देश में असहमति और चर्चा की गुंजाइश कम होती जा रही है- अमर्त्य सेन

मशहूर अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का कहना है कि देश में असहमति को कुचला जा रहा है. सरकार को अगर कोई व्यक्ति पसंद नहीं आ रहा है तो उसे आतंकवादी घोषित करके जेल भेजा जा सकता है.

सेन का कहना है, ‘असहमति और चर्चा की गुंजाइश कम होती जा रही है. लोगों पर देशद्रोह का मनमाने तरीके से आरोप लगा कर बगैर मुकदमा चलाए जेल भेजा जा रहा है… लोगों के प्रदर्शन के कई अवसर और मुक्त चर्चा सीमित कर दी गई है या बंद कर दी गई है.’

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे अमर्त्य सेन ने किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा है कि केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों की समीक्षा करने के लिए एक मजबूत आधार है.

सेन ने दुख जताते हुए कहा, ‘शांतिपूर्ण एवं अहिंसक तरीकों का इस्तेमाल करने वाले कन्हैया, खालिद या शेहला जैसी युवा एवं दूरदृष्टि रखने वाले नेताओं के साथ राजनीतिक संपत्ति की तरह व्यवहार करने के बजाय उनके साथ दमन योग्य दुश्मनों जैसा बर्ताव किया जा रहा है. जबकि उन्हें गरीबों के हितों के प्रति उनकी कोशिशों को शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाने का अवसर दिया जाना चाहिए था.’

आर्ग्यूमें​टेटिव इंडियन के लेखक का तक है कि ‘जब सरकार गलती करती है तो उससे लोगों को नुकसान होता है, इस बारे में न सिर्फ बोलने की इजाजत होनी चाहिए, बल्कि यह वास्तव में जरूरी है. लोकतंत्र इसकी मांग करता है!’

क्या अमर्त्य सेन कुछ गलत कह रहे हैं?

क्या आप ऐसा देश चाहते हैं जहां बोलने की आजादी न हो? क्या आपको अंदाजा है कि इस देश ने बोलने की आजादी की क्या कीमत चुकाई है? क्या आप सोच सकते हैं कि आपकी आजाद नागरिकता छिन जाने के बाद आप क्या गवां देंगे?

देश के सबसे सामान्य नागरिक किसान होते हैं. उनके आंदोलन के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है, क्या आप देख पा रहे हैं?

चाहे शाहीन बाग का प्रदर्शन हो, चाहे किसानों का प्रदर्शन हो, सरकार अपने ही देश के नागरिकों को देश का दुश्मन घोषित करने का कुत्सित प्रयास करती है और पूरे देश की मशीनरी को प्रचार-युद्ध में झोंक देती है.

देश के नामचीन पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को बेबुनियाद आरोप में जेल में भर दिया गया है.

दुनिया भर में सम्मानित लोग अगर देश में प्रताड़ित महसूस करने लगें तो आपको देश के बारे में फिर से सोचने की जरूरत है.

जिस देश में विचारक, बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार और असहमत लोग सुरक्षित नहीं हैं, वहां लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता. असहमति को कुचलने की शुरुआत ही एक क्रूर तानाशाही की बुनियाद है.

(कृष्ण कांत की वाल से)

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