पहले कांग्रेस को समाजवादी बनाने की कोशिश करूंगा, नहीं बना सका तो इसे तोड़ दूंगा !

” जिंदगी का कारवां “
        -चंद्रशेखर
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से इस्तीफा देने के बाद घटनाएं तेजी से घटी । अशोक मेहता संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में शामिल होने के लिए पहले ही न्यूयॉर्क चलें गए थे । इधर दल की कार्यसमिति ने उनकी पार्टी-सदस्यता समाप्त कर दी । जून,1964 में अशोक मेहता के समर्थकों ने लखनऊ में एक सम्मेलन किया । इस सम्मेलन में शायद कामराज जी गये थे । मैं उस सम्मेलन में नहीं गया, लेकिन आयोजित करने में सहयोग दिया । इस सम्मेलन के डेढ़ महीने बाद मुझे प्रस्ताव पारित कर मुअत्तल कर दिया गया । प्रसोपा से मुझे निकालने वालों का समर्थन देने वालों में मेरे मित्र स्व.बेनी प्रसाद माधव और राजवंश सिंह भी थे । मैंने अशोक मेहता की मदद की इसलिए मुझे निकाला गया । लेकिन एक दो लोगों को छोड़कर दल के लोगों से मेरा संबंध पहले जैसा बना रहा । जो लोग कांग्रेस में आएं ,उनसे और जो पीएससी में रह गये ,उनसे भी । इतना जरूर था कि कांग्रेस में जितने लोग आए  उसमें से अधिकतर लोग इंदिरा गांधी की सरकार में चले गए ,प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के लोगों से मेरा व्यक्तिगत संबंध ज्यों का त्यों बना रहा । लेकिन जहां तक वैचारिक संबंधों का सवाल है ,वे लोग कभी भूल नहीं सकें कि मैंने पार्टी छोड़ी । शायद वे ज्यादा सिद्धांतवादी लोग थे । वे इस विचार के थे कि जो पार्टी छोड़ता है, वह कांग्रेस का पुछल्ला बनकर रह जाता है ।लेकिन मुझे इस रूप में कभी नहीं देखा । मैंने कोई अवसरवादी रुख अपनाया है,ऐसा भी उन्होंने नहीं सोचा । यही नहीं,बाद में ऐसे अनेक प्रसंगों में लोगों ने मेरे प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं दिखाई । उन लोगों के साथ मेरा जो संबंध दल में रहते हुए था ,वह आज भी बना हुआ है । मुझसे पहले मेरे अनेक साथी जैसे, अशोक मेहता,ओम प्रकाश,सनत मेहता, यशवंत मेहता तथा छबीलदास कांग्रेस में चले गए थे । उसके छः महीने बाद मैं कांग्रेस में सम्मिलित हो गया ।
इंदिरा गांधी से मुलाकात – 
मेरे कांग्रेस में शामिल होने से पहले गुजरात के महुआ क्षेत्र में एक सभा हुई । इसका आयोजन छबीलदास मेहता और यशवंत मेहता ने किया था । उसमें उन्होंने मुझे भी आमंत्रित किया । इंदिरा गांधी को भी न्यौता दिया था । हम दोनों एक ही ट्रेन से गये । इंदिरा गांधी से मेरी पहली मुलाकात उस सम्मेलन के मंच पर हुई । किसी ने उनसे कहा : ये चंद्रशेखर जी है । उन्होंने कहा : मैंने नाम तो बहुत सुन रखा है । इसपर मैंने कहा कि मैंने भी आपका नाम बहुत सुन रखा था, अबतक मुलाकात का अवसर नहीं मिला ।
उसके बाद कई बार मेरे मित्रों ने कहा कि इंदिरा जी से मिलिए, मैंने मना कर दिया, कि कोई आवश्यकता नहीं समझता था । इंदिरा जी के यहां उस जमाने में गुरूपदस्वामी, इंद्र कुमार गुजराल, अशोक मेहता तथा कुछ लोग रोज शाम को बैठते थे । इन लोगों के अनेक बार कहने पर मैं इंदिरा जी से मिलने गया । वे लोग लान के बाहर बैठे थे । मेरी इंदिरा जी से बात हुई । इंदिरा जी ने मुझसे सवाल किया :
चंद्रशेखर जी, क्या आप कांग्रेस को समाजवादी मानते हैं ?
मैंने कहा:  ‘ मैं नहीं मानता कि कांग्रेस समाजवादी संस्था है,पर लोग ऐसा कहते हैं ।’
फिर आप कांग्रेस में क्यों आए ?’
मैने कहा: क्या आप सही उत्तर जानना चाहतीं हैं ?’
हां , मैं यही चाहती हूं ।’
मैंने कहा : मैंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में 13 साल तक पूरी क्षमता और ईमानदारी से काम किया। दल को मैने पूरी निष्ठा से समाजवाद के रास्ते पर ले जाने की कोशिश की, लेकिन काफी समय तक काम करने के बाद मुझे लगा कि यह संगठन ठिठक कर रह गया है । पार्टी कुंठित हो गई है,बढ़ती नहीं है । अब यहां कुछ होने वाला नहीं है । फिर मैंने सोचा कि कांग्रेस बड़ी पार्टी है, इसी में चलकर कुछ देखें, कुछ करें ।’
इंदिरा : लेकिन यहां आने के बाद आप क्या करना चाहते हैं ?
चंद्रशेखर : मैं कांग्रेस को सोशलिस्ट बनाने की कोशिश करूंगा !
इंदिरा : ‘और अगर न बनी तो ?’
चंद्रशेखर: ‘ इसे तोड़ने का प्रयास करूंगा ! क्योंकि यह जबतक टूटेगी नहीं, तबतक देश में कोई नई राजनीति  नहीं आयेगी । पहले तो मैं प्रयास यही करूंगा कि यह समाजवादी बनें ,पर यदि नहीं बनी तो इसे तोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा ।’
इंदिरा : ‘मैं आपसे सवाल पूछ रहीं हूं और आप मुझे इस तरह का उत्तर दे रहें हैं ?’
मैंने बिना हिचक कहा : सवाल आप पूछ रहीं हैं तो उत्तर भी तो आपको ही दूंगा ।’
इंदिरा :’ पार्टी तोड़ने से आपका क्या मतलब हैं ?’ इससे क्या होगा ?’
चंद्रशेखर : देखिए, कांग्रेस बुढ़ी बरगद की पेड़ हो गई है। इसकी फैली छांव में कोई दूसरा पौधा विकसित नहीं होगा । इस बरगद के नीचे कोई पौधा पनप नहीं सकता । इसलिए जब-तक यह पार्टी टूटेगी नहीं, तबतक कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होगा ।
‘श्रीमती गांधी विस्मित- सी मुझे देखती रह गई । बाद में भी मैंने श्रीमती गांधी से सदा स्पष्ट बातें की । उनसे अपना मन्तव्य कभी नहीं छिपाया ।
पढ़ते रहिए,आगे और कुछ भी जारी …
                                                    -राजेश ®️✍️
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