आपातकाल स्मरण, संघर्ष और सबक

1977 के बाद प्रायः प्रत्येक वर्ष, 25-26 जून को आपातकाल की बरसी मनाई जाती है. इस साल भी मनाई जा रही है. आपातकाल के काले दिनों को याद करते हुए लोकतंत्र की रक्षा की कसमें खाई जाएंगी. वाकई आपातकाल और उस अवधि में हुए दमन-उत्पीड़न तथा असहमति के स्वरों और शब्दों को दबाने के प्रयासों को न सिर्फ याद रखने बल्कि उनके प्रति चौकस रहने की भी जरूरत है ताकि भविष्य में कोई सत्तारूढ़ दल और उसका नेता वैसी हरकत और हिमाकत नहीं कर सके जैसा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25-26 जून 1975 की दरम्यानी रात में किया था.
उस कालीरात को देश को आपातकाल और सेंसरशिप के हवाले कर नागरिक अधिकार एवं स्वतंत्रताएं छीन ली गई थीं. राजनीतिक विरोधियों को उनके घरों, ठिकानों से उठाकर जेलों में डाल दिया गया था. अभिव्यक्ति की आजादी पर सेंसरशिप का ताला जड़ दिया गया था. पत्र-पत्रिकाओं में वही सब छपता और आकाशवाणी पर वही प्रसारित होता था जो उस समय की सरकार चाहती थी. प्रकाशन-प्रसारण से पहले सामग्री को प्राधिकृत अधिकारी के पास भेज कर उसे सेंसर करवाना पड़ता था. तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो क्या आज स्थिति उस समय के आपातकाल से भिन्न है. इस पर चर्चा से पहले इंदिरा गांधी के आपातकाल के बारे में कुछ बातें :
आपातकाल की पृष्ठभूमि
इंदिरा गांधी 1971 के आम चुनाव में बैंकों के राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति जैसे अपने फैसलों पर आधारित गरीबी हटाओ के नारे के साथ प्रचंड बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हुई थीं. उन्होंने अपने प्रचारतंत्र और मीडिया का सहारा लेकर अपनी गरीब हितैषी और अमीर विरोधी छवि बनाई थी. लेकिन आगे चलकर गुजरात के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में छात्रावास में बढ़ी फीस और घटिया भोजन की आपूर्ति के विरोध में शुरू हुए छात्र आंदोलन ने नव निर्माण आंदोलन का व्यापक रूप धर लिया था. इस आंदोलन की परिणति राज्य में कांग्रेस की सत्ता से बेदखली के रूप में हुई थी. और फिर ऐतिहासिक रेल हड़ताल और बिहार आंदोलन ने, जिसने आगे चलकर देश भर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का रूप धारण करने के साथ ही, केंद्र में शक्तिशाली इंदिरा गांधी की सरकार को भी भीतर से झकझोर दिया था. इस आंदोलन को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर प्रायः सभी गैर कांग्रेसी दलों का सहयोग-समर्थन था. तभी 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हां का ऐतिहासिक फैसला आ गया. सिन्हां ने रायबरेली में इंदिरा गांधी से पराजित समाजवादी नेता राजनारायण के द्वारा उनके संसदीय चुनाव को चुनौती देनेवाली चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते हुए श्रीमती गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करने और लोकसभा की उनकी सदस्यता रद्द करने के साथ ही उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था.
इंदिरा गांधी की अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन जज वी आर कृष्णा अय्यर ने 24 जून को इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले पर स्थगनादेश जारी करते हुए यह व्यवस्था भी दी थी कि इस मामले में आखिरी और पूर्ण फैसला आने तक श्रीमती गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती हैं. वह संसद की कार्यवाहियों में भाग भी ले सकती हैं, लेकिन सदन में किसी मुद्दे पर वोट नहीं कर सकतीं.
