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एक तवायफ़ को आजमगढ़ ने जिला पंचायत का चैयरमेन बना संगीत और कला के सम्मान को आसमान की ऊंचाई दी

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Jul 24, 2021

माटी के लाल आजमगढ़ियों की तलाश में..

० गायिका और नृत्यांगना कामेश्वरी बाई ने 7-8 बरस की उम्र में पैरों में घुंघरू बांध लिया था..

० पहली शिक्षिका -मां ‘अच्छन बाई’ अपने समय की प्रख्यात लोक गायिका और नृत्यांगना थीं.

० सजनी गाँव में भातूओं का एक मोहल्ला कई पीढ़ी पहले आकर बसा था. जहाँ जन्मी थी ‘बला की खुबसूरत कामेश्वरी बाई’
० ग्रामोफोन रिकॉर्ड और कैसेट पर बजते थे कामेश्वरी बाई के लोकगीत

@ अरविंद सिंह #कामेश्वरीबाई
तवायफ़, वेश्या, नगरवधु, पतुरिया और गणिका जैसे शब्द हमारी सांस्कृतिक विकास यात्रा में हमसफ़र की तरह रहे हैं. भारतीय ही नहीं बल्कि दुनिया के साहित्य में भी ये शब्द और ‘उनके निहितार्थ’ से भरा पड़ा है. तभी तो बंगला साहित्य से लेकर पुराणों और वैदिक संस्कृतियों का हिस्सा भी रहे हैं ये शब्द.
आचार्य चाणक्य ने तो अपने ‘अर्थशास्त्र’ में इसके लिए एक शब्द ‘रूपजीवा’ का उल्लेख किया है. ‘रूपजीवा’ का मतलब ऐसी स्त्री जो अपने रूप से आजीविका चलाएं. शास्त्रों में ‘पतुरिया’ शब्द को संस्कृत के पात्र शब्द का स्त्रीवाची यानि ‘पात्रा’ का लोकरूप (पातर,पतुरिया)माना गया है. ‘गणिका’ का उल्लेख तो रामायण और महाभारत कालीन साहित्य में भी मिलता है. राजा की सेना का युद्ध के लिए प्रयाण करते समय या राज्याभिषेक के समय सुन्दर और मनमोहक गणिकाओं का दर्शन शुभ माना गया था. बंगाल में आज भी धार्मिक महत्व को देखते हुए वेश्यालयों( कोठों) की माटी( मिट्टी) का प्रयोग दुर्गापूजा में किया जाता है. गुप्त काल में वैशाली की नगरबधु के पास राजा बिम्बिसार का जाना उल्लेख में आता है.
सच कहें तो नगरवधुओं और गणिकाओं को तत्कालीन समाज में वह स्थान और सम्मान प्राप्त था, जो बहुतों को (कई अर्थों में विशिष्ट लोगों को भी) नहीं प्राप्त था. चंवर चलाने( एक प्रकार का पंखा, जिसे राजा के लिए कुछ लोग हाथों से डुलाते थें) और दंड देने का अधिकार राजा के अतिरिक्त राज्य में केवल ‘राजपुरोहित’ और ‘गणिकाओं’ को ही प्राप्त था. तवायफों की महफ़िलों में लोग केवल मुज़रों के लिए नहीं, तहज़ीब और रवायत सिखने भी जातें थें. उनके कोठों पर केवल मुजरें ही नहीं होते थे, बल्कि कला, संगीत और तहज़ीब की रवायतें भी चलती थीं. जो पीढ़ियों से चलकर पीढ़ियों तक पहुँचती थीं. जो सिर्फ कला,संगीत और संस्कृति को ही नहीं बल्कि कई मायनों में राजनीति को भी प्रभावित करती थीं.
अब इन भूमिकाओं का आजमगढ़ माटी के लाल से क्या संबंध है, इसकी स्थापनाओंं से पहले…चलते हैं आजमगढ़ के ‘सजनी’ गांव में.. और भातूओं के समुदाय से मिलतें हैं.
