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ब्रिगेड़ियर उस्मान : बंटवारे के समय पाकिस्तानी ‘आर्मी चीफ’ का पद तक ठुकरा दिया था ‘नौशेरा का यह शेर’..

Byadmin

Jul 24, 2021

माटी के लाल आज़मियों की तलाश में…
० पाकिस्तान ने उसके सिर पर 50 हजार का ईनाम रखा था.
०36 वर्ष में शहीद हो गये थे ब्रिगेड़ियर उस्मान.
० मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.

@ अरविंद सिंह #ब्रिगेड़ियर_उस्मान

दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया स्थित उनके क़ब्र पर जो लिखा है उसके अनुसार .:-
“उनकी नियुक्ति 5/10 बलूच रेजिमेंट में थी. जहां उन्होंने देश की आजादी तक सेवाएं दीं. बंटवारे के दौरान उन्हें पाकिस्तानी आर्मी के चीफ के रूप में जॉइन करने का ऑफर दिया गया. लेकिन एक सच्चे देशभक्त की तरह उन्होंने ये ऑफर ठुकरा दिया, और उसी मिट्टी की सेवा में रहने का फैसला लिया जहां उन्होंने जन्म लिया था. ब्रिगेडियर उस्मान ने दिसंबर 1947 में नौशेरा, जम्मू-कश्मीर में 50 (I) पैरा ब्रिगेड की कमान संभाली. ब्रिगेड ने कई बाधाओं के बावजूद नौशेरा में आगे बढ़ते पाकिस्तानी कबायलियों को रोक दिया. इसके बाद उन्होंने झांगर पर दोबारा कब्जा करने के लिए ब्रिगेड का नेतृत्व किया, जिससे हमलावरों पर शिकंजा कस गया”

‘नौशेरा का शेर’ कहे जाने वाले ब्रिगेडियर उस्मान की क़ब्र
पर इन पंक्तियों में आधुनिक भारतीय इतिहास की जो सच्चाई लिखी है. उसे हर भारतीय को पढ़नी चाहिए. इसी कब्र पर एक समय में भारतीय सेना के इस ब्रिगेडियर को अंतिम विदाई देने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू खुद आए थे. ब्रिगेडियर उस्मान 1948 की लड़ाई में शहीद होने वाले सेना के सर्वोच्च अधिकारी थे. मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.

ब्रिगेडियर उस्मान: ‘नौशेरा का शेर’ जिस पर पाकिस्तान ने रखा था 50,000 का इनाम :-

भारत के कई सैन्य इतिहासकारों की राय है कि अगर ब्रिगेडियर उस्मान की समय से पहले मौत न हो गई होती तो वो शायद भारत के पहले मुस्लिम थल सेनाध्यक्ष होते.एक कहावत है कि ईश्वर जिसे चाहता है उसे जल्दी अपने पास बुला लेता है. बहादुरों की बहुत कम लंबी आयु होती है. ब्रिगेडियर उस्मान के साथ भी ऐसा ही था.
जब उन्होंने अपने देश के लिए अपनी जान दी तो उनके 36वें जन्मदिन में 12 दिन बाकी थे. लेकिन अपने छोटे से जीवनकाल में उन्होंने वो सब हासिल कर लिया जिसको बहुत से लोग उनसे दोहरा जी कर भी नहीं पा पाते हैं.
वो शायद अकेले भारतीय सैनिक थे जिनके सिर पर पाकिस्तान ने 50,000 रुपए का ईनाम रखा था जो उस ज़माने में बहुत बड़ी रक़म हुआ करती थी. 1948 में नौशेरा का लड़ाई के बाद उन्हें ‘नौशेरा का शेर’ कहा जाने लगा था.

कौन थे ब्रिगेडियर उस्मान?
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मोहम्मद उस्मान अविभाजित भारत में अविभाजित आजमगढ़ (अब मऊ) जिले के बीबीपुर गांव में 15 जुलाई 1912 को पैदा हुए थे. पिता मोहम्मद फारूक पुलिस अफसर थे. पिता चाहते थे कि उनका बेटा सिविल सर्विस में जाए, लेकिन उस्मान ने सेना को तरजीह दी. उस्मान ने रॉयल मिलिट्री अकादमी सैंडहर्स्ट के लिए अप्लाई किया, और 1932 में इंग्लैड गए. 1 फरवरी 1934 को उस्मान सैंडहर्स्ट से पास हुए. वे इस कोर्स के लिए चुने गए 10 भारतीयों में से एक थे. मोहम्मद मूसा और सैम मानेकशॉ उनके बैचमैट थे, जो आगे चलकर भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के चीफ बने.

1935 में मोहम्मद उस्मान भारत वापस आए तो उनकी नियुक्ति बलूच रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में हुई. 30 अप्रैल 1936 को उन्हें लेफ्टिनेंट की रैंक पर प्रमोशन मिला. 1941 में कैप्टन बने. 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश फौज की ओर से बर्मा में सेवाएं दीं.

बंटवारा तय हो जाने के बाद ब्रिटिश इंडिया की सैन्य टुकड़ियों को भी भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा जा रहा था. इसी सिलसिले में नंबर आया बलूच रेजिमेंट का. बलूच रेजिमेंट के ज्यादातर अफसर मुस्लिम थे, और वे पाकिस्तान में शामिल हो रहे थे. चूंकि देश का बंटवारा ही धर्म के आधार पर हुआ था इसलिए ये स्वभाविक भी था. लेकिन ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान तो किसी और ही मिट्टी के बने थे. ब्रिगेडियर उस्मान ने अपनी मातृभूमि भारत में ही रहने का फैसला किया.