दूसरी तरफ, श्रीमती गांधी पर अंदर और बाहर से भी पद त्याग के लिए दबाव बनने लगा था. उनके पद त्याग नहीं करने की स्थिति में अगले दिन 25 जून को जयप्रकाश नारायण एवं सम्पूर्ण विपक्ष ने दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक लाख से अधिक लोगों की रैली-सभा कर देशवासियों से अनिश्चितकालीन देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था. यहां तक कि सेना और पुलिस से भी सरकार के गलत आदेशों को नहीं मानने का आह्वान किया गया था. इसी मैदान में जेपी ने राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर कविता की पंक्ति- ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है,’ का उद्घोष किया था. जेपी ने अपने भाषण में कहा था, ‘‘मेरे मित्र बता रहे हैं कि मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है क्योंकि हमने सेना और पुलिस को सरकार के गलत आदेश नहीं मानने का आह्वान किया है. मुझे इसका डर नहीं है और मैं आज रामलीला मैदान की इस ऐतिहासिक रैली में भी अपने उस आह्वान को दोहराता हूं ताकि कुछ दूर, संसद में बैठे लोग भी सुन लें. मैं सभी पुलिस कर्मियों और जवानों का आह्वान करता हूं कि इस सरकार के आदेश नहीं मानें क्योंकि इस सरकार ने शासन करने की अपनी वैधता खो दी है.’’ जेपी को वहीं से गिरफ्तार कर लिया गया. कांग्रेस के अंदर भी चंद्रशेखर, रामधन, मोहन धारिया और कृष्णकांत जैसे युवा तुर्कों के इंदिरा विरोधी स्वर तेज होने लगे थे. लेकिन बाहर और अंदर से भी बढ़ रहे राजनीतिक विरोध और दबाव से निबटने के नाम पर श्रीमती गांधी ने पद त्याग करने के लोकतांत्रिक रास्ते को चुनने के बजाय अपने छोटे बेटे संजय गांधी, कानून और न्याय मंत्री हरिराम गोखले और वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे जैसे कुछ खासुलखास सलाहकारों से मंत्रणा के बाद आंतरिक उपद्रव’ की आशंका के मद्देनजर संविधान की धारा 352 का इस्तेमाल करते हुए आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से देश में ‘आंतरिक आपातकाल’ लागू करने का फरमान जारी करवा दिया था. देशवासियों को अगली सुबह आकाशवाणी पर श्रीमती गांधी ने राष्ट्र के नाम जारी अपने संदेश में कहा, ‘‘भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे घबराने अथवा आतंकित होने की जरूरत नहीं है.’’
उन्होंने आपातकाल को जायज ठहराने के इरादे से विपक्ष पर साजिश कर उन्हें सत्ता से हटाने और देश में आंतरिक उपद्रव की स्थिति पैदा करने का आरोप लगाया और कहा कि सेना और पुलिस को भी विद्रोह के लिए उकसाया जा रहा था. उन्होंने कहा, ‘‘जबसे मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी राजनीतिक साजिश रची जा रही थी.’’

आपातकाल और उससे पहले 25 जून की शाम को रामलीला मैदान में हुई विपक्ष की रैली की खबर देश में न पहुंचे इसलिए, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई. रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बनाते रहे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था. पूरे देश को राजनीतिक विरोधियों के लिए जेलखाना बनाने की तैयारियां परवान चढ़ने लगीं.
27 जून को प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई थी. इसके विरोध में 28 जून को इंडियन एक्सप्रेस, स्टेट्समैन और नई दुनिया जैसे कई अखबारों ने सम्पादकीय की जगह को खाली यानी ‘ब्लैंक’ छोड़ दिया था. बाद में सरकार ने ब्लैंक स्पेस पर भी पाबंदी लगा दी थी. सबसे दिलचस्प तरीका टाइम्स ऑफ इंडिया ने निकाला था. 28 जून को क्लासिफाइड विज्ञापन वाले स्टाइल में स्मृति शेष वाले पन्ने पर उसने जो छापा वह सिर्फ आपातकाल का विरोध नहीं बल्कि विरोध का एक आइडिया भी था. देखें क्या विज्ञापन छपा था.- “O’ Cracy, D.E.M., beloved husband of T. Ruth, loving father of L.I. Bertie, brother of Faith, Hope and Justicia, expired on June 26.