मुगलों के आगमन के समय और बाद में कंजर(संस्कृत में कानन-चर-वनचर) , नट. बेड़ियाँ, पत्थरकट, बहेलिया, भातू आदि एक समान तरह के कबिलाई और खानाबदोश जीवन बिताने वाली घुमंतू जनजातियों का उल्लेख मिलता है, जो प्रायः आबादी से दूर जंगलों में डेरा डालकर खानाबदोशी जीवन बिताते थें. अंग्रेजों के आगमन पर अंग्रेजों ने इन्हें ‘क्रिमिनल ट्राइब्स’ कह कर अपराधी घुमंतू जनजातियों की श्रेणी में रखा. और उन्हें एक स्थान पर बसाने का प्रयास किया. मशहूर ‘सुल्ताना डाकू’, जिस पर अनेक फिल्मों और नाटकों का निर्माण हुआ, किताबें लिखी गयीं. जो अपने समय में एक जीवंत मिथक भर ही नहीं था, बल्कि भारतीय राबिन हुड के नाम से भी जाना गया, उसके परिवार और अन्य घुमंतू जनजातियों को एक स्थान (मुरादाबाद के पास)बसाया गया था, जिससे वे सभ्य नागरिक बन सकें. ये सभी ‘भातू जनजाति’ से ही थे. जो अपने आप को मेवाड़ का मूल मानते हैं. उनका मानना था कि वे पन्द्रहवीं सदी में महाराणा प्रताप के साथ अकबर के खिलाफ लड़े थे और बाद में अकबर के विजय के बाद उत्तर भारत और पहाड़ी-तराई क्षेत्रों में फैल गयें और अपने लिए अनेक प्रकार के व्यवसाय का चयन किये. कुछ मुगलों के हरम में पहुंच गए थे जो नृत्य तथा गायन से उनका मन बहलाने लगें थे. तवायफ़ों और वेश्याओं का इतिहास कुछ इसी तरह से मिलता है. जो आने वाले कालखंडों में मुगल राजनीति में भी हस्तक्षेप करने लगीं थीं.
आजमगढ़ में अहरौला विकास खंड का एक गाँव है ‘सजनी’. यूं तो यह जमीदारों का गांव था, जहाँ मुस्लिम सहित अन्य जातियों की मिश्रित आबादी थी. इसी गाँव में नाच-गाना करके ज़मीदार और उनके कारिंदों का मन बहलाने वाला एक टोला ‘भातूओं’ का भी था. ये कब और कहाँ से आए और आबाद हुआ, इसकी ठीक-ठीक जानकारी तो नहीं है लेकिन एक बाद तो तय है कि जब मुगलों का पराभव और ब्रिटिश साम्राज्य की जड़े जमनी शुरू हुई थीं, तो संभवतः ये कबिला आकर बसा होगा, हांलाकि आजमगढ़ में यह केवल सजनी गाँव तक ही सीमित थे, यह जरूरी नहीं है. देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार और पूर्वांचल के विशेषज्ञ तथा इस कलमकार के संरक्षक आदरणीय ‘गुंजेश्वरी प्रसाद’ अपने शुरूआती जीवन में आजमगढ़ को पग-पग से मापा था और उन्होंने एक मुलाकात में बताया था कि- ”आजमगढ़ में कुल 18 गांव वेश्याओं का था, जहाँ, उनके बसने और अपने रूपजीवा तथा कला-संगीत से आजीविका चलाने का संकेत मिलता है. इससे साबित होता है कि आजमगढ़ में सामंतों और जमीदारों की एक अच्छी संख्या थीं.”
अगर स्वर्गीय गुंजेश्वरी प्रसाद की बातें सच हैं तो इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि यहाँ के लोग कला और संगीत प्रेमी के साथ-साथ उसके पारखी और हिमायती भी थे. यही कारण है कि- ‘संत गोविन्द साहब के समकालीन संगीत प्रेमियों ( जिसमें हरिहरपुर गाँव के दो सगे भाईयों हरनामदास और सरनामदास ) ने आजमगढ़ नगर के हरिहरपुर में इस कला को प्रथम बार लाने और उसको संरक्षित कर, उसे संगीत के क्षेत्र का ‘हरिहरपुर घराना’ बना देने का उल्लेखनीय कार्य करने वाले प्रारंभिक शिल्पी के रूप में मिलता है.
इसी सजनी गाँव के बाईयों और तवायफों के टोले में एक खुबसूरत गायिका और नृत्यांगना थी-अच्छनबाई, जो इस गाँव के जमीदार गिरधर दास और उनके पूर्वजों के शौक़ और मन बहलाने के लिए नाच-गाना और मुजरा करती थी.
