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मेरी पहचान……

ByArvind Singh

Oct 1, 2019

(1)
प्रबल शौर्य
दर्द…तनहाई….अंधेरों का एक अनजाना सा खौफ,
जिन्दगी अपना सबक रोज याद दिलाती है….!
कुछ तो मौसम का भी तकाजा है अभी…..
कुछ अपनी तबीयत भी बिगड़ती जाती है…..!
यूं तो चीखते रहते हैं हर पल मेरे सन्नाटे मुझ पर,
मगर शाम होते हीं कहीं मुझमें सिमट जाते हैं…..!
सोचती हूँ कि किस तरह कायम रखूँ अपना वजूद,
जिंदगी हर रोज कई टुकडों में बंटती जाती है…..!
कौन है जो अब मुझे मेरी पहचान बतायेगा रश्मि
रास्ते के गर्द से अब ये शक्ल कहाँ नजर आती है….!
(2)
एक अजीब सी बेचैनी थी …यह रह कर एक ही खयाल था…कहीं तो कुछ गलत है वरना तुम इतने खामोश नहीं होते…..तुम्हें पता है ना कि तुम्हारी खामोशी मुझे अंदर तक तोड़ जाती है……
उस दिन भी यही हुआ था……रात के खाने के वक्त तुम बीच में से ही खाना छोडकर उठ गये थे…..इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाऊँ तुम तेजी से बाहर निकाल गये।
पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ……फिर अचानक आज… क्यूँ…..?
ना जाने कितने सवाल मेरे अंदर कौंध गँये….एक-एक पल व्यतीत करना कितना मुश्किल हो रहा था।
बहुत देर तक मैं तुम्हारा इंतजार करती रही….देर रात लौटे थे तुम……
मैंने कोई सवाल नहीं पूछा और ना ही तुमने बताना जरूरी समझा। हाँ तुम्हारे जूते में लगी गीली रेत से ये तो पता चल गया था कि तुम समुद्र के किनारे से लौटे हो…..शायद जो तूफान समुद्र के किनारो पर था वहीं तुम्हारे दिल में भी था।
जो भी हो…..मुझे इंतजार है तुम्हारी खामोशी के टूटने का…तुम्हें तो पता है कि मैंने कभी तुमसे कोई सवाल नहीं किया…आज भी नहीं करूंगी…कोई सवाल नहीं..
दिन गुज़र गये…कैसे गुजरे ये सिर्फ मैं हीं नहीं बल्कि तुम भी जानते हो।गुजरते वक्त के साथ तुम्हारी चुप्पी भी गहरी होती जा रही है। इसके पहले जब भी तुम परेशान रहे मैंने तुम्हारी आँखों से तुम्हारे दिल का हाल समझ लिया…मगर इस बार…काश एक बार मेरी तरफ नजर उठा कर देखते तो सही…मगर शायद तुम कुछ भी बांटना नहीं चाहते।तभी तो हर बार नज़रें चुरा कर मेरे बगल से गुजर जाते हो।
कितना टूट रही हूँ मैं शायद तुम नहीं समझ सकेंगे…या समझ कर भी समझना नहीं चाहते।एक छत के नीचे हमदोनों अजनबी हो गये हैं।आज तक तो हमदोनों अपने ‘स्व’ को बांटते हीं आ, है…..फिर आज ‘हम’ ‘मैं’ और ‘तुम’ कैसे हो गये….?
शाम ढल चुकी है…बाहर बरामदे में कुर्सी डालकर मैं तुम्हारा इंतजार कर रही है….इंतजार कर रही हूँ कि शायद आज तुम्हारा मौन टूटे। हाँ एक लंबे समय के बाद आज ऑफिस जाते वक्त तुम कह गये कि शाम को तैयार रहना…बाहर चलेगे। मगर आज मैं कहीं नहीं जाना चाहती,ये सारा वक्त अकेले तुम्हारे साथ गुजारना चाहती हूँ। सुबह तुम्हारे एक छोटे से वाक्य ने मेरे अंदर उम्मीद की एक रौशनी भर दी है।
शायद आज तुम कह दो वो सबकुछ जिसके कारण तुम पिछले कई दिनों से व्यथित हो।
