आपातकाल: संघर्ष और सबक दूसरी किश्त

जमानत पर रिहाई-

आजमगढ़ के जेल जीवन में मजा आने लगा था लेकिन जेल से बाहर निकलकर आपातकाल के विरुद्ध कुछ करने की हूक भी उठती रहती थी. कई महीने जेल में बिताने के बाद परीक्षा देने के नाम पर हमें पेरोल मिल गया और फिर पेरोल से लौटने के बाद जेल में हुई एक घटना ने हमारी जमानत करवा दी. उस समय जेल सुपरिंटेंडेंट थे बी डी तिवारी जो जिला मुख्य चिकित्साधिकारी भी होते थे. एक दिन अदालत में पेशी के बाद लौटते समय जेल के एक दिहाड़ी वार्डर रामफेर को हमने जेल का सामान बाहर ले जाते समय रंगे हाथ पकड़ लिया. पूछने पर पता चला कि वह सारा सामान तिवारी जी के घर जा रहा था. संयोगवश उस दिन जेल में एक सिटी मजिस्ट्रेट, संभवतः अंसारी, किसी मामले में अपराधियों की शिनाख्त कार्यवाही में लगे थे. हमने रामफेर को उनके सामने पेश कर उसका बयान करवा दिया. मजिस्ट्रेट अंसारी ने तिवारी जी को बुलवाकर उनसे पूछताछ की. उन्होंने गोल मटोल जवाब में मान लिया कि सामान उनके घर ही जा रहा था और ऐसा वह साधिकार अक्सर करवाते थे. मामला दर्ज हुआ और यह शायद आपातकाल का ही प्रताप था कि शाम को ही उनके निलंबन का समाचार भी आ गया. लेकिन इसका खामियाजा जेल में हमें भुगतने के संकेत मिलने लगे. जेल में बंद दुर्दांत डकैतों से पिटवाने, किसी और जेल में स्थानांतरित करवाने, बी क्लास की सुविधा छीन लेने जैसी धमकियां मिलने लगीं. हमारे पिताजी ने भी कुछ डराया और कहा कि जिस तरह से नदी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं रख सकते उसी तरह से जेल में रहते जेल अधिकारियों से बैर मोल नहीं ले सकते. उन्होंने बताया कि किस तरह अंग्रेजी राज में उनसे इसी जेल में चक्की पिसवाई गई थी, कोड़े अलग से लगते थे. लेकिन हम पर जवानी का जोश और व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश भी शायद कुछ ज्यादा ही था. उस समय आजमगढ़ में जेलर कोई श्रीवास्तव जी थे, उप जेलर यादव जी अैर सहायक जेलर मिश्रा जी थे. यादव जी कुछ-कुछ हम लोगों के मन-मिजाज के लगते थे. मिश्रा जी मीसा बाबू के नाम से ज्यादा चर्चित थे. दरअसल, किसी राजनीतिक बंदी की जमानत मंजूर होती थी तो जानबूझकर रिहाई का परवाना शाम को देर से आता था. मतलब कि रिहाई अब अगले दिन ही संभव होगी. शाम से पहले परवाना आ जाने पर रिहाई उसी दिन हो जाती थी. रात में मिश्रा जी के हम लोगों की बैरकों की तरफ आने का मतलब साफ होता था कि किसी की जमानत मंजूर हुई है और सरकार ने उस पर मीसा यानी आंसुका (आंतरिक सुरक्षा कानून) लगा दिया है. इसलिए उनका नाम ही मीसा बाबू पड़ गया था. इस बीच जेल में प्रताड़ना के क्रम में मेरा बी क्लास छिन गया. मैंने एक आवेदन अदालत में दिया और कहा कि चूंकि हमने जिला जेल अधीक्षक को चोरी के मामले में पकड़वाया है, इसलिए मुझे प्रताड़ित किया जा रहा है. मजिस्ट्रेट कुछ सुलझे हुए थे. सुनवाई के दौरान उन्होंने सरकारी वकील के जरिए सरकार पर भी हल्का सा कटाक्ष किया और लगे हाथ हमारी जमानत मंजूर कर दी. पिताजी के करीबी वकील कृपानरायन राय ने जमानतदार की व्यवस्था भी करवा दी लेकिन परवाना जानबूझकर देरी से भेजा गया. हमारी खुशकिस्मती थी कि जिलाधिकारी शहर में नहीं थे और मीसा के वारंट पर उनका ही दस्तखत होता था. हमारी बेचैनी बढ़ रही थी लेकिन डिप्टी जेलर यादव के सहयोग और कुछ हम लोगों के दबाव से सुबह होते ही हमें रिहा कर दिया गया.