बदले में उनके आश्रय-दाता के रूप में ज़मीदार साहब इस टोले का संरक्षण और उदरपूर्ती करते थे. और यहीं से गीत स़गीत की महफ़िलें जवां होकर सामंतों के आमोद-प्रमोद और ऐश्वर्य भोग का साधन बन गयी थी. अच्छन बाई की माँ और बहन भी अच्छी तवायफ़ थीं. इसी अच्छन बाई की कोख से बरस 1947 में एक लड़की पैदा हुईं, जो बला की खुबसूरत थी. इस मासूम को अच्छन बाई मशहूर नृत्यांगना और गायिका बनाना चाहती थीं. इस लिए बचपन में ही इसके पैरों में घुंघरू पहना दिया. 7-8 बरस की उम्र में उसे नृत्य और गायन का रियाज कराने लगीं. परिणाम स्वरूप 14-15 बरस की होते-होते यह लड़की बला की खुबसूरत नृत्यांगना और गायिका बन चुकी थी.. नाम था.’कामेश्वरी बाई’. किशोरवय तक पहुँचते-पहुँचते कामेश्वरी बाई तवायफो़ं की महफ़िलों की रौनक और मुजरों की रानी बन चुकी थीं. देश की आजादी के समय जन्म लेने वाली कामेश्वरी बाई, जमीदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद सजनी से आजाद हो गयीं. न तो जमीदारों की जमीदारी बची और नहीं, उनके तवायफों की शान- शौक़त
पूरा कर पाने की हैसियत, लिहाजा, पानी का दरिया और हुनर की रवानी भला कौन रोक सका है. यूँ ही नहीं एक बात तवायफों को लेकर कही जाती है कि- ‘तवायफ़ मोहब्बत नहीं करती, क्योंकि मोहब्बत, उसके पेशे के खिलाफ है’.
और फिर एक दिन सजनी से लगभग पैतीस-चालीस किमी दूर जनपद मुख्यालय पर नगर के ‘कालीनगंज’ मुहल्ले में आकर बस गयीं. इसी बदनाम मोहल्ले के एक कोठे पर इस खुबसूरत नृत्यांगना का मुजरा होता था. और सुनने वाले नगर के सेठ-साहूकार तथा बाबू साहब( ठाकुरों को पूर्वांचल में बोले जाने वाला- उपनाम)तथा दूर दरार के कद्रदान होतें थें.
कभी आजमगढ़ में यह किंवदंती थी कि-‘कामेश्वरी बाई, एक साथ दो-दो भगवती… ( नगर सेठ और सिंह..) को एक साथ महफ़िल में मुजरा सुना सकती हैं और दोनों उनके मधुर और कर्णप्रिय गायन के साथ सूर और सुरा में ऐसे डूब जातें कि एक दूसरे को देख ही नहीं पातें थें. जबकि दोनों की एक दूसरे से अदावत थी. कामेश्वरी केवल तन की खुबसूरत ही नहीं थी बल्कि मन की सुंदर थी. कजरी, होरी, चैता, गीत- गजल, मुजरा, जैसी लोक-विधाओं में जबरदस्त पकड़ थी. आवाज की इस जादूगरनी में तहज़ीब और तमीज की तासीर थी. उनके साजिंदे और संगत करने वाले ढोलकिये प्रशिक्षित और सिद्धहस्त थे. जिसमें ज्यादा तर नगर के ही निवासी थे.
एक साक्षात्कार में कामेश्वरी बाई ने कहा था कि-” मैं तो गंवई कलाकारों में विकसित हुईं हूँ. प्रारंभ में काफी उपेक्षित रहीं, कालांतर में शास्त्रीय संगीत में प्रविष्ट होने के लिए गुलाम अली, पंडित भीमसेन जोशी, तथा गिरिजा देवी के पदचिह्नों का अनुसरण किया. पंडित अंबिका प्रसाद मिश्र, पंडित अमरनाथ मिश्र, लतीफ खां, गुदई महराज और जाकिर हुसैन से बहुत कुछ सीखा. कत्थक नृत्य में पंडित विरजू महराज मेरे आदर्श थे, लोकगीतों में पंडित छन्नु महाराज ने अप्रतिम प्रेरणा प्रदान की”( आजमगढ़ स्मारिका, 2002, पेज-38).
तत्कालीन आजमगढ़ के स्त्री चरित्र की बातें जब भी होगी कामेश्वरी बाई की संगीत और गज़लों की महफ़िलों के साथ अदब की भी बात जरूर होगी. लोगो के घरों पर शादी औलादी और मांगलिक कार्यक्रमों में मनोरंजन के लिए आवाज की इस मल्लिका को बड़े शान से बुलाया जाता था. और लोग उन्हें सुनने के लिए गांव के गांव मीलों पैदल चलकर नाच देखने के लिए टूट पड़ते थे. उनका एक कजरी बहुत हिट हुआ था-