तुम्हारे इंतजार में मैं ना जाने कितनी बार ? घडी देख चुकी हूँ…ऐसे में बैठे बैठे बरामदे में हीं कैसे आँख लग गई कुछ पता हीं नहीं चला। अचानक अपने कंधे पर तुम्हारा स्पर्श महसूस हुआ…कैसे भूल सकती हूँ तुम्हारे स्पर्श को…उफ्फ कितना ठंडा है तुम्हारा हाथ–…? तोडी देखती हूँ,रात के एक रहे हैं। तुम जानते हो मेरी आँखें क्या सवाल करेगी तुमसे…क्यूंकि जुबान से तो मैंने तुमसे कभी कुछ कहा हीं नहीं। तुमने अपनी आँखें बंद कर ली और वहीं कुर्सी पर निढाल से पड गयी। जैसे ना जाने कितने युगों से थके हो।ऐसे में मैं तुमसे क्या पूछूं—?
बस धीरे से तुम्हारे जूते निकाला और एक चादर लाकर तुम्हारे ऊपर डाल दिया। अब सिवा इंतजार के मेरे पास और कुछ नहीं है….क्या करूँ जब समझ में नहीं आया तो मैं भी वहीं तुम्हारे पैरों पर सर रख कर सो गई….इस उम्मीद में कि शायद कल का सूरज कोई नया संदेशा लेकर आए…!
अजीब सी हलचल है…सुबह जब तुम ऑफिस जा रहे थे तो बहुत उदास थे।मैं नहीं जानती तुम्हारी उदासी का कारण मगर तुम्हारा कुम्हलाया चेहरा मुझे अंदर तक झंझोर गया।चार दिनों में हीं कितने मलिन हो गया हो तुम,जैसे लंबे समय से बीमार हो।
तुम्हारे साथ जिंदगी के जितने सपने बुने थे उनमें ऐसा कोई पल तो शामिल हीं नहीं था। बस…अब मैं तुम्हें और ऐसी अवस्था में नहीं रहने दे सकती—आखिर मैं तुम्हारी अर्द्धांगनी हूँ। आज जब तुम ?घर आओगे मैं पूछ हीं लूंगी तुमसे तुम्हारी खामोशी और व्यक्ता की वजह।शाम के पाँच बज रहे हैं…अब तुम आते हीं होगे…..मैं थोडा फ्रेश हो लेती हूँ…फिर तुम्हारी पसंद के गरमा गरम पकौडे और कॉफी बनाऊँगी। याद है तुम्हें पिछली बार चेन्नई से तुम मेरे लिए गुलाबी रंग की साडी लाये थे…हाँ एक ही तरह के दो साडियाँ लाये थे तुम….वही पहन लेती हूँ। लेकिन आज इतने दिनों बाद जहन में एक सवाल उठा है…वो दूसरी साडी किसके लिए थी…ना मैंने पूछा था और ना हीं तुमने बताया शायद मुझे…. पूछना चाहिए था। मगर तुम्हारे ऊपर मेरा जो विश्वास है उसने मुझे रोक दिया।आज पूछूँगी तुमसे…वो सब कुछ जो तुम्हारे दिल में है…जो भी सच्चाई है बता देना…सह लूँगी,क्यूंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ।
बहुत बार सोचा कि तुम्हारी बेचैनी की वजह पूछूं…मगर ना जाने क्यूँ हर बार तुम्हारा भवविहीन चेहरा देख कुछ हिम्मत हीं नहीं होता।अचानक मेरे तुम्हारे बीच आई ये दूरी अब बुरी तरह से मुझे तोडने लगी है।तुम्हीं सोचो ना गर एक हरा भरा वृक्ष ही गर सूखने लगे तो उससे लिपटी हुई लता कैसे अपना वजूद कायम रख पाएगी?
काश खामोशी की कोई पोटली होती तो उसे उठा कर कहीं दूर रख आती ताकि तुम मुखर हो सको…मगर नहीं…कमबख्त ये चुप्पी अब हमारी बीच एक मजबूत दीवार बनने लगी है।मात्र दो दिन बाद होली है मगर दिल में कोई उमंग नहीं…क्या हो गया है इन दिनों ना जाने जिंदगी किस मोड पर आ गई है?याद है तुम्हें एक बार माँ ने कहा था कि कुछ ठीक नहीं चल रहा शायद किसी की नजर लग गई है…उफ्फ कितनी हंसी थी मैं उस बात पर मगर आज वास्तव में ऐसा लगता है कि किसी की नजर लग गई है।

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