भूमिगत जीवन
जेल से बचते-बचाते जो बाहर निकले तो दोबारा वापस नहीं लौटे. भूमिगत आंदोलन में सक्रिय हो गए. आजमगढ़, इलाहाबाद, वाराणसी, कानपुर, पटना और दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में आना-जाना, संघर्ष के साथियों (जेल में और जेल के बाहर भी) से समन्वय और सहयोग के साथ ही आपातकाल के विरोध में जगह-जगह से निकलनेवाले समाचार बुलेटिनों के प्रकाशन और वितरण में सहयोग मुख्य काम बन गया था. आजमगढ़ में हमारा ठिकाना समाजवादी नेता और जिले के वड़े वकील रामप्यारे उपाध्याय का निवास होता. हमारी एक दो रिश्तेदारियां भी वहां थीं. पुलिस और खूफिया विभाग को चकमा देने के लिए हम उनके यहां भी गाहे बगाहे डेरा डाल लेते. एक बार बड़ा गजब का वाकया हुआ. आजमगढ़ से निकलते समय हमारी जेब खाली हो गई या हमारे ही किसी अभिन्न ने खाली कर दी थी. हम सिधारी पर अपने बचपन के पारिवारिक मित्र सुभाष गुप्ता की दुकान पर गए मदद लेने लेकिन हम कुछ कह पाते तब तक बिजली चली गई और हम लौट आए. दुर्योग से हमारे वहां से लौटते ही सुभाष की दुकान पर लूट हो गई. हम सोचते रह गए कि कुछ देर और वहां रुक गए होते तो मदद भी मिल जाती और यह हादसा भी नहीं होता. बाद में मेवा राम जी के सहयोग से हमारी यात्रा आगे बढ़ी.
वाराणसी में हम जेल में निरुद्ध साथी, समाजवादी युवजन सभा के अपने नेता, काशी विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष (अभी कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव) मोहन प्रकाश से कबीरचौरा अस्पताल में मिले. उनसे कुछ पते लेकर वाराणसी में ही समाजवादी युवजन सभा, लोहिया विचार मंच और छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के साथियों अशोक मिश्र, योगेंद्र नारायण, कुंवर सुरेश सिंह, नचिकेता, देवाशीष भट्टाचार्य, चंचल मुखर्जी, मदनलाल श्रीवास्तव आदि से लगातार संपर्क में रहे. वाराणसी प्रवास के दौरान चेतगंज के पास हबीबपुरा स्थित अशोक मिश्र जी का निवास हमारा ठिकाना होता जहां हम रात बिरात कभी भी पहुंच जाते. उनके पिता जी आरएसएस से जुड़े अधिवक्ता थे. समाजवादी पुत्र और संघी पिता के बीच का यदाकदा होनेवाला संवाद बहुत रोचक होता था.
वाराणसी में एक बार हम धरे जाने से बचे. हम अपने एक मित्र के साथ राजघाट से रिक्शा पर कहीं जा रहे थे. तभी एक सायकिल सवार ने हमारा नाम लेकर आवाज देनी शुरू की. उन्हें न हम पहिचान रहे थे और ना ही हमारे मित्र. हम समझ गए कि वह जरूर इंटेलिजेंसवाले हैं. एक बार तो खयाल आया कि उनसे निपटकर फूट लिया जाए. लेकिन बाद में न जाने क्या विचार आया कि हमने रिक्शा रुकवा लिया. वह सज्जन पास आए और खुद ही अपनी पहिचान बताते हुए बोले कि हम लोगों को आपके यहां होने की खबर है लेकिन हमारे यहां सभी लोग एक ही तरह के नहीं हैं इसलिए वाराणसी में ज्यादा रुकना आपके लिए खतरनाक हो सकता है और हां अपने कुछ करीबी लोगों से भी सावधान रहें. उनमें से किसी ने आपके यहां होने और राजघाट से लौटने की सूचना हमारे लोगों तक पहुंचाई है. हम ज्यादा देर किए बिना इलाहाबाद के लिए निकल लिए.
