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लघुकथा…. प्रतिस्पर्धा…..

ByArvind Singh

Oct 23, 2020
महेश कुमार केशरी 
ग्राहक-“तीन-सौ-बारह नंबर का टी. वी. आई. सी. आप कब तक लाकर मुझे दीजियेगा. बार- बार कस्टमर मुझसे तगादा  कर रहा है. कस्टमर कहता है कि अगर आप ये टी. वी. नहीं बना सकते तो मुझे टी. वी. ही लौटा दीजिये! आखिर मैं कब तक टालूं उसको. हम एक टी. वी. बनायेंगे तो एक – डेढ़ हजार रूपया तो कम – से -कम मिल ही जायेगा. और आई. सी. में भी दो – तीन सौ रूपया  अलग से मार्जिन मिल ही जायेगा. बोलिये हम आई. सी. लेने कब आएं.. “
मनोहरपुर देहात एरिया है यहां पार्टस की पहले केवल शर्मा जी की ही एक दुकान थी लेकिन, जबसे उनके भतीजे ने ऊपर मोड़ पर इलेक्ट्रॉनिक की दुकान खोल ली थी तब से शर्मा जी की अपनी दुकान बहुत ही कम चल रही थी. चूकि , शर्मा जी का भतीजा पहले शर्मा जी की ही दुकान काम करता था, और  उसे उस दुकान की सारी जानकारी थी इसलिए उसने भी ऊपर मोड़ पर इलेक्ट्रॉनिक पार्टस की ही दुकान खोल रखी थी. कारण ये था कि शादी के बाद शर्मा जी के भतीजे का खर्चा बहुत बढ गया था. इसलिए मजबूर हो कर उसको अलग अपनी दुकान खोलनी पडी़ थी.
“अरे.. भाई अब ये आई. सी. मिलना बंद हो गया है. और अब एल. सी. डी. , एल. ई. डी. , टी. वी. का जमाना है…अब मैं  कैसे बताऊँ .. तुम्हें.. ?? ..इस नंबर का आई. सी. अब नहीं मिलता है..”
शर्मा जी किसी पुराने स्टेपलाइजर का नट बोल्ट टाइट करते हुए बोले.
 ” और कोई दुकान है क्या.. … यहां आस पास में..?? ” ग्राहक ने शर्मा जी से पूछा.
” नहीं और कोई दुकान नहीं है यहां… ” शर्मा जी बोले!
और कनखियों से एक नजर अपनी पत्नी रमा को देखा!! उन्हें लगा उन्होनें कोई चीज़ चोरी  की हो…!! ये झूठ बोलकर…!!
ग्राहक जब चला गया तो उनकी पत्नी रमादेवी  ने उनसे पूछ लिया -” इस ग्राहक को आपने मनीष की दुकान पर क्यों नहीं भेज दिया. हो सकता है ये आई. सी. उसको वहां मिल जाती.. !! “
पता नहीं शर्मा जी को क्या हुआ वो अपनी पत्नी रमा देवी से गुस्साते हुए बोले – ”  किसको कहां भेजना है.. कहां नहीं भेजना है.. मुझे अच्छी तरह पता है..!!.मनीष… अब मेरा भतीजा नहीं है..वो मेरा कंपटेटर है… कंपटेटर… !! समझीं तुम…… !! जब ग्राहक का पैर किसी एक   दुकान में जाने लगता है .. तब ग्राहक लौट कर नहीं आता है  !! कोई अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी थोडे़ ही मारता है..”पता नहीं और क्या- क्या शर्मा जी बहुत देर तक बडबडाते रहे थें.रमा देवी के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था.. !! .. रमा देवी खाने का खाली टिफिन धीरे से उठाकर खिसक लीं थीं. इसका एहसास शर्मा  जी को बहुत देर बाद हुआ..!!
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