हौसलों का बरगद डॉ.महेंद्रनाथ राय 

आज यूं ही बैठा था. महेंद्र भईया याद आ गए. वैसे ही जैसे मैं अपने आपको भी याद कर लेता हूं. विद्रोही कलम है मेरी. किसी की प्रशंसा में सियाही उतर जाना कलम के चरित्र में नहीं है. लेकिन कुछ क़िरदार ऐसे होते हैं, जहां सारे तटबंध टूट जाते हैं. जहां विद्रोह एक आशिक हो जाता है. जहां मन करता है, यहीं रुक जाएं. डॉ. महेंद्रनाथ राय वही शख़्सियत हैं. हौसलों का बरगद, उम्मीदों की छांव, संवेदना की गहराई और भरोसे का समंदर. तो लिखने की कोशिश कर रहा हूं कि हर्फ़ मचल रहे हैं, मैं समझ नहीं पा रहा हूं. लेकिन कलम है कि रुकने का नाम नहीं ले रही है.

अजब संयोग है कि आज जब अपने भावों को स्याही से रंग रहा हूं, तभी आभासी दुनिया का एक नोटिफिकेशन भी आ रहा है. नोटिफिकेशन दरअसल डॉ. महेन्द्रनाथ राय के फेसबुक पोस्ट का था. इसमें उन्होंने बताया कि उन्हें दुनिया के सबसे पवित्र कार्य शिक्षा से जुड़े 25 वर्ष हो गए हैं. पिछले 25 सालों से ज्ञान का दीया जलाए डॉ. महेन्द्रनाथ राय उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य हैं. शिक्षा के साथ  संवेदनशील होना उनका नैसर्गिक गुण है तो करुणा उनके व्यक्तित्व को अलग ही निखार देती है. ना जाने कितने होनहार जो सियासत की भेंट चढ़ किसी नेता की रैली में ज़िंदाबाद मुर्दाबाद कर रहे होते, आज किसी मल्टीनेशनल कंपनी के वातानुकूलित केबिन में बैठकर अपने परिवार का गौरव बने हुए हैं. कोई बहन, बेटी ठंढ़े होते चूल्हे की बगलगीर ना होकर अपने परिवार को खुसी खुशी संचालित कर रही है. ऐसे लोगों के पढ़ने लिखने का इंतज़ाम करते इस निष्काम योगी को ज़रा सी भी झिझक महसूस नहीं हुई. कोई भार नहीं महसूस हुआ ना कोई बोझ.!

संग्रह की विश्वव्यापी प्रवृत्ति से परे महेन्द्रनाथ राय अपने घरों में आती तनख्वाहों के दुश्मन हैं. कभी अपनी ज़रूरत काटी तो कभी अपनों की. लेकिन समाज के हासिये पर खड़े किसी हुनरमंद का हुनर मरने नहीं दिया. ऐसा नहीं है कि वो कोई बड़े उद्योगपति हैं. बड़े पॉलिटिकल मैनेजर हैं लेकिन क़िरदार की शक़्ल देखे तो डॉ.महेन्द्रनाथ राय इन लोगों से बहुत ऊपर हैं. सादगी इतनी कि इस हाथ से दिया तो उस हाथ को पता ना चले, इसका बराबर ख़याल रहता है. मेरी उनकी मुलाक़ातों में मुझे उनमें बनावट जैसा कभी कुछ दिखा नहीं. एक सस्ता सा कंबल बांटते लोगों की फोटो हर जानने वाले के इनबॉक्स तक पहुंचने, पहुंचाने वाले इस दौर में विनम्र रहना, दरअसल एक ऐसी खूबी है, जो सफ़ेद हाथी हो चुकी है. संत अंहकारी दिखते हैं तो देने वाले हाथ दर्प से भरे हुए. लेकिन डॉ. महेन्द्रनाथ राय को देखता हूं तो लगता है कि एक कप कॉफी पी, पेमेंट किया और चल दिये. अब इसमें कुछ महत्वपूर्ण तो नहीं है कि उसकी निजी या सार्वजनिक रूप से चर्चा की जाए. किसी की मदद करना, उनके लिए महज़ एक कॉफी का कप भर है. जो विमर्श तो कत्तई नही होता.

