विचार : योगी की ‘बाबा बुलडोजर’ की छवि ने ही उन्हें भारतीय राजनीति में स्थापित कर दिया..!

यह एक पीठाधीश्वर का स्थापित सियासी मिथकों को तोड़ने और नये गढ़ने की शुरुआत भर है या मोदी ब्रांड के बाद देश के सबसे बड़े सूबे से निकले फायर-ब्रांड एक ‘योगी’ का शानदार आगाज़.

@ डॉ अरविंद सिंह #त्वरितटिप्पणी
यह एक महंत का भारतीय सियासत में अभूतपूर्व उभार है या देश के हिन्दुत्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला का सबसे बड़ा प्रयोग. यह जातिवाद और वंशवाद के विरुद्ध बहुसंख्यक समाज का वज्रपात है या उसका नया आगाज़ है.यह भ्रष्टाचार और जातीयता के केचुल में लिपटी चार दशक की वीभत्स सियासी तस्वीर का नयें अंदाज में रंग-रोगन करने की भगवा शुरुआत. यह भारतीय जनमानस की सियासी चेतना में बदलाव और परिवर्तन का दौर है या हिन्दुत्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला में दलितों को दलित-चेतना से निकाल सबसे पहले प्रखर हिन्दुत्व की आंच में तपाने की भाजपाई आगाज़.
यह एक पीठाधीश्वर का स्थापित सियासी मिथकों को तोड़ने और नये गढ़ने की शुरुआत भर है या मोदी ब्रांड के बाद देश के सबसे बड़े सूबे से निकले फायर-ब्रांड एक ‘योगी’ का शानदार आगाज़. आखिर उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ का ‘बुलडोजर बाबा’ बनने के बाद लगातार दूसरी बार उत्तर प्रदेश जीतने के निहितार्थ का मनोविज्ञान क्या हैं?
पहाड़ के पंचूर गाँव से निकला एक बालक जब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के गोरक्षपीठ में दाखिल होता है. तब किसी ने कल्पना तक नहीं किया होगा कि एक दिन यह बालक पूरब के सबसे बड़े पीठ-गोरक्षपीठ का पीठाधीश्वर बन जाएगा और यहीं से उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री. सांसद और विधायक तो इस देश में हर पांच बरस में बनते ही हैं, लेकिन पीठाधीश्वर बनना आसान नहीं था और न है. और वह भी गोरक्ष जैसे घोर जनास्था के पीठ का. तप और जप ही नहीं अपने पुरातन पहचान और रिश्तों का भी बलिदान करना पड़ता है. पीठ के पीठाधीश्वर ही नये माँ- बाप होतें हैं और वहीं आप की नयी पहचान. पंचूर गाँव के अजय विष्ट का एक योगी में कायान्तर और फिर आदित्यनाथ बन पीठाधीश्वर की गद्दी पर बैठना, त्याग की परम कसौटी भी थी और है.
यूँ तो गोरक्षपीठ का सियासत में दखल पुराना है. जाति-पात ऊंच-नीच और इन दुनियावी बंधनों को काटने का इतिहास इस पीठ से जुड़ा है. काशी के डोमराजा के सम्मान में सहभोज देने वाले इस पीठ की परंपरा का निर्वाह आज के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने भी कायम रखा है. आज भी इस पीठ का मुख्य पुजारी दलित है तो इस मठ के बाहर मुस्लिमों की दुकाने सजती हैं, जिसके ग्राहक हिन्दू होतें हैं. गोरखपुर और इस खित्ते में वनटांगियां मुसहरों के जीवन में बदलाव योगी आदित्यनाथ के दलित प्रेम की परंपरा का ही हिस्सा है. जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो सघन वनों में निवास करने वाले मुसहरों और वनटांगियां के जीवन में परिवर्तन ला दिया. घोर अभाव, अभिशप्त, और नारकीय जीवन जीने वाले इस समुदाय के लिए आज के बाबा बुलडोजर किसी भगवान से कम नहीं हैं.
जिस सूबे में पिछले कई दशकों से मंडल और कमंडल से निकली सियासी नर्सरी ने अपनी सियासी हसरतों के लिए समाज को सम्प्रदाय और जातिवाद के खांचे में बांटा. जातियों और वर्गों में विभाजन कर नये सियासी जमीन तैयार किया, और इस प्रक्रम से सत्ता के नये ठेकेदार पैदा हुए. ये ठेकेदार जातियों की भलाई के नाम पर सत्ता में आए लेकिन अपने विकास का ध्येय परिवार तक सीमित कर देश के संसाधनों का लूट किया.
परिणाम स्वरूप कांग्रेस जैसी पार्टियों का वोटबैंक एक बार खिसकना शुरू क्या हुआ, वह सिलसिला आज भी जारी है. वैसे ही जैसे दलितों के उद्धार के लिए काशीराम के मिशन पर सवार हो चला बहुजन आंदोलन का मायावती के सत्ता और माया प्रेम के भेंट चढ़ता गया. हालांकि जातीय चेतना के उभार में सत्ता के इन ठेकेदारों ने खुब सफलता पायी, लेकिन इन जातियों का उस स्तर पर भलाई नहीं हो सकी जो अपेक्षित था.
आज देश के सबसे बड़े सूबे में ‘ब्रांड योगी’ का जो उभार हुआ है, उसकी धमक पूरे देश और दूनिया मे सुनाई दे रही है कि कैसे हिन्दुत्व का एक फायर ब्रांड नेता और पीठाधीश्वर हिन्दुस्तान के सबसे बड़े सूबे की सत्ता में लगातार दूसरी बार शानदार दस्तक देते हुए वापसी कर ली है,वह भी प्रखर हिंदुत्व और फायरब्रांड की अपनी छवि के साथ.
दरअसल इस वापसी में हिन्दुत्व की स़ख्त छवियों के बाहर कानून- व्यवस्था और योजनाओं के निष्पक्ष और पारदर्शी क्रियान्वयन के साथ बाबा बुलडोजर का ईमानदार प्रशासक की छवि भी है, तो वहीं दलित वोटबैंक का सिफ्टिंग कराने में मिली अपार सफलता भी है… बाबा बुलडोजर अब अपनी इसी छवि के सहारे उत्तर प्रदेश की सियासत का सबसे बड़ी ताकत बन चुका है, जो राष्ट्रीय राजनीति में जबरदस्त दखल रखने की कुबत रखता है.

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