लेकिन आगे चलकर हमारा मीडिया प्रतिरोध या कहें कि सांकेतिक विरोध को भी जारी नहीं रख सका. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के शब्दों में कहें तो ‘‘झुकने को कहा गया था लेकिन हमारा मीडिया आपातकाल में रेंगने लगा था.’’ सच तो यह है कि आपातकाल में मीडिया ही नहीं न्यायपालिका भी डर गई थी.
दरअसल, आपातकाल में सबसे भयानक था संविधान के अनुच्छेद 21, 22 को खत्म कर देना. इससे लोगों की नागरिक आजादी खत्म कर दी गई थी. किसी को भी कभी भी हिरासत में लिया जा सकता था. इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आपातकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को रद्द करने के सरकार के अधिकार को जायज ठहराते हुए नागरिकों के जीने के अधिकार भी छीन लिए जाने की ताईद की थी. बहरहाल, आपातकाल लागू होने के बाद मोरार जी देसाई, चंद्रशेखर, अशोक मेहता, मधु लिमये, राजनारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित तत्कालीन विपक्ष के तमाम बड़े-छोटे नेता-कार्यकर्ता आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) और भारत रक्षा कानून (डी आई आर) के तहत गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिए गए थे. आरएसएस, जमकयते इस्लामी, आनंद मार्ग एवं कुछ अन्य संगठनों पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया था. इन संगठनों से जुड़े लोगों के साथ ही राजनीतिक विरोधियों को भी उनके घरों, ठिकानों से उठाकर जेलों में डाला जाने लगा. उन्हें प्रताड़ित किया गया. कइयों की तो जान भी चली गई जबकि जार्ज फर्नांडिस और कर्पूरी ठाकुर जैसे कुछ बड़े नेता भूमिगत भी हो गए. बाद में उन्हें भी ‘बड़ौदा डायनामाईट कांड’ के मुख्य अभियुक्त के रूप में गिरफ्तार कर लिया गया. जनसंघ के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी भी भूमिगत हो गए थे.
इंदिरा गांधी के आपातकाल लागू करने के इस अलोकतांत्रिक फैसले और अपनी गिरफ्तारी पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इतना भर कहा था, ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि.’ लेकिन इंदिरा गांधी ने इसका सबक तब तक नहीं लिया जब तक, मार्च 1977 के आमचुनाव में उन्हें और उनकी पार्टी को भारी और अपमानजनक पराजय का सामना नहीं करना पड़ा. वह स्वयं रायबरेली में राजनारायण और उनके चहेते बेटे संजय गांधी अमेठी से अपेक्षाकृत अनजान रवींद्र प्रताप सिंह से चुनाव हार गए.
