हार्वर्ड के विशेषज्ञ ने कहा,सालभर में कोरोना की चपेट में आ सकती है दुनिया की सत्तर फीसदी आबादी

श्याम सिंह रावत

वर्षों पहले नोबल पुरस्कार विजेता जोशुआ लेडरबर्ग ने कहा था कि किसी दूसरे देश में एक बच्चे को बीमार करने वाला एक विषाणु आप तक पहुंच सकता है और आगे चलकर वैश्विक महामारी में तब्दील हो सकता है। कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण ने उनकी भविष्यवाणी को एक बार फिर सही साबित कर दिया है।

लाखों लोगों को चपेट में लेने वाले इस वायरस के संभावित असर के बारे में कई आकलन किए गए हैं। हार्वर्ड के महामारी रोगों के विशेषज्ञ मार्क लिपसिच ने कहा कि 1 साल के भीतर विश्व की 70 प्रतिशत आबादी तक इससे प्रभावित हो सकती है।

प्लेग और इन्फ्लुएंजा जैसी महामारियों के कारण कई बार लाखों जानें जा चुकी हैं। एंटीबायोटिक्स की खोज के बाद साल 1967 में अमेरिका के सर्जन विलियम स्टीवर्ट ने कहा था कि अब महामारियों खत्म करने का वक्त आ गया है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पिछले तीन दशकों में करीब 40 नए विषाणु सामने आए हैं।

आम तौर पर यह माना जाता है कि पिछड़ापन और गरीबी संक्रामक बीमारियों के फैलने का सबसे बड़ा कारण होता है। यह काफी हद तक सही भी है, लेकिन अब विकसित देशों में कोरोना वायरस के प्रकोप को देखकर यह स्पष्ट है कि समृद्ध देश भी अछूते नहीं हैं।

दरअसल, मानव विकास और संक्रामक बीमारियों के बीच गहरा रिश्ता है। संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स में भी इसे तीसरे स्थान पर रखा गया है। विकास का एक दूसरा पहलू यह भी है कि इसकी प्रक्रिया में नई तकनीकें आती हैं, नए बांध और नहर बनाए जाते हैं, जंगलों की कटाई होती है, प्रवासी आबादी का विस्तार होता है, शहरीकरण बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों में वृद्धि होती है। ये कारण संक्रामक बीमारियों के प्रसार में सहायक होते हैं।

महामारियां हर प्रभावित देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव गरीबों पर पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र भी कह चुका है कि महामारियां राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होती हैं। 1950 से 1991 के बीच 20 देशों में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक संक्रामक बीमारियां मृत्यु-दर को बढ़ाने के साथ ही राष्ट्रीय क्षमताओं को भी कमजोर करती हैं और गरीबी बढ़ाती हैं।

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