सबसे बड़ी आबादी है जहां यह दर सबसे ज्यादा ३.१ आज भी है. बिहार आबादी नियंत्रण पर दशकों से असफल है. सरकारों के निकम्मेपन का खामियाजा राज्य को हीं नहीं देश को भोगना पड़ा है. यूपी सीएम ने समुदायों की आबादी में संतुलन के नाम पर अल्पसंख्यकों पर कटाक्ष तो किया लेकिन हकीकत यह है पिछले दो दशकों से इस समुदाय ने सबसे तेजी से अपनी आबादी-वृद्धि की दर घटाई है और इस पैमाने पर वह लगभग एससी वर्ग के बराबर है और इस रफ़्तार से वह दो दशकों में राष्ट्रीय औसत से भी नीचे आ जाएगा.
समाप्त

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी »