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1942 में तरवां थाना फूंकने वाले कामरेड तेजबहादुर सिंह को ब्रितानी हुकूमत ने तीन बरस तक जंजीरों में जकड़े रखा..

Byadmin

Jul 24, 2021

माटी के लाल आजमगढ़ियों की तलाश में..

० आजाद भारत में 1952 में मेंहनगर से पहले विधायक बने

० विधायक और एमएलसी ही नहीं,एक बड़े जननेता और बहुतों के पोलिटिकल गाड-फादर भी थे कामरेड तेजबहादुर सिंह

@ अरविंद सिंह #तेजबहादुरसिंह

आजादी की लड़ाई में जिन महान और क्रांतिकारी नायकों और जन नायकों की देशभक्ति और बलिदान की दास्ताँ सुनाई और बतायी जाती है. सच कहें तो उनमें से अनेक लोग अपने जीवन काल में ही किंवदंती बन गयें थे, जिनकी सिंह गर्जना से कभी बरतानिया हुकूमत अंदर तक हिल गयी थी. आजमगढ़ उन विरले सपूतों के संघर्ष की सरजमीं का नाम है, जो एक बार नहीं अनेक बार आजादी से पहले ही अपने आप को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त होने की घोषणा कर दिया था. यहाँ के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बहादुर रणबांकुरों और उनकी अदम्य साहस की कहानियों से भरा पड़ा है. आजमगढ़ को आजादी के समय और उसके बाद के समय को सर्वाधिक प्रभावित करने वालों में एक नाम आता है कामरेड तेजबहादुर सिंह. जो एक अपराजेय योद्धा और कुशल रणनीतिकार थे. जिसने आजादी की लड़ाई में अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नेतृत्व किया तो आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी अनेक जनप्रतिनिधियों को पैदा किया. स्वयं अनेक बार विधायक और विधान परिषद के सदस्य रहें. ऐरा कला में क्षत्रिय कुल में पैदा हुए इस आजादी के नायक की
देश की आज़ादी के समय संघर्ष की एक दास्ताँ: –
सन् 1942 में 17 अगस्त को नागपंचमी के दिन तहसील क्षेत्र के डुभांव ग्राम स्थित बाराहजी के मंदिर पर मेला लगा था.कहीं दंगल हो रहा था तो कहीं लोग झूले का आनंद ले रहे थे. वहीं बगल के घर में उत्साही नौजवानों की तेजबहादुर सिंह के नेतृत्व में बैठक चल रही थी. देर रात तक चली बैठक में निर्णय लिया गया कि कल ही तरवां थाना फूंक दिया जाए. मीटिंग में तेजबहादुर के अलावा रामहर्ष सिंह (ओहनी) , गजराज सिंह (अवनी) , चंद्रदीप सिंहह (तरवां) आदि मौजूद थे. फिर सवाल पैदा हुआ की कूबा के जागरूक लोगों को कल के निर्णय की सूचना कैसे दी जाए.उदंती नदी तो तेज बढ़ाव पर है. जिसके दोनों तरफ मीलों पानी ही पानी दिखाई पड़ रहा था. बैठक में उपस्थित कई लोगों ने कहा कि हमें तैरना नहीं आता. इस पर तेजबहादुर सिंह की गर्विली और जोशिली आवाज निकली कि-‘जब तुम लोग नदी नहीं तैर सकते हो तो थाने पर कैसे कब्जा करोगे?’. फिर क्या सेनापति की ललकार से बहादुर सेनानियों की भुजाएं फड़क उठीं और उन्होंने हनुमान, नल व नील की तरह काम करना शुरू कर दिया. तेजबहादुर सिंह, गजराज सिंह और कैलाश सिंह तो रात 10 बजे ही भरी और तेज बवाह वाली इस बरसाती नदी के विशाल पाट को तैरकर रसूलपुर के जगदीश यादव के यहां पहुंच गए. वहां से उन्हें साथ लेकर लगभग एक बजे रात में रामनगर के रामानंद सिंह एवं हिटलर सिंह को जगाया. साथ ही आगे सिधौना संदेश देने के बाद रोआंपार होते हुए मेहनाजपुर क्षेत्र के अनेक लोगों को, जिनमें ओमदत्त मिश्र, बच्चा बाबू, संकठा सिंह, रमाकांत तिवारी, नंदकिशोर सिंह आदि को सूचित कर रात में ही तरवां निकल गए. तरवां गांव में पुन: एक स्थान पर लोग एकत्र हुए. गांव के रामअधार सिंह के साथ कुछ नौजवानों का दल बावर्दी तेजबहादुर सिंह के साथ हो लिये. यह दल दिन में 10 बजे तरवां स्कूल पहुंचा गया. उससे पहले ही बद्री सिंह अपने स्कूल के लड़कों और चंद्रजीत सिंह एवं सत्यदेव सिंह आदि लोगों के साथ लगभग एक घंटे पूर्व ही तरवां थाने पहुंच चुके थे. तेजबहादुर सिंह ने रास्ते में ही अपने साथियों को थाने की सरकारी वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य कोई छोटी चीज भी नष्ट होने से बचाने की ताकीद कर दी थी.