सैकड़ों लोगों को सरकारी, गैर सरकारी नौकरियां दिलाने वाले महेन्द्रनाथ राय मस्त मौला स्वभाव के इंसान हैं. बस हंसते रहते हैं. एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि अम्बरीष जी अच्छा काम करते रहिए, किसी की पैरोकारी की ज़रूरत नहीं है. परमात्मा आपको आपके नियत स्थान तक अवश्य पहुंचा देगा. कहीं कोई आडम्बर नहीं, दिखावा नहीं, प्रचार की कोई भूख नहीं. मंशा बस इतनी कि लोग अच्छा करें, अच्छा होने का दिखावा नहीं. यक़ीन मानिए आप उनसे मिलेंगे तो आपके दोस्त हो जाएंगे, आपका हिस्सा हो जाएंगे, आपके शुभचिंतक हो जाएंगे, शर्त बस इतनी कि आप ईमानदार हों.

उनका हृदय करुणा से भरा है तो मस्तिष्क बुद्धि चातुर्य से परिपूर्ण. अपने को फन्ने खां बनते कितने लोगों को मैंने देखा है उनके सामने घुटनों पर बैठते हुए, उनको हारते हुए. महेन्द्रनाथ राय के व्यक्तित्व के दूसरे पहलू की बात करें तो उत्तर प्रदेश की शिक्षक राजनीति में मज़बूत दख़ल रखने वाले इस शख़्स से लखनऊ में बैठी सरकार अक़्सर परेशानी में रहती है. शिक्षक हितों की इस मज़बूत आवाज़ के साथ खड़ी शिक्षकों की भारी संख्या सत्ता प्रतिष्ठानों के लिए हमेशा कौतूहल प्रकट करती रहती है. विधान भवन में इस क्रांतिकारी आवाज़ को गूंजने से रोकने के लिए सत्ता ने कितने षड़यंत्र किए हैं, संबंधित लोग बख़ूबी जानते हैं. अच्छे अच्छे राजनेता डॉ. महेन्द्रनाथ राय के पहलू में अपना पहलू बदलते रह जाते हैं. डॉ. महेन्द्रनाथ राय के बारे में मैं अपनी राय रखूं तो मुझे एक ऐसा मॉडर्न संत नज़र आता है, जो कपड़े तो अत्याधुनिक पहनता है, प्रभावशाली औरा रखता है लेकिन हृदय एक निष्पाप बच्चे का है. एक ऐसे दौर में जब लोग अपनी ब्रांडिंग और मार्केटिंग करने के नए नए उपकरण तलाशते रहते हैं, तब डॉ. महेन्द्रनाथ राय जैसे लोग अंधेरे में रहना चाहते हैं. चाहते हैं कि उनके निःस्वार्थ मददगार हिस्से की बात सार्वजनिक ना हो. उनका कहना है कि इससे जिनकी मदद की गई, वो कहीं न कहीं अपने को छोटा महसूस करने लगते हैं और मैं नहीं चाहता कि मेरी वज़ह से कोई आहत हो.

कई बार मैंने कहा कि आपके व्यक्तित्व के कई ऐसे पहलू हैं, जिन पर मैं लिखना चाहता हूं. लेकिन हर बार उन्होंने मुझे ऐसा करने से रोक दिया है. आज जब डॉ. महेन्द्रनाथ राय के बारे में लिख रहा हूं तो ख़याल कर रहा हूं कि उनसे लाभान्वित हुए किसी शख़्स का ज़िक्र ना हो, उसकी पहचान उज़ागर ना हो. और ये भी सोच रहा हूं कि जब ये मेरे भाव स्याही बन बह चले हैं तो उनकी क्या टिप्पणी होगी? लेकिन इतना ज़रूर जनता हूं कि मैं कुछ कहकर ख़ुद बहुत खुश हूं. महेंद्र भईया को उनके 25 साल मुबारक़. वो 25 साल जिनमें उन्होंने ना जाने कितने अंधेरों को अपने इल्म की रौशनी से उजाला बख्शा है. कितनी उम्मीदों को टूटने से बचाया है. मुझे डॉ. महेंद्रनाथ राय के लिए अपना लिखा एक शेर याद आ रहा है …

मैं सूरज से मुकाबिल तो नहीं लेकिन
च़राग हूं टिकते नहीं अंधेरे मिरे सामने

डॉ. अम्बरीष राय

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