कोई तो है पत्रकारिता में, जिसमें मनुष्यता कायम है..

पत्रकारों के लिए शुभ समाचार
हेमेन्द्र प्रताप सिंह तोमर
आप जब बेहद तनाव में हों और थोड़ी सी राहत देने वाली खबर कहीं से मिले तो वाकई में लगता है, कि जी लो यार। कुछ विश्वास बनता-बढ़ता सा दिखने लगता है। और, मसला तब और ज़्यादा उम्मीदों का होता है, जब यह मीडिया से जुड़ा हुआ हो।
दरअसल, इस चल रहे कोरोना-युद्ध के समय भारत में मीडिया ही है जो सरकार से लेकर हर एक को पल-पल की खबरें मुहैया करा रही है। ये खबरें ही जहाँ सरकारी तंत्र को अपनी रणनीति बनाने में सहायता देती हैं, वहीं जनता को भी रास्ता दिखाती हैं कि क्या करें और क्या न करें।
लेकिन कोरोना फाइटर्स की सरकारी परिभाषा में मीडिया को देश की सरकार ने स्थान नहीं दिया बल्कि उत्तराखंड सरकार ने दिया, यह जानकारी है। सरकारी वर्गीकरण में मीडियाकर्मियों को उत्तराखंड सरकार ने जब शामिल किया तो कोरोना के फ्रंट पर काम कर रहे डॉक्टर्स व मेडिकल टीम, पुलिस बल और स्वच्छकारों के साथ-साथ लगभग उस मोर्चे पर कंधे से कंधा मिला के चल रहे मीडियाकर्मियों के लिए सुरक्षा का आवरण मिल गया। इस से यह हुआ कि यदि इनमें से किसी को कोरोना संक्रमण हुआ और मृत्यु हुई तो उस जीवन-क्षति की दशा में 50 लाख रुपये उसके परिजनों को मिल सकेगा। यह एक वह सम्बल है, जिससे हर कोरोना फाइटर ज़्यादा लगनशीलता और ज़िम्मेदारी से काम कर सकेगा। हालांकि उत्तर प्रदेश में मीडिया कर्मियों को यह आसरा नहीं मिल पाया। ऐसे मेंपत्रकारों की दिक्कतें और ज़्यादा हो चलीं, जब बहुतेरे मीडिया संस्थानों ने लॉक डाउन के दौर में अपने खर्चों को सीमित करते हुए सबसे पहले रिपोर्टर्स व डेस्क कर्मियों की छंटनी कर डाली। और जो बचे खुचे थे, उनके वेतन में बहुत सी कटौतियां कर डालीं कि मरेगा तो भी आजीविका की मजबूरी में ही सही, कुछ करता ही रहेगा। आज़ादी के बाद, पहली बार आर्थिक रूप से टूट रहे मीडिया हाउसेस में पत्रकारों के साथ ऐसा हो रहा है। और, हम सब बेबस हैं। सरकारों से घोर उपेक्षा के भाव के बीच टूटे फूटे तरीके से ही सही लेकिन मीडिया ने जिस तरह से अपने कर्तव्यपालन में काम अंजाम दिया है उसकी तारीफ तो बनती ही है। ऐसे में आज एक घटना ऐसी हुई कि दिल को बहुत सुकून मिला।
लॉक डाउन 1.0 में जिस पत्रकार बन्धु यानी मनोज मिश्रा जी ने मुझे आम जनता की सहज सहायता टीम में रखा था, उन से 14 अप्रैल से लॉक डाउन 2.0 में संपर्क नहीं हो पाया। वो मुझे मेरे पिताजी की सेवा में लगे होने की वजह से बिल्कुल छेड़ते भी नहीं थे, इसलिए इधर 4-5 दिनों से बात हुई नहीं थी। मैंने आज शाम उन्हें फ़ोन लगाया। तो उन्होंने फ़ोन उठा के कहा कि भइया, बहुत जरूरी न हो तो बस आपको एक घण्टे में पलट के करता हूँ।
मैंने कहा, कोई बात नहीं। आराम से कर लीजियेगा।