इलाहाबाद में हमारा परिवार पहले बाबाजी का बाग में किराये के मकान में रहता था, बाद में हमारे बड़े भाई डा. प्रेमशंकर गुप्त और उदयशंकर गुप्त ने दारागंज में अपना मकान बनवा लिया था. मां भी वहीं साथ ही रहती थीं. पिता जी जेल में ही थे. भूमिगत रहते एक-दो बार खुफिया विभाग के लोग बाबाजी का बाग वाले मकान पर भी पहुंचे लेकिन हम उन्हें चकमा देकर निकल भागने में सफल रहे. इलाहाबाद में बहुत सारे समाजवादी नेता जेल में थे तो कुछ बाहर भी. कुछ सक्रिय राजनीति में नहीं रहते हुए भी समाजवादी थे और मानसिक तौर पर आपातकाल के विरोधी थे. हमने उन सबसे अलग-अलग संपर्क-समन्वय करना शुरू किया. घंटाघर के पास जगतनरायन मुंशी जी और मजदूर नेता के के श्रीवास्तव के यहां नए पुराने समाजवादियों का अड्डा लगता था. जेल से बाहर इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता स्वराज प्रकाश, रामभूषण मेहरोत्रा, सत्येंद्रनाथ वर्मा, अशोक मोहिले, रवि किरण जैन, दयाशंकर मिश्र, नरेंद्रदेव पांडेय, कुलभास्कर डिग्री कालेज में प्राध्यापक श्रीबल्लभ और ललित मोहन शुक्ल, नरेश सैगल, ब्रजभूषण सिंह, रमेश कुशवाहा, लोहिया विचार मंच के साथ जुड़े सीडीएपेंशन के जुझारू कर्मचारी नेता, यूनियन के तत्कालीन महासचिव विनय कुमार सिन्हां, सतीश मिश्रा, साहित्यकार लक्ष्मीकांत वर्मा, उनका परिवार, खासतौर से उनके भतीजे राकेश वर्मा, छात्र युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़े विमल कुमार, भारत भूषण, समाजवादी युवा नेता विभूति मिश्र और प्रमोद श्रीवास्तव एक-एक कर हम लोग आपस में जुड़ते गए और हमारा काम जोर पकड़ने लगा.

मधुलिमये से पत्र संपर्क

इलाहाबाद से संघर्ष समाचार और मुक्ति संग्राम, वाराणसी से रणभेरी, कानपुर से आवाज के नाम से आपातकाल विरोधी बुलेटिनें प्रकाशित हो रही थीं. हम लोग उनके बीच समन्वय-समायोजन, वितरण आदि के काम में लगे थे. एक बड़ी समस्या आर्थिक संसाधनों और देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय समाजवादी, आपातकाल विरोधी सर्वोदयी नेताओं-कार्यकर्ताओं के पता-ठिकानों की थी. तभी हमारा पत्र संपर्क नरसिंहगढ़ और बाद में भोपाल जेल में बंद समाजवादी नेता मधुलिमए से हुआ. वह हमें पहले से ही पुत्रवत स्नेह देते थे. मधु जी से हमने देश भर में तमाम समाजवादी नेताओं-कार्यकर्ताओं के पते लिए. मेरे आग्रह पर मधु जी ने कुछ लोगों के नाम पत्र लिखकर आपातकाल के विरोध में मेरी भूमिका का उल्लेख करते हुए मेरी मदद करने को भी कहा. उन्होंने पत्र में लिखा कि ‘विष्णु (देव) पुत्र’, जान जोखिम में डालकर काम कर रहा है. इसकी हर संभव मदद करें.’ इन लोगों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से हटाए गए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हेमवती नंदन बहुगुणा उनके करीबी और उनके साथ ही उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता के पद से त्यागपत्र देनेवाले वरिष्ठ अधिवक्ता श्यामनाथ कक्कड़, उनके सहयोगी समाजवादी अधिवक्ता रामभूषण मेहरोत्रा, अशोक मोहिले, वरिष्ठ अधिवक्ता सत्येंदनाथ वर्मा, इलाहाबाद हाईकोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरुद्ध समाजवादी नेता राजनारायण का मुकदमा लड़ने और जीतकर श्रीमती गांधी का चुनाव अवैध घोषित करवानेवाले वरिष्ठ अधिवक्ता शांतिभूषण, उनके सहयोगी समाजवादी अधिवक्ता रमेशचंद्र श्रीवास्तव, संगठन कांग्रेस के नेता, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त, चौधरी चरण सिंह एवं अन्य कई और लोग शामिल थे. सारे पत्र हमारे पते पर ही आए थे. हमने ये सारे पत्र इन लोगों तक पहुंचाए. इनमें से समाजवादी पृष्ठभूमि के नेता-अधिवक्ता तो वैसे भी निरंतर हमारी मदद कर रहे थे. बाकी लोगों से भी सहयोग-समर्थन मिलने लगा. कुछ लोगों के नाम-पते और संपर्क नैनी जेल में बंद समाजवादी नेता नरेंद्र गुरु ने भी दिए थे. इनमें मुट्ठीगंज चौराहे पर न्यू चाकघाट ट्रांसपोर्ट के रघुराज सिंह भदौरिया भी थे. रामभूषण मेहरोत्रा, अशोक मोहिले, रवि किरण जैन, श्रीबल्लभ, सतीश मिश्र, ब्रजभूषण और लक्ष्मीकांत वर्मा के परिवारों का तो मैं नियमित मेहमान सदस्य सा बन गया था. इन परिवारों ने खाने से लेकर पैसों के मामले में भी कभी किसी तरह की कमी महसूस नहीं होने दी.
हेमवतीनंदन बहुगुणा से मिलना एक रोमांच से कम नहीं था. उनके मुख्यमंत्री पद छोड़ने के कुछ समय बाद ही हम उनसे इलाहाबाद के निवास पर मिले थे. यह बताने पर कि मधु लिमए ने उनके त्यागपत्र की सराहना करते हुए लिखा है कि बहुगुणा जी जैसे लोगों के रहते लोकतंत्र मर नहीं सकता, खुश होने के बजाय उन्होंने हमसे वह पत्र मांग लिया जो हमारे पास था ही नहीं. बाद में हमने मधु जी से इस आशय का पत्र हासिल कर उन्हें सौंप दिया. बहुगुणा जी ने कुछ पैसे देते हुए कहा कि जब तक बहुत आवश्यक न हो, आइंदे घर पर नहीं आना और हर महीने पैसे सिविललाइंस में रहनेवाले हमारे करीबी ललित मोहन टंडन जी से ले लिया करना. हमारा नियमित सहयोग करनेवाले एक और पुराने सोशलिस्ट, बुजुर्ग अधिवक्ता जयकृष्ण चतुर्वेदी भी थे. उनके दो पुत्र-बालकृष्ण चतुर्वेदी और अमियकृष्ण चतुर्वेदी आइएएस अधिकारी थे. बालकृष्ण जी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में कैबिनेट सचिव भी रहे.
मधु जी के साथ हमारा पत्राचार ‘कोड वर्ड्स’ में होता था. मसलन, हमारे एक पत्र के जवाब में मधु जी ने लिखा, ‘पोपट के पिता को तुम्हारा पत्र मिला.’ पत्र में अन्य व्यौरों के साथ अंत में उन्होंने लिखा, ’तुम्हारा बांके बिहारी.’ यह बात समाजवादी आंदोलन में मधु जी के करीबी लोगों को ही पता थी कि उनके पुत्र अनिरुद्ध लिमए का घर का नाम पोपट था और मधु जी बिहार में बांका से सांसद थे. एक और पत्र में उन्होंने बताया कि ’शरदचंद इंदौर गए.’ यानी उनके साथ बंद रहे सांसद शरद यादव का तबादला इंदौर जेल में हो गया. जब इंदिरा गांधी ने संविधान में 42वां संशोधन किया तो उसकी आलोचनात्मक व्याख्या करते हुए मधु जी ने उसके खिलाफ एक लंबी पुस्तिका लिखी और उसकी हस्तलिखित प्रति हमारे पास भिजवा दी ताकि उसका प्रकाशन-प्रसारण हो सके. इसके साथ उन्होंने पत्र लिखा कि अगर हस्तलिपि मिल जाये तो लिखना की ‘दमा की दवा मिल गयी है.’
मधु जी के पत्र के साथ हम और समाजवादी नेता विनय कुमार सिन्हां लखनऊ में चौधरी चरण सिंह और चंद्रभानु गुप्त से भी मिले थे. हालांकि हम लोग चौधरी साहब के एक राजनीतिक फैसले से सख्त नाराज थे. उन्होंने आपातकाल में विधान परिषद के चुनाव में भाग लेने की घोषणा की थी. हमारा मानना था कि विधान परिषद का चुनाव करवाकर इंदिरा गांधी आपातकाल में भी लोकतंत्र के जीवित रहने का दिखावा करना चाहती थीं, लिहाजा विपक्ष को उसका बहिष्कार करना चाहिए था. हमने और विनय जी ने इस आशय का एक पत्र भी चौधरी चरण सिंह को लिखा था. जवाब में चौधरी साहब का पत्र आया कि चुनाव में शामिल होनेवाले नहीं बल्कि विधान परिषद के चुनाव बहिष्कार की बात करनेवाले लोकतंत्र के दुश्मन हैं. हमारा आक्रोश समझा जा सकता था. लेकिन मधु जी का आदेश था सो हम चौधरी साहब से मिलने गए. उन्होंने हमें समझाने की कोशिश की कि चुनाव का बहिष्कार बचे-खुचे लोकतंत्र को भी मिटाने में सहयोग करने जैसा होगा. हमारी समझ में उनकी बातें नहीं आनेवाली थीं. हमने इस बारे में मधु जी को भी लिखा था. मधु जी का पत्र आया कि चौधरी के पीछे बेमतलब पड़े हो, यहां जेलों में संघ के लोग जिस तरह से माफीनामे लिखने में लगे हैं, उस पर चिंता करनी चाहिए.

संघ का माफीनामा!

गौरतलब है कि स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने 22 अगस्त और 10 नवंबर 1975 को पुणे की यरवदा जेल से स्वयं इंदिरा गांधी को दो माफीनामानुमा पत्र लिखकर संविधान संशोधन पर आधारित सुप्रीम कोर्ट में उनके रायबरेली के चुनाव को वैध ठहराने वाले फैसले पर उन्हें बधाई देने के साथ ही उनके शासकीय कार्यों में संघ के प्रचारकों, स्वयंसेवकों के सहयोग की इच्छा जताई थी. उन्होंने सफाई दी कि आपातकाल विरोधी और यहां तक कि गुजरात और बिहार आंदोलन अथवा जेपी के आंदोलन से भी संघ का कोई सरोकार नहीं है. संघ के ऊपर से प्रतिबंध हटाने और संघ के लोगों को नाहक परेशान करना बंद करने का अनुरोध भी उन्होंने किया. इंदिरा गांधी के द्वारा उनके पत्रों का जवाबतक नहीं देने पर देवरस ने आपातकाल को ‘शांति पर्व’ कहनेवाले संत बिनोवा भावे को 12 जनवरी 1976 को लिखे पत्र में उनके और इंदिरा गांधी के बीच मध्यस्थता और समझौता कराने का आग्रह किया. वह इंदिरा गांधी और संजय गांधी से मिलना भी चाहते थे लेकिन वह संभव नहीं हो सका. बाद में पर्दे के पीछे बनी किसी सहमति के आधार पर स्थानीय और व्यक्तिगत स्तर पर एक पंक्ति का ‘माफीनामा’ (मैं सरकार के बीस सूत्री कार्यक्रम का समर्थन करता हूं) भरकर संघ के एवं कुछ अन्य संगठनों के भी बहुत सारे लोग जेलों से बाहर आए थे. वे लोग भी आज ‘लोकतंत्र रक्षक सेनानी’ कहे जाते हैं.