रामानंद सिंह और गजराज सिंह आदि प्रमुख कार्यकर्ताओं की प्रमुख टोली कुछ ही देर में घंट-घड़ियाल बजाते हुए कूबा और चौरी तालुकों का जनसमूह एकत्र करने के लिए विभिन्न गांवों की ओर अलग-अलग रवाना हो गई थी. निर्णय के आधार पर योजनाबद्ध ढंग से चारों ओर से हजारों की संख्या में लोगों ने थाना घेर लिया. लोगों के हाथों में मिट्टी के तेल थे.दारोगा संतबख्श सिंह अपने हमराहियों के साथ राइफलों को तान कर खड़ा हो गया लेकिन हजारों की भीड़ के आगे उसकी हिम्मत नहीं पड़ी. सरेंडर होने के बाद दारोगा ने कहा कि आप लोग चाहते क्या हैं. तेजबहादुर ने कहा पहले सभी असलहे हमें दे दो, हम लोग थाना में आग लगाएंगे.थानेदार ने कहा कि-‘हमारे परिवार का क्या होगा’.नेता तेजबहादुर ने मानवीय संवेदना दिखाते हुए दारोगा के परिवार को एक तांगा बुलवाकर खरिहानी उसके किसी रिश्तेदार के यहां भेजवाया. इसके बाद थानेदार सहित सभी आरक्षी पुलिसजनों को एक अलग कमरे में बंद कर पूरे थाना को आग के हवाले कर दिया. थानेदार का घोड़ा लेकर तेजबहादुर क्षेत्र में चले गए. उसके बाद डाकखाना भी फूंक दिया गया. यही नहीं पूरा क्षेत्र 15 दिन तक अंग्रेजी शासन से मुक्त रहा.
तेजबहादुर सिंह की विशिष्ट पहचान :-
स्वतंत्रता सेनानी तेज बहादुर सिंह को व्यक्तिगत सत्याग्रह में नौ माह की जेल व यातनाएं मिलीं. वे 1942 में तरवां थाना और खुरासों रोड स्टेशन के प्रमुख नेता रहे.फरार होने के बाद 13 दिन तक अंग्रेज फौज उनके गांव में डटी रही. उनके पूरे घर को अंग्रेजों ने जला दिया. फरारी जीवन में कई वर्षो बाद कोलकाता में उनकी गिरफ्तारी हुई. उन्हें कोलकाता से जिला मुख्यालय आजमगढ़ की जेल में लाया गया. जेल में उन्हें 40 दिन तक में रखा गया और तीन वर्षो तक उनके पैरों में बेड़ियां डाल कर खूंखार अपराधी की तरह रखा गया. आजादी के बाद उन्हें रिहा किया गया.
कामरेड तेजबहादुर स्वयं में पार्टी थे :-
व्यक्ति कैसे विचारधारा से बड़ा हो जाता है और स्वयं में एक संस्था, इसका उदाहरण कामरेड तेजबहादुर सिंह थे. आजाद भारत में सत्ता और किसी दल से टिकट के लिए जब मारामारी चल रही हो तो तेजबहादुर सिंह याद आने लगते हैं, जो खुद में एक पार्टी और संगठन थे.जिन्हें मेंहनगर क्षेत्र का पहला विधायक होने का गौरव प्राप्त हुआ है.कम्युनिस्ट विचारधारा के तेजबहादुर सिंह कभी किसी पार्टी के टिकट के मोहताज नहीं रहे. वर्ष 1952 में हुए चुनाव में मेंहनगर विधानसभा सीट को ‘लालगंज-नार्थ’ के नाम से जाना जाता था. तब यह सीट सामान्य हुआ करती थी. तेजबहादुर सिंह इस चुनाव में निर्दल प्रत्याशी के रूप में मैदान में थे और मतदाताओं ने उन्हें भारी समर्थन दिया. कारण स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तरवां थाना फूंकने में आगे रहे तेजबहादुर सिंह का नाम बच्चे-बच्चे की जुबान पर हुआ करता था. जब विपक्षी मेहनगर से कामरेड तेजबहादुर सिंह को हराने में असफल होने लगें तो, मेंहनगर सीट को ही सुरक्षित करा दिया गया. बावजूद इस सीट से उनके चेले जीतते रहें.
उसके बाद भी तेजबहादुर सिंह का तेज कम नहीं हुआ और वे लालगंज साउथ (वर्तमान में सुरक्षित व इससे पहले सामान्य लालगंज) क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरे। वहां से भी उन्होंने सफलता प्राप्त की.उस समय लालगंज नार्थ से कांग्रेस के धनीराम विधायक बने थे.वर्ष 1962 में हुए तीसरे विधानसभा चुनाव में क्षेत्र का नाम बदलकर बेला दौलताबाद कर दिया गया और उस समय छांगुर राम भाकपा के टिकट पर विधायक बने.
वर्ष 1967 में हुए चौथे विधानसभा चुनाव में मेंहनगर सुरक्षित सीट अस्तित्व में आया और आज तक आरक्षित ही है. कभी कम्युनिस्ट का गढ़ रहे इस क्षेत्र में हुए चौथे चुनाव में जनसंघ के टिकट पर जैनू राम को विधानसभा में पहुंचने का मौका मिला.
आजादी के बाद वे विधायक और एम एल सी के साथ-साथ वरिष्ठ अधिवक्ता भी बनें. 31 जुलाई 1988 को लालगंज मिट्टी का यह अमर सपूत, महान क्रांतिकारी कामरेड तेजबहादुर हमेशा हमेशा के लिए माँ भारती की गोद में चिरनिद्रा में सो गया.
(संदर्भ स्रोत- जागरण, अध्ययन और बातचीत पर आधारित)

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