सियासत : प्रियंका ने 40 फीसदी सीटें महिलाओं को देने की कर दी घोषणा .

कृष्ण कांत की क़लम से

“आज नफरत का बोलबाला है, महिलाएं इसे बदल सकती हैं.” यह राजनीति अच्छी है.

यूपी में प्रियंका गांधी ​जहां जहां पीड़ित लोगों के साथ खड़ी हुई हैं, उनमें ज्यादातर महिलाएं रही हैं. आज की प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने जिस तरह से तमाम पीड़ित महिलाओं का जिक्र किया, उनके सा​थ हुए अन्याय का हवाला देकर महिलाओं का आह्वान किया, उनकी आकांक्षाओं का जिक्र किया, इसे लेकर अच्छी खासी खलबली दिख रही है. प्रियंका गांधी का भाषण किसी कुशल भाषणबाज की सियासी लफ्फाजी नहीं थी, वह तथ्यों पर आधारित था, इसलिए यह भाषण और 40 फीसदी सीटें महिलाओं को देने की घोषणा बेहद अहम होने जा रही है.

प्रियंका गांधी ने जो कुछ बोला, वह पढ़ी लिखी युवा महिलाओं को उनके साथ खड़ा कर सकता है. उन्होंने कहा, “हमारी पहली प्रतिज्ञा है कि आने वाले चुनाव में 40 प्रतिशत टिकट कांग्रेस महिलाओं को देगी. महिलाएं यूपी राजनीति में पूरी तरीके से भागीदार होंगी. यह निर्णय इलाहाबाद युनिवर्सिटी की छात्राओं के लिए है जिनको लगता है कि सारे नियम पुरुषों के लिए हैं. यह निर्णय प्रयाग की उस लड़की पारो के लिए है जिसने मुझे हाथ पकड़ कर कहा कि मैं कुछ बड़ा करना चाहती हूं. यह निर्णय उन्नाव की उस लड़की के लिए है जिसको जलाया गया मारा गया. यह निर्णय हाथरस की उस लड़की के लिए है जिसे न्याय नहीं मिला. यह निर्णय लखीमपुर की उस लड़की के लिए है जिसने बोला कि वह प्रधानमंत्री बनना चाहती है. यह निर्णय सोनभद्र की उस महिला किस्मत के लिए है जिसने अपने लोगो के लिए आवाज उठाई. यह यूपी की हर एक महिला के लिए है जो यूपी को आगे बढ़ाना चाहती है, जो शिक्षा और समानता चाहती है.”

“आज सत्ता खुलेआम पब्लिक को कुचल सकती है. आज नफरत का बोलबाला है, महिलाएं इसे बदल सकती हैं. मैं एक ऐसी राजनीति लाना चाहती हूं जिसमें करुणा का भाव हो. देश को धर्म की राजनीति से निकलना है और आगे ले जाना है, महिलाओं को खुद ये काम करना पड़ेगा.”

यह आह्वान अगर कामयाब होता है तो यह एक तरह से पुरुषों के वर्चस्व वाली राजनीति की तानाशाही, क्रूरता और कानूनहीनता को महिलाओं की ओर से खुली चुनौती है.

यूपी में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. इसलिए कांग्रेस जिस तरह से एकदम जमीनी और जन सरोकार की राजनीति कर रही है, उससे न सिर्फ प्रदेश का सियासी माहौल बदलेगा, बल्कि कांग्रेस का ग्राफ भी तेजी से उपर चढ़ रहा है. कांग्रेस को हार जीत की चिंता के बगैर आगे बढ़ना चाहिए. गांधी और नेहरू की यही खूबी थी कि वे हार जीत के लिए, पूरी उम्र समाज और देश के कल्याण के लिए लड़े. यही कांग्रेस की विरासत है.

सशक्तिकरण का असली अर्थ सत्ता में भागीदारी है. हाशिए पर खड़े हर वर्ग को सत्ता में भागीदारी देकर ही असल में उसे मजबूत बनाया जा सकता है. कांग्रेस चुनाव में कुछ हासिल करे या न करें, लेकिन यह राजनीति अच्छी है. राजनीति को हिंदू-मुसलमान उन्माद और नफरत का कारोबार बना दिया गया है. बीजेपी तो लोकतंत्र की कल्पना से भी डरती है. उसे एक आधुनिक, लोक​तांत्रिक और विकसित समाज से चिढ़ है. उसे बांटो और राज करो की राजनीति करनी है जिसके लिए एक पिछड़ा सबसे मुफीद रहेगा. इसीलिए बीजेपी हर मोर्चे पर देश को पीछे ले जा रही है. भारत की राजनीति को वापस लोकतंत्र के ढर्रे पर लाने का काम कांग्रेस की ही अगुवाई में ही हो सकता है और यह इस वक्त की सबसे जरूरी मांग है.

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