विचार-मंथन : दशकों से योजनाओं में स्वास्थ्य मात्र फुटनोट बना रहा

-एन के सिंह
लेख

सोशल मीडिया पर एक फोटो है जिसमें बिहार के एक गाँव में स्वास्थ्य उप-केंद्र का कटा-फटा बोर्ड लगा है और वहाँ कुछ जानवर बंधे हैं. यह उप-केंद्र यहाँ पिछले ३० वर्षों से है. आधा दर्जन से ज्यादा बार देश और राज्य की सरकारें यहाँ की जनता ने चुनीं, कई बार अपना ग्राम-प्रधान, ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत चुना लेकिन इस केंद्र की बदहाली, डॉक्टर या दवा का न उपलब्ध होना, शिक्षक का स्कूल में न आना, दवा और बच्चों के हित के लिए आये सरकारी इमदाद की बंदरबांट कभी भी मुद्दा नहीं बना. उत्तर भारत के किसी अन्य गाँव की भी कमोबेश यही स्थिति है. देश की राजधानी से सटे गाज़ियाबाद के पॉश इंदिरापुरम इलाके में भी एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है लेकिन वह एक गाँव के छोटे से मकान में है जहां जाने का रास्ता दुर्गम है. अभिजात्य वर्ग इस केंद्र को निम्न-स्तरीय मानते हुए नजरअंदाज करता रहा है और ग्रामीण समाज आज भी राज्य की भूमिका दंडात्मक से ज्यादा कुछ नहीं मानता. जिस गाँव में यह केंद्र है वहाँ की ग्रामीण जमीन तगड़ा मुआवजा पा कर करोड़पति बन गयी लेकिन उनकी प्राथमिकता इस केंद्र को बेहतर करने या इसे सामुदायिक केंद्र में उच्चीकृत करवाने में नहीं रही. नतीजतन थाने की तो अपनी बिल्डिंग है लेकिन पीएचसी किराये पर घिसटता चल रहा है. यही हाल सरकारी स्कूल का भी है. सरकारी योजनाओं मे कागजों पर जारी त्रि-स्तरीय चिकित्सा सेवा के तहत देश भर में डॉक्टरों की नियुक्ति तो है पर वे छठे-छमाही दर्शन देते हैं बाकि टाइम घर पर प्रैक्टिस करते हैं. याने सरकार की पगार भी बगैर काम के और प्रैक्टिस का आय पर कोई टैक्स नहीं.
कोरोना की दूसरी लहर की विभीषिका पहली से भी ज्यादा रही है और तीसरी की दहशत दिलो-दिमाग को कुंद कर रही है. स्थिति यह है कि पूरे भारतीय समाज सामूहिक अवसाद के नए खतरे से दो-चार होना पड़ सकता है. पहली लहर के बाद कहाँ चूक हुई, किससे हुई, अब क्या करें कि यह स्थिति दुबारा न आये आदि सवाल जन-विमर्श पर तारी हैं. लेकिन कब तक? क्या ७० सालों में तिल-तिल कर अपने नौनिहालों को बौना/नाटा (स्टंटेड), कमजोर (वेस्टेड) और मरते (इन्फेंट मोर्टेलिटी) देख हमें चार पीढ़ियों बाद भी समझ में आया था कि असली जनमत का दबाव केवल सरकार की इस कल्याणकारी भूमिका पर होनी चाहिए? क्या हम समझ सके कि सत्ताधारी दल द्वारा दी गयी सेवाओं में किसी भी किस्म की कोताही उसे अगली बार ठिकाने लगाने का सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए? हम धर्म, जाति, उपजाति, भाषा, क्षेत्र के आधार पर बंटते रहे. नतीजा यह रहा कि स्वास्थ्य पर कुल सरकारी खर्च जीडीपी का मात्र एक प्रतिशत रहा बाकि तीन प्रतिशत हम अपनी जेब से खर्च कर गरीबी की गर्त में बार-बार गिरते रहे. इस वर्ष के ३६५ पृष्ठ के आर्थिक सर्वेक्षण (भाग-२) में जहां उद्योग के लिए ४२, कृषि के लिए २७ और सतत विकास एवं जलवायु के लिए २० पृष्ठ समर्पित थे वहीँ स्वास्थ्य एक अध्याय न होकर “सामाजिक अंतरसंरचना, रोजगार और मानव विकास” शीर्षक अध्याय में केवल चार पृष्ठों में और शिक्षा छः पृष्ठों में सिमट गया. स्वास्थ्य और शिक्षा को सरकारों द्वारा नजरअंदाज करने का यह सिलसिला आज़ादी के बाद से हीं शुरू हो गया था. इसका कारण सरकार से ज्यादा हम स्वयं रहे.
