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चुनौतियों और एनडीए के अंतर्कलह के बीच नीतीश के सिर चढ़ा कांटो भरा ताज

ByArvind Singh

Nov 17, 2020

अखिलेश अखिल

नीतीश कुमार ने बिहार में सातवीं बार मुख्यमंत्री के लिए पद और गोपनीयता की शपथ ले ली है। दूसरे नंबर पर तारकिशोर प्रसाद ने मंत्री के रूप में शपथ ली है। तीसरे नंबर पर रेनू देवी ने ली है शपथ। माना जा रहा है कि इन्हे उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। राज्यपाल फगु चौहान ने इन्हे पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई है। उधर महागठबंधन ने इस शपथ ग्रहण समारोह का बायकॉट किया है। शायद यह ऐतिहासिक मामला है कि किसी शपथ ग्रहण समारोह से विपक्ष गायब रहे। उधर समारोह से पहले राजद ने एनडीए पर जनादेश का बलात्कार करने का आरोप लगाया है। राजद ने कहा है कि जनता कभी भी इस सरकार को माफ़ नहीं करेगी। ये शब्द किसी ऐरे -गैर नेता का नहीं ,राजद के प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के वरिष्ठ नेता जगदानंद सिंह के हैं। राजद के इस बयान के बीच बिहार एनडीए ने आज चुनाव में बूरी तरह से पराजित जदयू नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सिर पर काँटों भरा ताज पहनाया। ताज नीतीश कुमार के सिर पर चढ़ा और ढोल -मजीरे बीजेपी दफ्तर में बजाये गए। जदयू नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी जयकारे लगाए। करते भी क्या ? नीतीश कुमार की यह ताजपोशी सूबे में सातवीं बार हुई है। बिहार में अब तक ऐसा नहीं हुआ था। आज की ताजपोशी के बाद नीतीश कुमार बिहार में सबसे लम्बे वक्त तक ताज ग्रहण करने वाले नेता हो गए हैं। लेकिन उनका यह काल कैसा कटेगा कहना मुश्किल है। जानकार मान रहे हैं कि नीतीश कुमार इस बार कठपुतली सरकार चलाएंगे।चेहरा उनका होगा और मकसद बीजेपी का। पहले बीजेपी ने चिराग को निपटाया अब नीतीश की बारी है और इसकी शुरुआत इस सरकार से शुरू होने जा रही है। वैसे नीतीश कुमार भी सारे खेल को समझ रहे हैं लेकिन वे मजबूर भी हैं। सरकार नहीं बनाएंगे तो संभव है कि उनकी पार्टी दरक जाएगी और फिर वे कहीं के नहीं रहेंगे।
इस बार बीजेपी ने बिहार में नए चैप्टर की शुरुआत की है। बड़ा ही दिलचस्प चैप्टर है। कुछ लोगों को यह चैप्टर लुभा सकता है लेकिन इस चैप्टर में खेल भी कम नहीं। संभव है यही चैप्टर बीजेपी और एनडीए के लिए कही काल न बन जाए। खेल की शुरुआत बीजेपी ने की है। शपथ ग्रहण से पहले बीजेपी ने नीतीश कुमार और सुशील मोदी की अटूट कही जाने वाली जोड़ी को तोड़ने का काम किया है। यह कोई मामूली बात नहीं। जिस सुशील मोदी के नेतृत्व में इस बार बीजेपी को 74 सीटें मिली उन्हें पैदल कर दिया गया है। कहा जा रहा है कि मोदी अब केंद्र की राजनीति करेंगे। लेकिन बीजेपी का यह खेल नीतीश कुमार के लिए भी एक सन्देश है। सन्देश यह है कि जब बीजेपी अपने नेता का पर क़तर सकते हैं तब सामने वाले की क्या औकात है। ऊपर से देखने में सब ठीक लगे लेकिन सुशील मोदी भीतर से काफी आहात हैं। आहात इतने हैं कि जब शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए अमित शाह और नड्डा पटना पहुंचे तो सुशील मोदी उनसे मिलने तक नहीं गए। कोई आगवानी नहीं की और ना ही कोई स्वागत। खेल निराला है। कहा जा रहा है कि सुशील मोदी से बीजेपी के कई मौजूदा विधायक काफी नाराज हैं। जाहिर है सुशील मोदी यह नाराजगी का क्या बदला लेंगे कोई नहीं जनता। याद रहे सुशील मोदी को बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार के कमजोर होने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है – आगे से नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी की सीएम और डिप्टी सीएम की 15 साल पुरानी जोड़ी बिहार में देखने को नहीं मिलने वाली है। बीजेपी की तरफ से दो नए उप मुख्यमंत्री बनाये जा रहे हैं।