‘पिछवां पड़ल अहिर बेईमनवां.. हम गवनां कैइसे जाब.. ‘
उनके तीन संतानें थी दो बेटा और एक बेटी. बड़ा बेटा अजय शहर के प्रतिष्ठित वेस्ली कालेज में पढ़ता था. और छोटा विजय सिंह बीएचयू तक पढ़ाई करने के बाद दिल्ली चला गया.
जब बदलती दुनिया में गजल और महफ़िलों की रौनक फीकी पड़ने लगीं. आवाज की कशिश कमजोर और साज़ का दखल ज्यादा बढ़ने लगा तो कामेश्वरी जैसी लोक गायिका और लोक नर्तकी और उसके कला के कद्रदान भी कम होने लगें. तकनीक ने सबकुछ सिमट कर रख दिया.
ऐसे परिवेश में सामाजिक कामेश्वरी बाई राजनीति में दखल देना शुरू किया. कांग्रेस का दामन थामा लेकिन विधान सभा का टिकट नहीं मिल सका. एक बार नगर पालिका परिषद के चेयरमैन का चुनाव भी निर्दल प्रत्याशी के रूप में लड़ी. बात बरस 2000 तक आयी और पन्द्रह बरस तक कामेश्वरी बाई का राजनीतिक संघर्ष बीते. बकौल आजमगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार दुर्गा प्रसाद यादव-
” जब आजमगढ़ की जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट अनुसूचित जाति जन जाति की हो गयी थी. बलराम यादव सपा के सबसे बड़े नेता थे. सपा सरकार में थी. उन्होंने सोचा कामेश्वरी बाई को ही क्यों बना दिया जाए. रणनीति बनी. बलराम यादव का पैगा़म लेकर दुर्गा प्रसाद राय और पत्रकार रमाकांत यादव कामेश्वरी बाई के घर (कोठे) पर गयें और सपा का फैसला सुनाया. कामेश्वरी बाई बाहर से जलपान मंगाकर उन दोनों पत्रकारों को करातीं और बोली बाबू! भाजपा के जिलाध्यक्ष श्याम बहादुर सिंह हैं. उनसे पूछें कि-क्या वे लोग भी हमारा समर्थन करेगें. फिर क्या..राय साब ने तुरंत कामेश्वरी बाई के लैंडलाइन टेलीफोन ( उस समय मोबाइल कम थे) श्याम बहादुर सिंह को फोन मिलाया.. श्याम बहादुर सिंह ने कहा- राय साहब! हमारा समर्थन भाभी को ही होगा.. ( भगवती..सि… से कामेश्वरी बाई के विशेष संबंधों के कारण..लोग उन्हें प्रायः भाभी ही कहते थें). इस तरह उन्हें हाफिजपुर जिला पंचायत सीट से महाप्रधान(सदस्य जिला पंचायत) का चुनाव में उतारा गया और आजमगढ़ के ठाकुरों, ब्राह्मण तथा यादवों की प्रिय यह प्रत्याशी कामेश्वरी बाई सन 2000 में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत का प्रथम महिला नागरिक बन गयीं. अब तवायफ़ कामेश्वरी बाई.. को आजमगढ़ की जनता ने ‘कामेश्वरी देवी चैयरमेन’-जिला पंचायत बनाकर, उन्हें अपने सिर माथे पर बैठा दिया.
यह कला और संगीत का सम्मान और समर्थन था, जिसे आजमगढ़ ने न केवल सिद्धांत में बल्कि व्यवहार में भी जीया. चैयरमेन बनने के डेढ़ बरस बाद ही घर पर बिजली के कारण रहस्य ढंग से मौत हो गयी.
गीतों का रिकार्ड्स :-
कामेश्वरी बाई की आवाज़ को बनारस के कोहिनूर कंपनी ने लोक गीतों के ग्रामोफोन रिकॉर्ड किए. बाद में मधुर कंपनी ने भी रिकॉर्ड कराएं. बाद में जब कैसेट का समय आया तो उनकी लोक गीतों की खूब धुम मची. आकाशवाणी गोरखपुर ने उनके गीतों के प्रसारण के लिए 8 बरस का करार किया था.

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