इधर, अचानक ठीक एक घण्टे बाद मुझे एक पत्रकार बन्धु की याद आयी। जिन्होंने मेरे पिताजी के मेडिकल कॉलेज में एडमिट रहने के दौरान हर रोज़ फोन किया। एक दिन वो पिताजी को देखने आए थे तो पिताजी की किसी जांच रिपोर्ट लेने के लिएमैं परिसर में ही गया था और वह लौट गए थे। जब कुछ दिन बाद पिताजी को डिस्चार्ज करा के घर लौटा तो एक दिन किसी और पत्रकार बन्धु से उन सज्जन के बारे में पता चला कि पिछले 2 माह से वह बेरोज़गार हैं। मैं खुद को अक्षम, किंकर्तव्यविमूढ़ और निरुत्तर मान रहा था इस मामले में। खैर, lock down में अच्छे खासों की हालत पतली थी ऐसे में, बड़ी हिम्मत कर के उन सज्जन को फ़ोन लगाया कि कुशल क्षेम पूछ लूँ। घण्टी गई। फोन उठा। उधर से आवाज उन भाईसाहब की लगी। आवाज भर्राई हुई थी। उसी में बोले वो, “बोलिये, ठाकुर साब”।
मेरा दिल धड़क गया कि सब ठीक तो? खैर बात बढ़ी तो जो सुना तो एक एक शब्द अब तक ज्यो के त्यों गूंज रहे हैं। बोले, “भइया, कहां जाता मैं। किस से कहता मैं। क्या कहता। पत्रकारिता में एक आम और सच्चे पत्रकार की स्थिति पहले से ही खराब थी। रही सही इस लॉक डाउन ने पूरी कर दी।”
वे धारा प्रवाह बोल रहे थे। एकदम भावना में बहे चले जा रहे थे। बोले,”सच्चा पत्रकार तो स्वाभिमानी होता है न, घर में राशन खत्म हुए 2 दिन हो गए थे। किस से क्या कहते? कल वो …. आया तो उसको बाहर ही बिठाए। गलती से चाय के लिए मैने पूछ लिया। उस ने हामी भर दी तो बिन दूध की काली चाय पिलाये। क्योंकि 15 फरवरी के बाद से दूध खरीदने के पैसे नहीं थे। शक्कर खत्म उस से पहले ही हो चुकी थी। लगा कि बिन शक्कर के भी गुजर सकती है तो हमने, बीवी और बच्चों ने ज़िन्दगी में से चाय, दूध और शक्कर भुला दी। लेकिन शायद वो पारखी था। उसने मेरे घर के आधे कप में पड़े गर्म काले पानी को हलक में उतार लिया और फिर जाते जाते कहा कि भइया, कल मैं आऊंगा। और, कुछ करता हूँ। आप बस एक दिन दीजिये।”
“तोमर भाई विश्वास करो कि कमरे में आ के बहुत रोया था कि यार किस दौर से गुजर रहे हम लोग। उस से क्या सहायता लूँ। मैने तो कुछ उस से कहा भी नहीं अपनी ओर से, अपने हालात पर। और अब जब सब कुछ भांप के वो बोल के जाने लगा तो भी मैं उसको नकार भी न पाया। मेरी खुद्दारी क्या आज मेरी मजबूरी के नीचे दब गई? मैंने बहुत सोचा कि क्या ठीक, क्या ठीक नहीं। और आज सुबह भी फांके की ज़िंदगी जी।”
फिर बोले, “मालूम है कि अमुक समय पर वो और उस के साथ में भाई मनोज मिश्रा आये। और अगले 1 माह का राशन दे गए, आटा, चावल, मसाले, चीनी, चायपत्ती, नमक के साथ साथ साबुन, तेल, सैनिटाइजर, मास्क और इतने पैसे दे गए कि घरवाली की दवा भी आ जायेगी और अगले दो माह तक दूध भी। और, जानते हो तोमर भाई, मनोज भाई ने यह भी कहा कि भाई साहब, अब आगे से आप मुझे मेरे मोबाइल पर सीधे आदेश करेंगे, किसी