दरअसल, आपातकाल एक खास तरह की राजनीतिक संस्कृति और प्रवृत्ति का परिचायक था, जिसे लागू तो इंदिरा गांधी ने किया था लेकिन बाद के दिनों-वर्षों में और आज भी वह एकाधिकारवादी प्रवृत्ति कमोबेस सभी राजनीतिक दलों और नेताओं में देखने को मिलती रही है. भाजपा के वरिष्ठ और बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी ने हमारी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में ही इन प्रवृत्तियों के मौजूद रहने और आपातकाल के भविष्य में भी लागू किये जाने की आशंकाएं बरकार रहने का संकेत देकर इस धारणा को और प्रामाणिकता प्रदान की थी. आज तीन साल बाद स्थितियां ठीक उसी दिशा में जाते हुए दिख रही हैं. देश आज अंध राष्ट्रवाद और धार्मिक कट्टरपंथ पर आधारित ‘माब लिंचिंग’ के सहारे एक अराजक माहौल और अघोषित आपातकाल या कहें कि ‘आफतकाल’ की ओर ही बढ़ रहा है. सत्ता पोषित और समर्थित भीड़ यह तय करने में जुट गई है कि हमें क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या बोलना है, क्या देखना और पसंद करना है, किससे प्रेम और विवाह करना है, कैसे जीना है. कहीं भी उत्तेजित और उन्मादी भीड़ सरे राह और रेल गाड़ियों में भी किसी की पिटाई कर उसकी जान ले सकती है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ी साफ दिख रही है. प्रेस और मीडिया पर भी सरकारी विज्ञापनों, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसी सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल कर असहमति के स्वरों को दबाने के रूप में एक अलग तरह की ‘अघोषित सेंसरशिप’ के संकेत साफ दिख रहे हैं. मणिपुर के एक 39 वर्षीय पत्रकार किशोर चंद्र वांगखेम को पिछले साल 27 नवंबर को इसलिए हिरासत में लिया गया क्योंकि उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कठपुतली करार दिया था. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के विरुद्ध अभद्र ट्वीट के आरोप में दिल्ली के पत्रकार प्रशांत कनौजिया को इसी जून महीने के दूसरे सप्ताह में रात के अंधेरे में उत्तर प्रदेश पुलिस के सादावेशधारी जवान बिना किसी वारंट के उनके घर से ‘गिरफ्तार’ कर ले गए. सप्ताह भर पहले आदित्यनाथ जी और आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत के बारे में सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम एकाउंट) पर आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए ब्रिटेन में रहनेवाली पंजाबी सिंगर, रैपर हार्ड कौर (तरन कौर ढिल्लन) के विरुद्ध वाराणसी में आइपीसी की धारा 124ए (देशद्रोह), 153 (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 500 (मानहानि) और 505 (भड़काने की कोशिश) और आईटी ऐक्ट की धारा 66 के तहत मुकदमा कायम किया गया. सोशल मीडिया पर इसतरह की टिप्पणियों के लिए देश द्रोह का मुकदमा कोई नई बात नहीं है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कई एक बार कहा है कि ऐसा करना इस कानून का दुरुपयोग है. इसके बावजूद इस तरह के उदाहरण आए दिन देखने को मिलते रहते हैं.

आपातकाल के विरुदध हमारा संघर्ष
44 साल पहले, आपातकाल के शिकार या कहें उसका सामना करनेवालों में हम भी थे. तब हम पत्रकार नहीं बल्कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध ईविंग क्रिश्चियन कालेज के छात्र थे और समाजवादी युवजन सभा के बैनर तले समाजवादी आंदोलन और उस बहाने जेपी आंदोलन में भी सक्रिय थे. आपातकाल की घोषणा के बाद हम मऊ जनपद (उस समय के आजमगढ़) में स्थित अपने गांव कठघराशंकर-मधुबन चले गए थे. जुलाई के पहले सप्ताह में, संभवतः पांच जुलाई को सादी वर्दी में आई पुलिस और खुफिया विभाग के अधिकारी ने मधुबन बाजार में रास्ता चलते रोका, नाम पता पूछा. हमने चकमा देने की कोशिश की लेकिन वह हमें पहिचान गए और हमारी गिरफ्तारी हो गई. हमारे पास से समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडिस के ‘प्रतिपक्ष साप्ताहिक’ के ताजा अंक की कुछ प्रतियां ‘बरामद’ हुईं. हमारे ऊपर पुलिस का इलजाम था कि हम प्रतिबंधित ‘प्रतिपक्ष’ बेच रहे थे, आपातकाल के विरुद्ध नारे लगा रहे थे और मधुबन थाने के बगल में स्थित यूनियन बैंक में डकैती की योजना बना रहे थे. पुलिस के आरोपों की मानें तो यह सारे काम हम एक साथ कर रहे थे. दुर्गंधभरी हवालात में रात गुजारने के बाद अगले दिन डी आई आर (भारत रक्षा कानून) और 120 बी के तहत निरुद्ध कर हम आजमगढ़ जनपद कारागार के सिपुर्द कर दिए गए. उसी दिन मंत्री जी के नाम से मशहूर समाजवादी नेता रामअधीन सिंह को भी मधुबन से ही तथा रामबदन यादव और इंद्रमणि मौर्य बगल के सिपाह इब्राहिमाबाद से गिरफ्तार कर लिए गये थे.