ब्रिगेडियर उस्मान की जीवनी लिखने वाले मेजर जनरल वीके सिंह बताते हैं, “मोहम्मद अली जिन्ना और लियाक़त अली दोनों ने कोशिश की कि उस्मान भारत में रहने का अपना फ़ैसला बदल दें. उन्होंने उनको तुरंत पदोन्नति देने का लालच भी दिया लेकिन अपने फ़ैसले पर क़ायम रहे. अपनी निष्पक्षता, ईमानदारी और न्यायप्रियता से उन्होंने अपने मातहत सिपाहियों का दिल जीत लिया.”

12 साल की उम्र में कुएं में डूबते बच्चे को बचाया :-

उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1912 को मऊ ज़िले के बीबीपुर गाँव में हुआ था. उनके पिता काज़ी मोहम्मद फ़ारूक़ बनारस शहर के कोतवाल थे और उन्हें अंग्रेज़ सरकार ने ख़ान बहादुर का ख़िताब दिया था.
एक बार जब वो 12 साल के थे तो वो एक कुएं के पास से गुज़र रहे थे. उसके चारों तरफ़ भीड़ जमा देखकर वो वहाँ रुक गए. पता चला कि एक बच्चा कुएं में गिर पड़ा है.12 साल के उस्मान ने आव देखा न ताव, वो उस बच्चे को बचाने के लिए कुएं में कूद पड़े.
उस्मान के पिता मु० फ़ारूक़ भी बड़े ज़मींदार होने के बावजूद समाजसेवा में रुचि के कारण पुलिस में शामिल हुए ,वो बड़े जाँबाज़ जवान थे. कोतवाल मु .फ़ारूक़ के तीन बेटों में से दूसरे नम्बर के बेटे थे मु.उस्मान साहब .उस्मान ने बनारस के हरीशचंद्र कॉलेज से स्नातक पूरा किया था .इनके दो भाइयों में से एक बड़े भाई मु.सुभान टाइम्स आफ इंडिया में उपसंपादक रहे तथा छोटे भाई मु.गुफ़रान भी भारतीय फ़ौज में सेवारत रहे .

नौशेरा का शेर :-
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ब्रिगेडियर उस्मान ने 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं बटालियन की कमान अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक संभाली. बंटवारे के बाद जब बलूच रेजिमेंट पाकिस्तान में चली गई तो मोहम्मद उस्मान का ट्रांसफर डोगरा रेजिमेंट में कर दिया गया. बंटवारे के ठीक बाद पाकिस्तानी कबायली घुसपैठियों ने कश्मीर रियासत पर हमला कर दिया. पाकिस्तान चाहता था जम्मू-कश्मीर पर कब्जा किया जाए, और पाकिस्तान में उसका विलय किया जाए. मोहम्मद उस्मान उस वक्त 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर थे. जनवरी-फरवरी 1948 में ब्रिगेडियर उस्मान की तैनाती नौशेरा में थी. पाकिस्तान लगातार कबायली घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर भेज रहा था. देश को आजाद हुए अभी 5 महीने ही हुए थे. युद्ध की तैयारी नहीं थी, सैन्य-साजो सामान बिखरे हुए थे. संसाधनों की कमी थी. लेकिन ब्रिगेडियर उस्मान और उनके सैनिकों के हौसले बुलंद थे.

24 दिसंबर 1947 को कबायलियों ने अचानक हमला कर झांगर पर कब्जा कर लिया. उनका अगला लक्ष्य नौशेरा था. जनवरी के पहले हफ्ते में नौशेरा पर कबायलियों ने तीन बार हमला किया, जिसे ब्रिगेडियर उस्मान के सैनिकों ने नाकाम कर दिया. 6 फरवरी 1948 को कबायलियों ने नौशेरा पर फिर से हमला किया. इस लड़ाई में दुश्मन बड़ी तादाद में थे जबकि भारतीय सैनिक उनके मुकाबले कम थे. बावजूद इसके दुश्मन को काफी नुकसान हुआ. नौशेरा पर हमला एक बार फिर नाकाम हो गया था. इस दिलेरी भरे नेतृत्व की वजह से ब्रिगेडियर उस्मान को नौशेरा का शेर कहा जाने लगा.

झांगर की लड़ाई :-
अगला लक्ष्य झांगर था. भारतीय सेना सैलाब बनकर टूट पड़ी. भयंकर लड़ाई हुई. ये आखिरी लड़ाई थी. ब्रिगेडियर उस्मान खुद जंग का नेतृत्व कर रहे थे. 3 जुलाई 1948 को तोप का एक गोला ब्रिगेडियर उस्मान के पास आकर गिरा और वे इसकी चपेट में आ गए. अपने 36वें जन्मदिन से 12 दिन पहले ब्रिगेडियर उस्मान युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन तब तक भारत झांगर पर कब्जा कर चुका था. ब्रिगेडियर उस्मान को उनके जोशीले नेतृत्व और साहस के लिए मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया.
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की शवयात्रा में खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शामिल हुए. उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के जामिया मिल्लिया में किया गया. जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पास ही वो कब्र है.
अविभाजित आज़मगढ़ के ‘नौशेरा के शेर’ के बारे में कहा गया:-
“यहाँ का हर खित्ता मुल्क पर क़ुर्बान होता है
यहाँ का हर जवान ब्रिगेड़ियर उस्मान होता है”
(संदर्भ- बीबीसी हिंदी, लल्लनटॉप, विकिपीडिया, अध्ययन)

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