यह सही है कि संघ ने आपातकाल का खुलकर कभी विरोध नहीं किया. संघ पर जमायते इस्लामी, आनंद मार्ग एवं कुछ अन्य संगठनों के साथ ही प्रतिबंध लगा था. प्रतिबंधित संगठनों के लोग गिरफ्तार किए गए थे. लेकिन बाला साहेब देवरस का यह कहना कि संघ का बिहार आंदोलन या जेपी आंदोलन से कुछ भी लेना देना नहीं है, सही नहीं था.
हम मधु जी को अपने पत्र रविशंकर के नाम से भेजते थे और अपने पते की जगह अपने मित्र अशोक सोनी के घर का पता देते थे. एक बार मधु जी ने जवाबी पत्र रविशंकर के नाम से ही भेज दिया. उससे हम परेशानी में पड़ने ही वाले थे कि डाकिए से मुलाकात हो गई और मित्र का पत्र बताकर हमने वह पत्र लपक लिया. हमने मधु जी को लिखा कि ‘प्रयाग में रवि का उदय होता है, भोपाल में अस्त होना चाहिए, भोपाल से शंकर की जय होगी, तब बात बनेगी. आप जैसे मनीषी इसे बेहतर समझ सकते हैं.’ इसके बाद मधु जी के पत्र जयशंकर के नाम से आने शुरु हो गए. आपातकाल की समाप्ति के बाद मधु जी ने बताया था कि किस तरह वे हमारे पत्र जेल में बिना सेंसर के हासिल करते (खरीदते) थे. वे अपने पत्रों को भी कुछ इसी तरह अपनी पत्नी चंपा जी तथा अन्य खास मुलाकातियों के जरिए बाहर भिजवाते थे.
आपातकाल में जब लोकसभा की मियाद बढाकर पांच से छह वर्ष कर दी गयी तो विरोधस्वरूप मधु जी और शरद यादव ने लोकसभा से त्यागपत्र दे दिया था. त्यागपत्र तो छोटे लोहिया कहे जानेवाले समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र जी ने भी दिया था लेकिन उन्होंने अपना त्यागपत्र लोकसभाध्यक्ष के पास भेजने के बजाय चौधरी चरण सिंह के पास भेज दिया था. इस पर आग बबूला मधु जी ने मुझे पत्र लिखकर कहा कि जेल में जाकर जनेश्वर से मिलो और पूछो कि क्या उन्हें लोकसभाध्यक्ष का पता नहीं मालूम. त्यागपत्र नहीं देना है तो ढोंग करने की क्या जरूरत है. मैं उनके पत्र के साथ किसी तरह मुलाकाती बनकर जेल में जनेश्वर जी से मिला और उन्हें मधु जी का सन्देश दिया. जनेश्वर जी कुछ उखड़ से गए और बोले, मधु जी अपनी पार्टी के नेता हैं, खुद फैसले ले सकते हैं लेकिन हमारी पार्टी (लोकदल) के नेता, अध्यक्ष चरण सिंह हैं. लिहाजा, हमने त्यागपत्र उनके पास ही भेजा.
नैनी जेल में पता चला कि समाजवादी नेता छोटेलाल यादव के घर की हालत कुछ ठीक नहीं है. हम उनके गांव-घर में गए कुछ आर्थिक मदद भी की. उसी समय कुछ ऐसा हुआ कि मुझे आपातकाल विरोधी साहित्य के प्रकाशन के लिए पेपर और मैटर लेकर बांदा जिले में गोस्वामी तुलीदास के गांव राजापुर जाना पड़ा. छोटेलाल यादव जी ने वहां पुराने समाजवादी देवनारायन शास्त्री का पता दिया था जिनका अपना छोटा सा छापाखाना भी था. इलाहाबाद से राजापुर जाने के लिए बस से महेवा घाट जाना पड़ता था. वहां से नाव से यमुना पार करनी होती थी. शाम हो गई थी और नाव या नाविक का पता नहीं था. किसी तरह एक नाविक को पटाकर राजापुर पहुंचे. शास्त्री जी कुछ ही दिन पहले जेल से छूट कर आए थे. उनसे हमने मिलने का मकसद बताया तो एक बार तो वह सहम से गए, कहा अभी तो जेल से किसी तरह छूट कर बाहर आए हैं और आप फिर जेल जाने का इंतजाम करना चाहते हो. बाद में छोटेलाल यादव का वास्ता देने और समझाने पर वह सहयोग के लिए राजी हो गए. हमारी रात तुलसीदास जी के मंदिर में ही गुजरी जहां उनके हस्तलिखित रामचरित मानस के कुछ पन्ने (पांडुलिपियां) सहेज कर रखे गये थे. सामग्री प्रकाशित होने के बाद हम नौ दो ग्यारह हो गए.