भारत आज़ाद हुआ तो तत्कालीन नेताओं ने समानता का यूरोपीय वैल्यू लिया जिसमें हर नागरिक का वोट सामान होता है जबकि भारतीय समाज कई स्तर भर उर्ध्वाधर और सामानांतर तौर विभाजित था. देखने में यह अच्छा लगता है पर भारत के लिए व्यावहारिक नहीं था. अभिजात्य वर्ग के प्रभाव नीचे के तबके ने या तो उदासीनता दिखाई या स्वयं भी धीरे से अपना रास्ता सामाजिक बराबरी के उचित मार्ग को छोड कर वैयक्तिक स्वातंत्र्य को ओर कर लिया. जो दबाव प्रेमचंद के गोदान के साहूकार मातादीन से लेकर होरी तक को सामूहिक रूप से इस उप-प्राथमिक केंद्र में सुविधाएँ उपलब्ध करने में लगानी थी वह “उसकी जाति की पार्टी” और “अपनी जाति का नेता” में लग गयी. नतीजा हुआ पीएचसी में डॉक्टर तो है पर वह फ़ोन पर केवल मातादीन और मेहता साहेब को दवा बताता और देता है. इन ७० सालों में आर्थिक मॉडल ऐसे आये जिससे गरीब-अमीर की खाई बढ़ती गयी और आज एक प्रतिशत उपरी वर्ग के पास देश की ७० संपत्ति है और लॉकडाउन काल में भी एक उद्योगपति की संपत्ति ९० करोड़ प्रतिघंटा की रफ़्तार से बढ़ती रही. हम इस बात पर खुश होते रहे कि जीडीपी वॉल्यूम में हम दुनिया के देशों में पांचवें स्थान पर हैं जबकि सच बात यह है कि मानव विकास सूचकांक में हम पिछले ३० सालों में मात्र चार खाने बढे हैं और तमाम कमजोर देश हमसे आगे हो गए हैं.
सामान्य अवधारणा है कि सरकारें अपने बजट में अधिक खर्च का प्रावधान करें तो देश की जनता का स्वास्थ्य बेहतर होगा और नौनिहालों की शिक्षा अच्छी होगी. लिहाज़ा जब भी चमकी बुखार से १००-२०० बच्चे मरते हैं, मस्तिष्क ज्वर किसी तराई के इलाके में सैकड़ों को लीलता है या कोरोना की लहर देश भर में कहर बरसाती है तो पूरे देश में एक्सपर्ट्स स्वास्थ्य के मद में प्रति-व्यक्ति खर्च की चीन से तुलना कर सरकारों की गलती बताते हैं और जनाक्रोश कुछ दिन परवान चढ़ता है. जब एम्बुलेंस के अभाव में एक पत्नी बीमारी से मरे अपने पति को ठेले पर ले कर जाती है या ऑक्सीजन की तलाश में बाप बेटे की लाश पर अस्पताल के सामने धाड़ मार कर रोता है तो टीवी ज़माने में विजुअल इम्पैक्ट पड़ता है और जनता कुछ समय के लिए सरकार से नाराज होती है लेकिन फिर जब टीवी पर कोई बड़े हीरो का शो या क्रिकेट मैच आने लगता है तो बिहार का स्वास्थ्य केंद्र उसी उदासीनता की भेंट चढ़ जाता है. फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है क्योंकि हम आदतन सरकारों की क्षमता को इस तराजू पर तौलते हीं नहीं. इसका कारण यह नहीं है कि हम स्वास्थ्य या शिक्षा नहीं चाहते बल्कि यह हमारी सोच में प्राथमिकता पर नहीं रहता. राज्य को हम आज भी पुलिस के डंडे की ताकत से नापते हैं. उसकी कल्याणकारी भूमिका दंडात्मक-शासकीय भूमिका से बड़ी है यह बात आज ७० साल बाद भी हमारे मन-मस्तिष्क पर असर नहीं डाल सकी है.
स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों से दशकों से यह साफ हो गयी कि उन राज्यों में बाल म्रत्यु दर कम हैं जहां प्रति हज़ार आबादी डॉक्टरों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा है. उदाहरण के लिए बिहार और मध्य प्रदेश में कम डॉक्टर हैं लिहाज़ा बाल-मृत्यु दर ज्यादा है जबकि केरल, तमिलनाडु में स्थिति ठीक उल्टी है. चूंकि भारत में निम्न जाति के लोग आर्थिक रूप से भी पिछड़े हैं लिहाज़ा स्वास्थ्य सेवायें का अभाव सबसे ज्यादा उन्हें प्रभावित करता है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (४) में बताया गया एक एक कटु सत्य देखें: पांच साल की आयु से कम में हीं मरने वाले बच्चों का प्रतिशत एससी वर्ग में ५५.९ है, एसटी में ५७.२, ओबीसी में ५०.८ लेकिन अन्य में (याने उच्च जाति वर्ग में) ३८.५. आर्थिक रूप बनाये गए पांच आय वर्गों में देखा जाये तो सबसे निम्न आय वर्ग में यह प्रतिशत ७१.७ है जबकि सबसे ऊपर के आय वर्ग में मात्र २२.६.
सवाल कोरोना की तीसरी लहर में केवल सरकार से स्वास्थ्य अंतरसंरचना पर खर्च बढ़ने के इसरार की हीं नहीं बल्कि जो सेवाएं हैं उन्हें सरकारी कर्मियों के भ्रष्टाचार, लापरवाही का शिकार न बनाने दें. ऑक्सीजन और रेम्डीसिविर मंत्री, समाजसेवियों और डीएम के घर बरामद होने की जगह एक ऐसे चैनल में होना चाहिए जो अभेद्य हो.

(लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी »