कालचिंतन- भाग-1 : ग़रीबी की रेखा खींचने वाले सिस्टम ने अमीरी की कोई सीमा रेखा नहीं तय की

 

हमारे 74 बरस के लोकतंत्र का हासिल बस इतना भर है कि- उड़ीसा में दाना मांझी को अपने पत्नी का शव कंधे पर लेकर सिसकती बेटी के साथ रात के अंधेरे में पैदल अस्पताल से घर निकल जाने को विवश कर दिया जाए. पूर्वोत्तर भारत-मणिपुर की आवाज़ इरोम शर्मिला के 16 बरस के भूख हड़ताल का हासिल बस यही हो, कि उन्हें चुनाव में 90 वोट मिले, जिस पर उन्हें इस लोकतंत्र का शोकगीत लिखते हुए कहना पडा – ‘थैंक्स फार नाइटी वोट्स’.

 

  • समाज की यह मानसिक दरिद्रता लोकतंत्र के लिए ख़तरा भी है
  • (यह सत्ता परिवर्तन है, या व्यवस्था परिवर्तन..?)
  • @ अरविंद सिंह
    मनी, पावर और पालिटिक्स का आधुनिक संस्करण, जो एक नया त्रिभुज बनाता जा रहा है, वह जनतंत्री समाज और सियासत के लिए ख़तरनाक स्थिति बनती जा रही है. भारतीय लोकतंत्र की मजबूती और परिपक्वता इसमें नहीं थी कि यहाँ नव धनकुबेरों के अंकपाश में लोकतंत्र की हया, भविष्य और मेधा, गिरवी होती जाए, उसका गला घुंटता जाए, और हम हर पांच बरस में मानसिक दरिद्रता और पतन का लोकतांत्रिक उत्सव मनाते जाएं. हमारे 74 बरस के लोकतंत्र का हासिल बस इतना भर है कि- उड़ीसा में दाना मांझी को अपने पत्नी का शव कंधे पर लेकर सिसकती बेटी के साथ रात के अंधेरे में पैदल अस्पताल से घर निकल जाने को विवश कर दिया जाए. पूर्वोत्तर भारत-मणिपुर की आवाज़ इरोम शर्मिला के 16 बरस के भूख हड़ताल का हासिल बस यही हो, कि उन्हें चुनाव में 90 वोट मिले, जिस पर उन्हें इस लोकतंत्र का शोकगीत लिखते हुए कहना पडा – ‘थैंक्स फार नाइटी वोट्स’.
    तो फिर वही सवाल, क्या इस लोकतंत्र में ‘लोक’ का ऐसे ही दम निकलता जाएगा और तंत्र की पकड़ यूँही मजबूत होती जाएगी.
  • दरअसल हो तो यही रहा है- चंद मुट्ठी भर लोगो के पास देश की अकूत संपदा कै़द है, ग़रीबी की रेखा खींचने वाले सिस्टम ने अमीरी की कोई सीमा रेखा नहीं तय की. लिहाज़ा देश में अमीरी और ग़रीबी के बीच बढ़ती खाईं, नये आक्रोश और असमानता, वैचारिक विषमता को ही नहीं, बल्कि मानसिक विकलांगता को भी जन्म दे रही हैं. आज पूरे लोकतांत्रिक ढांचा में मनी और पावर का गेम चल रहा है, दोनों के जरिए पालिटिक्स साधी जा रही है. सत्ता जनतंत्र की स्थापना के नाम पर आती है और आते ही वह अमीरों की रखैल सी बन जाती है. या यूँ कहें तो चंद कारपोरेट घरानों की चाकरी करने लगती है.
    ग़रीब के आंखों में पलने वाले सपनें, नये धन कुबेरों और कारपोरेट को नहीं सुहाते हैं. क्योंकि अमीरी की अपनी संस्कृति होती है.फिर वही सवाल कि- झोपड़ी की हया, महलों के हरम से कब तक तय होगी.
    आखिर जिस सभ्य समाज की परिकल्पना की गयी थी, जिस लोकतंत्र की स्थापना की कसमें खाईं गयीं थीं, जिस संविधान पर हाथ रखकर शपथ लिया था, वह बस सत्ता परिवर्तन का साधन बन रह गईं या फिर व्यवस्था परिवर्तन भी हुआ. सात दशक से आती- जाती सरकारों से यह सवाल कितनी बार पूछें गयें होगें, कितने लाख और करोड़ अक्षर लिखे गएं होगें, लेकिन सवाल का जवाब फिर भी निरूत्तर है.
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