संभवतः अक्टूबर-नवंबर 1976 की बात होगी. रामलीला का त्यौहार चरम पर था. इलाहाबाद में संजय गांधी की सभा होनेवाली थी. खुफिया पुलिस की रिपोर्ट थी कि सभा में डायनामाइट लगाया जा सकता है. जार्ज फर्नांडिस के करीबी होने के नाते हम लोगों की खोज कुछ ज्यादा ही तेज हो गई. एक रात दारागंज के हमारे मकान पर पुलिस की दबिश पड़ी. आधी रात के बाद पुलिस हमारे घर के हर कोने में यहां तक कि बाथरूम में भी झांककर मुझे तलाश रही थी और हम सामने के श्री रूपनारायन सिंह जी के घर के बरामदे में रजाई ओढ़कर सो रहे थे. पुलिस के छापे के बारे में पता चलने पर हम धीरे से उठे और पेशाब करने के बहाने नाला पार कर प्रयागघाट रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ लिए. उधर मेरे नहीं मिलने पर पुलिस घर से हमारे दोनों बड़े भाइयों को पकड़कर थाने ले गई. दोनों सरकारी कर्मचारी थे. उनका स्वागत वहां भद्दी भद्दी गालियों और धमकियों से किया जाता रहा. बार बार पूछा जाता कि जयशंकर कहां है?

किसी तरह लुकते छिपते हेमवतीनंदन बहुगुणा की पत्नी एवं जिला परिषद की अध्यक्ष कमला बहुगुणा के पास पहुंचा. उनके दखल से ही हमारे दोनों भाई थाने से बाहर आ सके लेकिन हम घर से बाहर हो गए. घर पहुंचने पर भाइयों ने कहा कि पिता जी पहले से ही जेल में हैं, तुम जेल से आए हो और कब फिर चले जाओगे, कुछ पता नहीं. लेकिन हम जेल चले गए और हमारी नौकरी चली गई तो बच्चों का क्या होगा. हमारे कुछ कपड़े और कुछ पैसे हमें देकर घर के बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. मां की आंखों में आंसू थे लेकिन हम परिवार की विवशता और स्थिति की गंभीरता को बखूबी समझ रहे थे. वैसे भी, यह हम सभी जानते थे कि घर परिवार से बिलगाव अस्थाई ही था. लेकिन उस क्रम में हमारा सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि घरवालों ने डर के मारे हमारे सारे राजनीतिक पत्र और साहित्य नष्ट कर दिये. जिसमें हमारे लिए अनमोल धरोहर साबित होनेवाले हमारे और मधु जी के बीच के कूट भाषा में पत्र व्यवहार भी नष्ट हो गए थे. उन पत्रों में भाषा और कथ्य तो मधु जी का होता था लेकिन बहुत ही सुंदर और सुडौल लिखावट मध्य प्रदेश के विनोद कोचर जी की होती थी जो जेल में मधु जी के साथ ही रहते थे. कोचर जी जेल तो गए थे आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में लेकिन निकले थे एक प्रखर समाजवादी के रूप में. मधु जी के संसर्ग में विचारों के आदान प्रदान ने उन्हें समाजवादी बना दिया था.

बहरहाल, घर से बाहर होने के बाद लोहिया विचार मंच से जुड़े मित्र सतीश मिश्र ने अपने घर के पास हिंदी साहित्य सम्मेलन से लगी एक अंधी सी गली के एक कमरे में हमारे रहने की व्यवस्था कर दी, इसी कमरे से मुक्ति संग्राम का प्रकाशन भी होता था. हमारे लिए खाने का इंतजाम सतीश मिश्र जी तथा अन्य मित्रों के घर हो जाता था. अपने समाजवादी मित्र विभूति मिश्र के प्रयास से हिंदी साहित्य सम्मेलन में दिहाड़ी पर काम मिल गया. उस समय सम्मेलन के प्रधानमंत्री उनके पिता प्रभात शास्त्री जी थे. वहां छह रु. रोजाना के हिसाब से पैसे मिलते थे. लेकिन एक दिन खुफिया पुलिस के लोग वहां भी धमक गए और पूछताछ शुरू कर दी. किसी से पूछने पर पता चला कि किसी जयशंकर गुप्ता को खोज रहे थे. हमारे लिए वहां से खिसक लेना ही मुनासिब लगा. बाद में शास्त्री जी ने कहलवाया कि महीने भर का जो पारिश्रमिक बनता है, उससे कुछ ज्यादा पैसे हमें वैसे ही मिल जाएंगे. हमें सम्मेलन आने की आवश्यकता नहीं है.