आजमगढ़ का जेल जीवन
सवा महीने बाद 15 अगस्त 1975 को पिता जी, समाजवादी नेता, स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी विष्णुदेव भी अपने तकरीबन तीन दर्जन समर्थकों के साथ मधुबन के शहीद मेले में आपातकाल के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन करते हुए गिरफ्तार होकर आजमगढ़ जेल में आ गए. हम पिता-पुत्र आजमगढ़ जेल की एक ही बैरक में महीनों आमने-सामने सीमेंट के स्लीपर्स (बिस्तर) पर सोते थे. जेल में हमारे साथ उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व राज्यपाल स्व. रामनरेश यादव, पूर्व सांसद, ईशदत्त यादव, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पूर्व सांसद बाबू शिवराम राय, सर्वोदयी मेवालाल गोस्वामी सहित सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय लोकदल, जनसंघ, संगठन कांग्रेस, माकपा, आरएसएस, जमायते इस्लामी, आनंद मार्ग जैसे संगठनों के तमाम नेता-कार्यकर्ता भी थे. रणजीत सिंह, जगन्नाथ सिंह, प्रभुनाथ सिंह, राजेंद्र सिंह, मिथिलेश और सुभाष राय जैसे कई छात्रनेता और संघ से जुड़े शिक्षक डा. कन्हैया सिंह भी थे. मिथिलेश और सुभाष राय इस समय प्रखर पत्रकार-संपादक की भूमिका में हैं. जेल में रहते ही उनका संघ और विद्यार्थी परिषद की राजनीति से मोहभंग शुरु हो गया था. उत्तर प्रदेश में विद्यार्थी परिषद के उस समय के बड़े नेता अशोक कुमार राय भी जेल में आ गए थे. बाद के वर्षों में वह अपना नाम, जाति, वस्त्र, पहिचान सब कुछ त्याग कर दक्षिण बिहार, अभी झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर इलाके में विकास भारती के जरिए आदिवासियों की सेवा और उनके विकास में जुट गए. उनके साथ कपड़े के नाम पर अब भी एक ही धोती होती है जिसे वह तन पर लपेटे रहते हैं. अब वह अशोक भगत के नाम से जाने जाते हैं.
आजमगढ़ जेल में तमाम तरह के लोगों और विरोधाभासी विचारधाराओं के साथ जीना, पठन-पाठन और संगोष्ठी के साथ ही कुछ खेल-कूद, जैसी गतिविधियों में समय अच्छे से गुजर जा रहा था. हालांकि उस समय भी बहुत सारे लोग जेल से बाहर निकलने के अवसर और घड़ियां गिनते रहते थे. उनकी उम्मीदें 15 अगस्त, दो अक्टूबर, 14 नवंबर, 26 जनवरी जैसी तिथियों पर टिकी रहतीं. बाद में माफीनामे पर हस्ताक्षर के लिए भी काफी लोग व्यग्र नजर आने लगे थे. हमारे साथ आनंद मार्ग के राजेशानंद अवधूत भी थे जो हमेशा किसी अदृश्य ताकत से डरे से रहते थे और अपने अतीत, गांव, माता-पिता, भाई-बहन आदि की चर्चा करने पर बिदक और कभी कभी तो बिगड़ भी जाते थे. लेकिन गजब के योगी थे. उनकी यौगिक क्रियाओं के आगे रामदेव जैसे लोग कहीं नहीं ठहरते. जमायते इस्लामी के डा. अयूब भी थे जो हमें बेटे की तरह मानते थे. हम उनसे उर्दू सीखने लगे थे. कुछ दिन और जेल में रह जाते तो उनसे पूरी उर्दू सीख जाते. लेकिन ऐसा नहीं हो सका, इसका मलाल अब भी है.
