टिप्पणी : क्या सपा का चुनावी कैंपेनिंग अखिलेश का ‘वनमैन शो’ बन कर रह गया..?

 

क्या इस नवीन धारणा में कोई बल है कि अखिलेश यादव के समाजवादी पार्टी की राजनैतिक हैसियत अब ‘ वनमैन शो’ बन कर रह गयी है. जिसके मास्टर वे स्वयं हैं. जबकि इसके विपरीत मुलायम सिंह एक खांटी गांव और गरीबी से निकले, संघर्ष और अनुभव से पके सियासतदां थे, जिन्होंने अपने समाजवादी पार्टी में जनेश्वर मिश्रा,मोहन सिंह, कुंवर रेवती रमण सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान आदि जमीनी और वैचारिकता से पुष्ट अनुभवी राजनेताओं का साथ और सहयोग मिलता था.

 

बाबा का बुलडोजर नेगेटिव की बजाय पाजिटिव नैरिटिव गढ़ने में सफल हो गया

० भाजपा, सपा सरकार की 5 बरस पहले की कमियाँ बता सत्ता में आ गयी

@ डॉ अरविंद सिंह #त्वरितटिप्पणी
धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव क्या जमीनी राजनीति के वाकई पहलवान थे. क्या अखिलेश यादव पिता की जमीनी सियासत के अनुभव और दांवपेंच के उस गुर को अभी तक सिख नहीं सके,क्या वे सियासी परिस्थितियों को भांपने में अभी तक अनुभवहीन ही साबित हो रहें हैं.
जिसका इस्तेमाल करके कभी उनके पिता और मुलायम सिंह यादव, विपरीत परिस्थितियों में भी विपक्षी को चरखा और धोबिया पछाड़ दांव से चित्त कर दिया करते थे.
वर्तमान में अगर यह धारणा पूरी तरह से सच नहीं भी हो,
तो भी 2017, 2019 और अब 2022 के चुनावों के परिणाम और सत्ता से उनकी बढ़ती हुई दूरी को देखते हुए राजनीति को समझने और जानने वाला एक वर्ग ऐसी धारणा अब बनाने लगा है.
क्या इस नवीन धारणा में कोई बल है कि अखिलेश यादव के समाजवादी पार्टी की राजनैतिक हैसियत अब ‘ वनमैन शो’ बन कर रह गयी है. जिसके मास्टर वे स्वयं हैं. जबकि इसके विपरीत मुलायम सिंह एक खांटी गांव और गरीबी से निकले, संघर्ष और अनुभव से पके सियासतदां थे, जिन्होंने अपने समाजवादी पार्टी में जनेश्वर मिश्रा,मोहन सिंह, कुंवर रेवती रमण सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान आदि जमीनी और वैचारिकता से पुष्ट अनुभवी राजनेताओं का साथ और सहयोग मिलता था. क्या मुलायम सिंह यादव किसी निर्णय और राजनैतिक फैसले से पहले अपने दल के इन राजनैतिक नेताओं से विचार-विमर्श किया करते थे. इन पंक्तियों के लेखक ने स्वयं अपनी आंखों के सामने दिल्ली में जनेश्वर मिश्रा की कोठी पर मुलाकात और विमर्श करते मुलायम सिंह यादव को देखा था.
परिणाम स्वरूप मुलायम के पास ऐसे चेहरे थे जो खांटी समाजवादी और वैचारिक थे, जिनका इस्तेमाल वे चुनाव प्रचार और रैलियों में किया करते थे और परिणाम को अपने पक्ष में कर लिया करते थे. ये ऐसे चेहरे थे जो अलग अलग समाज से थे, जिनकी अपने समाज के अतिरिक्त व्यापक समाज पर गहरी पकड़ थी, समस्याओं और परिस्थितियों को भांपने का हुनर और कौशल था.
दूसरी तरफ आज परिस्थितियां, उससे काफी भिन्न हैं, समाजवादी पार्टी के मुकाबले वह भाजपा है, जिसके पास बहुत बड़ा संगठन और समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज है. रणनीति बनाने वाले चाणक्य हैं तो संसाधनों की प्रचुरता है. आखिरी व्यक्ति तक मैसेज कम्यूनिकेशन करने वाली शक्तिशाली टीम है और सबसे बड़ी बात की उनके पास अनुभवी नेताओं की फौज है, जो विभिन्न समुदायों से आतें हैं. इसके विपरीत अखिलेश यादव के पास जमीनी और वैचारिक प्रतिबद्ध नेताओं का अकाल है या फिर वे उनका सही इस्तेमाल करने की राजनैतिक कला से अनभिज्ञ हैं.
हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने परिवारवाद के दाग को धोने का भरसक प्रयास किया. परिवार से किसी अन्य व्यक्ति को टिकट न देकर, शिवपाल को उनकी पार्टी से गठबंधन के कारण एक सीट जसवंतनगर की दी. लेकिन शिवपाल का भी प्रयोग चुनाव प्रचार में उस आक्रामक ढंग से नहीं कर सकें, जो उन्हें करना चाहिए था. दलबदलू और भाजपा से चुके नेताओं और मंत्रियों को सपा में शामिल कर लेना और उन्हें टिकट भी दे देना, यह उनकी रणनीतिक कमज़ोरी थी, क्योंकि इससे उनके पार्टी के काडर जिसने पांच बरस तक क्षेत्र में पार्टी के लिए मेहनत किया, उसके लिए थोपे हुए प्रत्याशी बाहरी ही साबित हुएं, स्वामी प्रसाद मौर्य का फाजिलनगर से पराजय इसका उदाहरण है. ऐसा लगता है अखिलेश यादव के समाजवादी पार्टी का संसदीय बोर्ड की अहमियत लगभग समाप्त हो चुकी है. राजेन्द्र चौधरी, उत्तम पटेल, अभिषेक मिश्रा ही उनके रणनीतिक मुहरें रहीं.
2012 का चुनाव मुलायम सिंह यादव के चेहरे पर लड़ा गया और आस्ट्रेलिया से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके आए अखु यादव सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ गयें. आंदोलन और संघर्ष में पकना क्या होता है, वह नहीं जान पाएं. जबकि राजनीति में जमीनी मुद्दों की पकड़ और समाज के मानस को पढना आना चाहिए.
यही कारण था कि मुलायम सिंह के न चाहते हुए भी उन्होंने 2017 में सपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरे, जबकि वे सत्ता में थे, उन्हें अपने काम और योजनाओं के साथ जनता के बीच जाना चाहिए था. परिणाम दो लड़कों जोड़ी फ्लाप साबित हुई.
यही नहीं गठबंधन से सिखने की बजाय 2019 में एकबार फिर बसपा- के साथ चुनाव में उतरे और बुआ- बबुआ की जोड़ी असफलता की नई इबारत लिख दी, जबकि मुलायम सिंह इस गठबंधन के खिलाफ थे, यही कारण था, उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री बनने की कामना कर दी.
हालांकि 2022 में उन्होंने एक बार फिर लोकदल सहित अनेक छोटे दलों के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरे और सीटों और वोट शेयर को बढ़ाने में सफलता हासिल की लेकिन सत्ता के करीब पहुंचने लायक संख्या फिर भी नहीं ला सके. क्योंकि वे एक बार फिर मुद्दों को पकड़ने में बिफल साबित हुए, पूरी चुनावी ‘कंपैनिंग वनमैन शो’ बन कर रह गया. उनके व्यवहार और बाडी लैंग्वेज में एक अजीब एटीट्यूड था. जबकि भाजपा अपनी योजनाओं को बताने और बुलडोजर बाबा की छवि निखारने में सफल रही. कितना गजब है न, कि भाजपा पांच बरस पहले की सपा सरकार की कमियों और अराजकता का भय दिखाकर उसे रोक सत्ता में आने से रोक दिया और सपा भाजपा सरकार की कमियों को जनता से पहुँचा नहीं सकी. इसी को कहते हैं मैसेज कम्यूनिकेटर, जो भाजपा है.

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