अपने ही नेता के खिलाफ एक्शन लेकर बीजेपी नेतृत्व ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही सख्त मैसेज देने की कोशिश की है। देखने में भले लगता हो कि बिहार बीजेपी में सुशील कुमार मोदी का पत्ता कट गया है, लेकिन असल बात तो ये है कि बीजेपी ने नीतीश कुमार के पर कतरने शुरू कर दिये हैं। उधर बीजेपी के भीतर भी कम खेल नहीं। बीजेपी के अंदर बवंडर मचा हुआ है। बीजेपी के भीतर इस बात को लेकर बयानबाजी चल रही है कि सीएम अगर पिछड़ा है तो फिर उपमुख्यमंत्री अगड़ा क्यों नहीं ? तारकिशोर पर पार्टी राजी तो नंदकिशोर पर राजी क्यों नहीं ?रेनू देवी के बजाय प्रेम कुमार क्यों नहीं ?बीजेपी आगे क्या खेल करती है और पार्टी के भीतर के बवंडर को कैसे रोक पाती है और इस पुरे खेल में सुशील मोदी कितना रंग में भांग करते हैं ,देखना होगा।
वहीं मुख्यमंत्री पद पर विराजमान होने के साथ ही नीतीश कुमार नया इतिहास तो रच दिए लेकिन चुनौतियों का सामना कैसे करेंगे इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई है। राज्य की सत्ता संभालना इस बार नीतीश कुमार के लिए पहले से जैसा आसान नहीं होने वाला है। इस बार सियासी समीकरण के साथ-साथ हालात भी अलग हैं। जिसकी वजह से नीतीश के सामने कई चुनौतियां भी हैं। एक ओर तो उन्हें मजबूत विपक्ष का सामना करना होगा तो वहीं दूसरी ओर अपने सभी सहयोगियों के साथ संतुलन बनाकर रखना होगा।
जाहिर है कि अब तक नीतीश कुमार अपने एक मात्र सहयोगी भाजपा जनता पार्टी के साथ सरकार चलाते रहे, लेकिन इस बार एनडीए में चार सहयोगी हैं। इसलिए उन्हें अपने सभी चार सहयोगियों के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा। बता दें कि इस बार एनडीए में जेडीयू के सहयोगी के रूप में बीजेपी के अलावा जीतन राम मांझी की हम और मुकेश सहनी की वीआईपी भी जुड़ गए हैं। क्योंकि अगर एनडीए में से कोई भी एक सहयोगी नाराज होता है या फिर इधर-उधर हो जाता है तो सरकार बचाना मुश्किल हो जाएगा।
वहीं नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड की सरकार के अंदर इस बार हिस्सेदारी कम हो गई है। अब इन गठबंधन में सबसे बड़ा दल बीजेपी है और जेडीयू दूसरे नंबर पर आ गई है। ऐसे में नीतीश कैबिनेट में बीजेपी और जदयू ही नहीं बल्कि हम और वीआईपी पार्टी को भी मंत्री पद देने होगा, क्योंकि उनके जरिए ही बहुमत का आंकड़ा है। वहीं विधानसभा में किसी भी पार्टी को उसकी हिस्सेदारी के हिसाब से बिहार में कैबिनेट की हिस्सेदारी मिलती रही है। ऐसे में इस बार ई कैबिनेट में बीजेपी के मंत्री अधिक होंगे और जेडीयू के कम। कहा जा रहा है कि बिहार में अधिकतम 36 मंत्री बन सकते हैं। ऐसे में जेडीयू मंत्रिमंडल में अल्पमत में होगी।
इसके अलावा बिहार की सत्ता संभालने के बाद नीतीश पहली बार मजबूत विपक्ष का सामना करेंगे। बता दें कि इससे पहले तक बिहार में विपक्ष काफी कमजोर स्थिति में रहा है। लेकिन इस बार विपक्ष मजबूत स्थिति में है। नीतीश को घेरने के लिए पहली बार विपक्ष में कम से कम 115 विधायक रहेंगे। ना केवल तेजस्वी बल्कि ओवैसी की पार्टी के मुद्दों का सामना करना भी नीतीश के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।वहीं इस बार कम सीटें हासिल करने की वजह से नीतीश कुमार के लिए सरकार चलाने और खुलकर फैसले लेने की आजादी पहले जैसी नहीं होने वाली है। इसलिए नीतीश कुमार को अपने नियंत्रण में रखकर सरकार चलाने की चुनौतियों का भी सामना करना होगा।
इसके अलावा नीतीश के सामने अपनी खोई इमेज को वापस पाने की भी चुनौती है। इस बार चुनाव में उनके खिलाफ लोगों की नाराजगी साफ देखने को मिली। चुनाव के दौरान सत्ताविरोधी लहर साफतौर पर देखने को मिली। लोग नीतीश के प्रति अपना गुस्सा जाहिर कर रहे थे। ऐसे में अब नीतीश कुमार के पास सत्ता संभालने के बाद अपनी खोई हुई सुशासन बाबू की छवि को फिर से मजबूत करने की चुनौती होगी।
नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो 19 लाख रोजगार देने की है। किसान ,मजदूर और छात्रों की समस्याएं दूर करने की है। अगर इन उम्मीदों पर सरकार खड़ी नहीं उतरी तो एनडीए में शामिल हम और वीआईपी जैसी पार्टियां ही सरकार को गिरा देगी। राजद नेता पहले ही कह चुके हैं कि जनवरी तक लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हुई तो विपक्ष सड़क पर उतरेगा। ऐसी हालत में नीतीश कुमार क्या करेंगे कहना मुश्किल है।

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