आजमगढ़ के जेल जीवन के दौरान कई तरह के अनुभव मिले. जेल में हमें चूंकि बी क्लास की सुविधा मिली हुई थी, लिहाजा दूध, दही, अंडे और अच्छा शाकाहारी और मांसाहारी भोजन भी निर्धारित मगर पर्याप्त मात्रा में मिलता था. खेलने के लिए बैडमिंटन, कैरम बोर्ड और शतरंज आदि इनडोर गेम्स की भी व्यवस्था हो जाती थी. पढ़ने के लिए उपलब्ध अखबार और पत्र-पत्रिकाएं मिल जाती थीं. हम लोग मुख्य रूप से दिनमान पढ़ते थे. रेडिओ का इंतजाम भी हो गया था जिस पर हम लोग अक्सर बीबीसी लंदन पर समाचार सुनते थे. उन दिनों बीबीसी पर रत्नाकर भारती का ‘आजकल’ बड़ा ही लोकप्रिय और हम लोगों का पसंदीदा कार्यक्रम होता था. जेल में हम सिर्फ पढ़ते ही नहीं थे, मौके बे मौके दिनमान में पत्र भी लिखा करते थे. एक बार तो गजब इत्तिफाक हुआ. सभवतः सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फारखान को पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था. हमने उनकी गिरफ्तारी का विरोध करते हुए दिनमान में पत्र भेजा था. यह महज संयोग की बात ही थी कि उसी विषय पर वाराणसी के केंद्रीय कारागार में बंद समाजवादी युवजन सभा के नेता चंचल कुमार ने भी एक पत्र दिनमान में भेजा था. उस समय मोबाइल और इंटरनेट का जमाना नहीं था. लेकिन यह समाजवादी युवजनों की आपसी समझदारी ही थी कि दो अलग-अलग जेलों से एक ही बात प्रकाशन के लिए दिनमान के कार्यालय पहुंची थी. दिनमान के तत्कालीन संपादक रघुवीर सहाय ने दोनों पत्रों को दोनों जेलों के पते के साथ ‘मत सम्मत’ स्तंभ में प्रकाशित किया था.
जेल में डिस्पेंसरी भी थी जिसमें इलाज के नाम पर हममें से से कुछ लोग वहां आराम करने चले जाते थे. कुछ ज्यादा रसूखदार लोग इलाज के नाम पर जिला अस्पताल की सैर भी कर आते थे. जेल में कुछ कच्चे यानी विचाराधीन बंदी हमारी सेवा में लगाए गए थे. खाना पकाने से लेकर, कपड़े धोने और बदन की मालिश जैसी सेवाएं देते थे. उन्हीं में हमारे गांव के पास का ही एक छुटभैया झिल्ली भी था. उसके आग्रह पर पिता जी ने उसे हमारी बैरक में सेवा के लिए रख लिया था. बाद में वह उनका विश्वस्त कार्यकर्ता भी बन गया था. एक दिन अचानक झिल्ली ने हमसे कुछ पैसे मांगे. बीड़ी सिगरेट की मांग तो आम रहती थी, जो हमारे मुलाकातियों के जरिए पूरी हो जाती थी. लेकिन जब झिल्ली ने पैसे मांगे तो हमारा माथा ठनका. हमने कारण पूछा तो वह इधर उधर की बातें करने लगा. बाद में बहुत भरोसे में लेने पर उसने बताया कि कुछ बड़े डाकू-अपराधी जेल से भागने की जुगत में हैं. वे लोग उसे भी बाहर निकाल देंगे लेकिन इसके लिए कुछ पैसों का जुगाड़ करना पड़ेगा. हमने उसे डांटा और कहा कि यह असंभव है और उसे इस सबके फेर में नहीं