इलाहाबाद में सिविल लाइंस स्थित इंडियन काफी हाउस हम समाजवादियों का लंबे अरसे से प्रिय अड्डा था. आपातकाल में भी छिपते छिपाते वहां हम पहुंच जाते. वहां प्रकाश और लखन तथा और भी कई वेटर हम लोगों से परिचित और प्रभावित रहते थे. वे लोग हम लोगों के लिए संदेशवाहक और खुफिया का काम भी करते थे. हमारे संदेश देश के किसी भी शहर में जहां काफी हाउस होते थे, इनके स्टॉफ के जरिए पहुंच जाते थे. कई बार सरकारी खुफिया विभाग के लोग भी वहां हम जैसों की तलाश में पहुंच जाते थे लेकिन उससे पहले हमें उनके वहां होने की सांकेतिक चेतावनी मिल जाती और हम वहां से खिसक लेते.
इलाहाबाद में सीएमपी डिग्री कालेज के पास चौराहे पर चाय की दुकान पर भी हमारा अड्डा जमता. नियमित लोगों में वहां छात्र संघ के अध्यक्ष शिवभूषण सिंह. हाई कोर्ट में तत्कालीन जज और हेमवती नंदन बहुगुणा के रिश्तेदार (साढ़ू) न्यायमूर्ति यशोदानंदन के सुपुत्र शशी नंदन जो बाद में खुद भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज बने, प्रमोद श्रीवास्तव, कमल श्रीवास्तव, चंद्रेश्वर सिंह उर्फ चंदू, कमलेश सोनकर अक्सर मिलते. कई लोग कांग्रेसी होने के बावजूद आपातकाल के विरुद्ध परोक्ष रूप से हम लोगों का साथ देते थे.
भूमिगत रहते कई बार हमारा दिल्ली जाना भी हुआ. वहां हम 16-17 विट्ठल भाई पटेल हाउस स्थित सोशलिस्ट पार्टी के आफिस में डेरा जमाते. वहां सुरेंद्र मोहन जी मिलते जो वहीं 507 नंबर के फ्लैट में रहते भी थे जो पार्टी सांसद, समाजवादी नेता मधुदंडवते जी के नाम पर आवंटित था. वहां हमारे मित्र रविनायर भी मिल जाते. कभी कभार समाजवादी अधिवक्ता साथी स्वराज कौशल और उनकी पत्नी सुषमा स्वराज भी मिल जाते. नाश्ता उनके साथ ही यूएनआई की कैंटीन में हो जाता. खाने के लिए जेब में ठीक ठाक पैसा होने पर आइएनएस की कैंटीन में, कम पैसे होने पर सीआईएसआर (काउंसिल आफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ) की कैंटीन में चले जाते, जहां बहुत सस्ती, 70 पैसों में शाकाहारी थाली मिल जाती थी. इस कैंटीन का रास्ता रविनायर ने ही दिखाया था. कभी कभार मोहनसिंह पैलेस के पासवाले हनुमान मंदिर के प्रसाद और गुरुद्वारा बंगला साहिब के लंगर से भी काम चल जाता. एक-दो बार सुषमा जी और स्वराज कौशल जी के सौजन्य से तीस हजारी अदालत में हमारी मुलाकात जार्ज साहेब से भी हुई. सुषमा जी और स्वराज कौशल जार्ज साहब का मुकदमा लड़ रह थे.

जयशंकर गुप्त (WRITER)

नोट : अगली कड़ी में आपातकाल और न्यायपालिका

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी »