महंत की रहस्यमय ‌मौत : हत्या या आत्महत्या?

राजीव कुमार ओझा 

अखाड़ा परिषद के महंत नरेंद्र गिरी की ताजपोशी से शुरू विवादों का सिलसिला उनकी मौत के बाद भी थमता नजर नहीं आता। दिवंगत महंत नरेंद्र गिरी का अंतिम दर्शन करने पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि हर पहलू की जांच की जाएगी और दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या ने भी कहा है की यदि संत समाज मांग करेगा तब महंत नरेंद्र गिरी की रहस्यमयी मौत की सीबीआई जांच कराई जाएगी। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने महंत नरेंद्र गिरी की मौत की जांच हाईकोर्ट के किसी मौजूदा जज से कराने की मांग की है।
महंत नरेंद्र गिरी की मौत हत्या है या आत्महत्या यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन परिस्थिति जन्य साक्ष्य आत्महत्या की पुलिसिया थ्योरी को झुठलाते हैं।महंत की जिस सात आठ पन्ने की चिठ्ठी को पुलिस सुसाइड नोट बता रही है उसकी प्रामाणिकता पर संत समाज ही सबाल खड़ा कर रहा है। महंत के परिवार के लोगों,अधिकांश‌ संत और महंत के समर्थक यह मानने को तैयार नहीं हैं कि नरेंद्र गिरी आत्म हत्या कर सकते हैैं।
जिस तरह आनन फानन पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी प्रशांत कुमार ने महंत की संदिग्ध मौत को आत्महत्या बताया,जिस तरह यह तथाकथित सुसाइड नोट (जो पुलिस जांच की प्रापर्टी है) टीवी चैनलों को मुहैय्या करा कर महंत के शिष्य रहे आनंद गिरी को अपराधी सिद्ध करने का खेल खेला जा रहा है उससे यह प्रतीत होता है कि किसी बड़े सच की पर्दापोशी करने का होम वर्क टीवी चैनलों को दे दिया गया है।
तार्किक दृष्टि से महंत नरेन्द्र गिरी का तथाकथित सुसाइड नोट सबालों के घेरे मे है।इसमें तारीख सहित तमाम स्थानों पर जो कटिंग की गई है उसमें किसी अन्य कलम का उपयोग किया गया है ,उसमें नीले रंग की स्याही का उपयोग किया गया है।महंत को जानने वाले बताते हैं कि वह अमूमन हस्ताक्षर किया करते थे ,कभी इतना लंबा लिखते उनको नहीं देखा गया। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जिंदगी से निराश कोई व्यक्ति यदि आत्महत्या का फैसला करता है तब फैसले पर अमल के बीच उसे छींक भी आ जाए तब वह आत्मघाती मानसिकता से मुक्त हो जाता है।सबाल उठता है कि इतना लंबा सुसाइड नोट लिखने मे उस महंत को कई घंटे लगे होंगे फिर उस पर बाघंबरी मठ के किसी सेवादार की नजर क्यों‌ नहीं पड़ी? महंत को मिला सरकारी गनर इस अवधि मे कहां था?
नरेंद्र गिरी जैसा रसूखदार महंत जिसकी हर सत्ता के शीर्ष नेतृत्व तक सीधी पहुंच थी उसे यदि ब्लैकमेल किया जा रहा था या मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जा रहा था तब उसने मुख्यमंत्री से या हादसे के एक दिन पहले उनसे मिलने गए उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या से,या संत समाज मे किसी से अपना दर्द साझा क्यों नहीं किया?
जिस तथाकथित सुसाइड नोट मे महंत के सबसे प्रिय शिष्य आनंद गिरी का जिक्र बताया जा रहा है उसने मीडिया के माध्यम से महंत को ब्लैक मेल कर करोड़ों की दौलत बनाने वाले लोगों को महंत की मौत का जिम्मेदार बताया है।आनंद गिरी ने दो टूक कहा् है की एक सोची समझी साज़िश के तहत उनके गुरू‌ की हत्या की गई ,उनको महंत के‌ असली हत्यारे साजिशन फंसाना चाहते हैं। आनंद गिरी ने यह सनसनी खेज खुलासा भी किया कि महंत की मौत के तार पुलिस के कुछ बड़े अधिकारियों ‌से‌ जुड़े ‌हो‌ सकते हैं।गौर तलब है कि महंत नरेंद्र गिरी का एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से संपत्ति को लेकर गंभीर विवाद हुआ था जिसने मठ के बाहर धरना भी दिया था।संपत्ति विवाद के कई मामलों मे महंत नरेंद्र गिरी का मठ के भीतर और बाहर विवाद था ।कुछ मामलों मे तो राइफलें तक ताने जाने की बात सामने आई थी।
महंत नरेंद्र गिरी का विवादों‌ से चोली दामन का साथ रहा है। गौर तलब है कि अखाड़ा परिषद के वह निर्विवाद महंत नहीं थे। अखाड़ा परिषद से जुड़े
कई अखाड़े उनकी ताजपोशी के खिलाफ थे। एक बदनाम बार बाला और बीयर माफिया को महंत नरेन्द्र गिरी ने सपा के एक कद्दावर नेता की मौजूदगी मे महामंडलेश्वर बनाया था इसे लेकर भी वह गंभीर विवादों मे फंसे थे।
उनकी मौत के पीछे मठ की अकूत दौलत ,भगवा आभामंडल की आड़ मे फल फूल रहे जमीनों की खरीद फरोख्त को हाशिए पर धकेलने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता‌ ।इस मौत के मीडिया ट्रायल और एक संदिग्ध सुसाइड नोट के आधार पर महंत नरेंद्र गिरी की रहस्यमयी मौत को आत्महत्या सिद्ध करने की पुलिसिया थ्योरी गले के नीचे नहीं उतर सकती।आनंद गिरी के बयान के आलोक मे‌ देखना दिलचस्प होगा कि महंत की मौत का सच सामने आता है या पुलिसिया थ्योरी को सही साबित करने का लक्ष्य तय कर जांच की कोरम पूर्ति कर मामला निपटाने की कवायद की जाती है।

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