भी चीज़ के लिए। जानते हो आप भला, मैं मनोज जी से बहुत परिचित नहीं था लेकिन जब वो जाने लगे तो उन्होंने कहा कि भाई साहब, आप कभी भी किसी को कुछ नहीं बताएंगे कि मनोज ने आपके लिए कुछ किया। मैं तो यार तोमर साहब, एकदम हतप्रभ था कि कोई व्यक्ति इतना संवेदनशील हो भी सकता है भला? जिस व्यक्ति के लिए कभी मैंने कुछ किया नहीं, वो मेरा घर भर गया। धन्य हैं मनोज जी। और, जिनसे उम्मीदें थीं। सुना है वे सब के सब सरकार के लॉक डाउन का पालन करते हुए अपने अपने घरों में व्यंजन बना रहे। ऐ तोमर साहब, मनोज जी ने मना किया था कि मैं उनका नाम कभी किसी को न बताऊं लेकिन आपसे बता दिया क्योंकि रहा नहीं गया और अब मैं किसी से कभी नहीं बताऊंगा।”
फिर आगे वो बोले, “आप जानते हो न मनोज मिश्रा जी को?” मैंने कहा “हां” तो बोले कि “आप भी कभी उन्है आज वाली उनकी सहायता की बात मत कहियेगा।” मैंने फोन पर कहा कि “ठीक है।” बातचीत में उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम का जो समय बताया वो वही था, जिस समय मैंने मनोज जी को फोन मिलाया था।
अभी मैं सब कुछ सोच ही रहा था कि अचानक मनोज जी का फोन आ ही गया। बोले, “भइया, कहीं कुछ ज़रूरी काम में था। इसलिए आपसे बात कर नहीं पाया था। अब फ्री हूँ।” फिर खुद ही आगे बोले कि “आप अपने बीच किसी पत्रकार को इस समय किसी भी प्रकार की सहायता किये जाने के लायक समझते हों तो बेहिचक बताइयेगा या मेरा नंबर दे दीजियेगा। लॉक डाउन में सच्चे पत्रकारों और उनके परिवारों पर बहुत संकट है। पत्रकार खुद हूँ इसलिए उनका स्वाभिमान जानता हूँ। इसलिए मैं अपने स्तर से कुछ छोटी मोटी मदद कर दूंगा। और, यह सब गोपनीय तरीक़े से ही करूंगा ताकि उनके मान-सम्मान को कभी चोट न लगे।”
मैं सोचने लगा कि आज ही शाम को एक पत्रकार ने फेसबुक के माध्यम से पत्रकारों की सहायता के लिए फण्ड बनाये जाने की बात रखी थी।
सही बात थी। विभिन्न पत्रकार संगठन स्वयम स्वावलंबी नहीं, इसलिए यह कहने का मतलब नहीं कुछ। जबकि पत्रकार नेतागण का दर्शन शास्त्र और अर्थ शास्त्र अजीब टाइप का है। इस द्वंद में पड़ने का कोई मतलब नहीं। बस, बहुत अच्छा लगा कि कोई तो है पत्रकारिता में, जिसमें मनुष्यता कायम है। फिर मैं सोचने लगा कि मेरी मां भी कहा करती थीं कि दान उसी को कहते हैं कि दाहिने हाथ से किये गए दान की बात बाएं हाथ को भी पता नहीं चलनी चाहिए।
मनोज जी! अभिनंदन आपका। मेरे मन में आपके प्रति लगाव और बढ़ गया। आज मैं आपके नंबर +919956311666, +919794311666
को यहां शेयर कर रहा हूँ ताकि कोई भी सच्चा और ज़रूरतमंद पत्रकार समय पर आपसे सहायता ले भी सके और स्वाभिमान के साथ गोपनीय रख भी सके।
आप यशस्वी होंवे। मेरे लिए यही बहुत है कि आप से हमारा 1999 से नाता है।

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