पड़ना चाहिए. लेकिन वह भला कहां माननेवाला था. एक रात को वह भागा भागा हमारे पास आया. हमने उसे डांटते हुए पूछा, इतनी रात गए यहां कहां? कायदे से शाम ढलते ही पक्के-कच्चे कैदियों को अपनी अपनी बैरकों में चले जाना होता था. झिल्ली के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. हांफते हुए उसने बताया कि विजया समेत कई डकैत जेल की दीवार फांदकर भाग गए. उसकी बारी आई तो चादर छूट गई और वह नीचे आ गिरा. मुझे तो जैसे काटो खून ही नहीं. मैं सन्न रह गया. फिर पता चला कि एक योजना के तहत अपराधियों ने राजनीतिक बंदियों की बैरकों से एक एक कर कई चादरें चुराईं. फिर शौचालय के पास से कुछ ईंटें निकाल कर एक चादर में गट्ठर बनाया और कई चादरों को एक साथ जोड़कर जेल की बाहरी दीवार जो हमारी बैरक से लगती थी, से बाहर की तरफ फेंक दिया. गट्ठरवाला हिस्सा दीवार के उस पास जाकर काफी वजनी हो गया. उसके बाद एक के ऊपर एक चढ़कर अपराधी दीवार फांदते और नौ दो ग्यारह होते गए. तकरीबन चार पांच बंदी भागने में कामयाब हो गए लेकिन जब झिल्ली का नंबर आया तो गट्ठर दीवार के उस पार गिर गया और झिल्ली इस पार रह गया. हमने किसी तरह से उसे उसकी बैरक में भेजकर सुला दिया और बैरक दर बैरक ताला, जंगला, बंदी और लालटेन की गिनती और सलामती की जांच करते आवाज लगाते आ रहे जेल के वार्डेन यानी चौकीदार को बताया कि शौचालय के पास कुछ हलचल सी लग रही थी. कुछ गड़बड़ तो नहीं! सहसा तो उसे यकीन ही नही नहीं हुआ, बाद में मौका और वहां मिली चादरों, शौचालय से निकली ईंटों को देखने पर उसे भी लगा कि कुछ गड़बड़ हुई है. उसने पगली घंटी (अलार्म) बजाया और थोड़ी ही देर में जेल का पूरा अमला, सुरक्षा गार्ड वहां आ धमके. पता चला कि कुछ दुर्दांत अपराधी निकल भागने में कामयाब हो गए थे. अब इसे लीपने- पोतने की जो ‘मशक्कत’ शुरू हुई वह न सिर्फ हास्यास्पद थी बल्कि हमारी जेलों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी थी. भाग चुके अपराधियों की खोज शौचालय से लेकर कुंए और पेड़ों पर टार्च की रोशनी फेंक कर की जाने लगी. बीच बीच में विजया तथा एक दो अन्य अपराधियों के नाम लेकर उनसे बाहर निकल आने की अपीलनुमा चेतावनी भी दी गई. उन दिशाओं में फायरिंग भी की गई जिधर से उनके भागने की आशंका थी. इस सबके बारे में पूछने पर बताया गया कि कागज का पेट भरने के लिए यह कार्यवाही भी जरूरी थी ताकि लगे कि जब कैदी भाग रहे थे तो जेल के सुरक्षा कर्मियों ने उनका पीछा किया और गोलियां चला कर उन्हें रोकने की कोशिश की.

जयशंकर गुप्त (WRITER)

नोट: अगली कड़ी में जमानत पर रिहाई और भूमिगत संघर्ष

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