महिला कार्ड के जरिए खोई जमीन तलाश रही है कांग्रेस

राजीव कुमार ओझा 

जाति-धर्म के सियासी पाले में कांग्रेस ने महिला कार्ड खेल कर भाजपा सहित सभी सियासी पार्टियों के समक्ष एक कड़ी चुनौती पेश‌ की है। प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में 40प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने की घोषणा की है। कांग्रेस ने जो लकीर खींची है उसके बराबर या उससे बड़ी लकीर खींच पाना भाजपा और गैर कांग्रेसी पार्टियों के लिए मुमकिन नहीं है। लेकिन हर पार्टी को कांग्रेस के इस सियासी दांव ने महिलाओं को टिकट देने के मोर्चे पर घेरने में सफलता हासिल की है।
कहने को प्रियंका गांधी ने कहा है कि नफरत और डर के माहौल को समाप्त करने में महिलाएं सक्षम हैं। इसलिए कांग्रेस ने महिलाओं का सम्मान करने के इरादे से 40प्रतिशत टिकट देने का फैसला किया है लेकिन यह आधी हकीकत आधा फसाना जैसा सियासी बयान है। जिस तरह उन्नाव, बहराइच, हाथरस,लखीमपुर कांड के हवाले से महिलाओं‌‌ को 40प्रतिशत टिकट देने की घोषणा कांग्रेस ने की है उसे हम दलित -ओबीसी वोट बैंक को लुभाने की एक सुविचारित सियासी रणनीति कह सकते हैं। जबसे प्रियंका गांधी ने अघोषित तौर पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस की बागडोर थामी है वह योगी सरकार को घेरने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रही हैं। आक्रामक तेवर में प्रियंका गांधी पुलिस धक्का-मुक्की , पुलिस अधिकारियों से तीखी बहस कर वह योगी सरकार को कठघरे में खड़ा करती रही हैं ,वहीं अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश भी करती रही हैं।
लखीमपुर कांड के पीड़ित परिवारों से मिलने जाते समय प्रियंका गांधी को रोकने के लिए योगी सरकार ने हर मुमकिन कोशिश की । प्रियंका के आक्रामक तेवर से योगी सरकार को बैकफुट पर जाने को मजबूर होना पड़ा था। कमोवेश यही नजारा आगरा मे पुलिस कस्टडी में हुई अरुण वाल्मीकि की मौत के मामले में लखनऊ से आगरा के लिए निकली प्रियंका गांधी को रोकते समय देखा गया। प्रियंका गांधी का कहना था कि वह पुलिस कस्टडी में मारे गए दलित युवक के परिवार से मिलने जा रही थीं । असंवैधानिक तरीके से योगी सरकार उनको शोक संतप्त दलित परिवार से मिलने नहीं देना चाहती है। प्रियंका ने आगरा जाने की रणनीति बनाकर वाल्मीकि समाज को यह भरोसा देने की सियासी चाल चली है कि कांग्रेस दलितों की सच्ची हमदर्द है।योगी सरकार ने एक बार फिर प्रियंका गांधी को रोकने का फरमान जारी कर अपनी और अपनी सरकार की फजीहत कराने की गलती की है। ठीक लखीमपुर कांड की तरह योगी सरकार ने आगरा जाते समय प्रियंका गांधी को‌ हिरासत में लेकर और थुक्कम फजीहत के बाद आगरा जाने की इजाजत देकर अपनी फजीहत कराई। प्रियंका गांधी के आक्रामक तेवर के मुकाबले योगी सरकार की बार बार बैकफुट पर जाने की गलती से कांग्रेस को सियासी तौर पर यह फायदा मिल रहा है कि भाजपा से त्रस्त अवाम को यह लगने लगा है कि कांग्रेस के पास जमीन हो या ना हो लेकिन सियासी अनुभव और‌ दमखम जरूर है । लोग यह कहने लगे हैं कि कांग्रेस ही मोदी -योगी को बार बार बैकफुट पर जाने को मजबूर कर सकती है।
गौरतलब है कि लखीमपुर कांड में कांग्रेस ने योगी-मोदी की डबल इंजन सरकार के खिलाफ अपनी आक्रामक रणनीति से उतर प्रदेश की सत्ता की प्रबल दावेदार सपा और बसपा पर जो शुरुआती बढ़त हासिल की थी वह आगरा के दलित युवक अरूण वाल्मीकि की पुलिस हिरासत में हुई संदिग्ध मौत मामले में भी बरकरार है।
उत्तर प्रदेश की चुनावी सियासत में अपनी रणनीतिक विफलताओं के कारण 30-32 साल से सियासी वनवास झेल रही कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का आगाज भाजपा के खेवन हार नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से किया ताकि कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन‌ हो सके और यह संदेश‌‌ दिया जा सके कि नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस तैयार है।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि 40प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने की घोषणा पर अमल करना खुद कांग्रेस के लिए दो धारी तलवार पर चलने जैसा होगा। स्वाभाविक है कि 40प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने के लिए उसे पुरुषों की नाराजगी झेलनी होगी।
इस फैसले के सियासी नफा नुकसान का आकलन फिलहाल संभव नहीं है।अभी इंतजार करना होगा कि कांग्रेस चुनाव पूर्व किसी दल से गठबंधन करती है या नहीं। महिला कार्ड खेलने चली कांग्रेस को इस बात का जबाब देना होगा कि महिलाओं को सम्मान देने का यह फार्मूला उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भी लागू होगा या नहीं?
बहरहाल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है । महिला कार्ड खेल कर आधी आबादी को अपने पाले में खींच पाने में वह सफल ही होगी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता।
कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में जमीनी सच किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस की सबसे बड़ी दुश्वारी यह है कि उसके पास यहां न तो मजबूत सांगठनिक ढांचा है न ही जमीनी कार्यकर्ता हैं। क्षेत्रीय क्षत्रपों की गुटबाजी चरम पर है। चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाना आसान है लेकिन भीड़ को वोट में तब्दील करना मुश्किल यह बात कांग्रेस आलाकमान को समझ लेनी चाहिए। उसे समझना होगा कि
सियासी वनवास समाप्त करने के लिए जमीनी कार्यकर्ता होने चाहिए जो फिलहाल कांग्रेस के पास नहीं हैं।उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि सत्ता के खिलाफ आक्रामक रणनीति, महिला कार्ड का बेहतर फार्मूला उसे सियासी चर्चा में ला सकता है लेकिन सत्ता नहीं दिला सकता है। सियासी वनवास की समाप्ति के लिए मजबूत सांगठनिक ढांचा और जमीनी कार्यकर्ता का होना जरूरी है यह बात कांग्रेस आलाकमान को समझ लेनी चाहिए। उसे उत्तर प्रदेश कांग्रेस की बागडोर जी हजूरिये अध्यक्ष की जगह किसी अनुभवी वरिष्ठ नेता को फौरन से पेश्तर सौंपनी चाहिए।

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