पूरबिया कहानी-काला जादू कुछ और नहीं, बंगाल के स्त्री सौन्दर्य का मोहपाश और पूरबिया स्त्री-मन का भय था..!

@ अरविंद सिंह

{पूरब की जवानी- पूरब का पानी- पूरब की कहानी- भाग-3}

“रेलिया ना बैरी, जहजिया ना बैरी,
इहे पैइसवा बैरी ना..
देसवा-देसवा भरमाए
इहे पैइसवा बैरी ना..! “
रेल और जहाज कभी इंसान की बैरी नहीं रहीं हैं बल्कि ये यातायात के सुलभ साधन थें और हैं, जो यात्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लेकर जातें हैं. लेकिन पूरब की डरी सहमी स्त्री और उसका मन अपने प्रिय के दूर देस जाने और विछोह के दर्द को भोगने की असीम पीड़ा को सहन नहीं कर पाता है. वह उसके प्रियतम को उससे दूर लेकर जाने वाली इस रेल और जहाज को भी अपनी सौतन मान बैठती और कहने लगती है कि- “रेलिया बैरन पिया को लिए जाए हो.. रेलिया बैरन..! ”
जबकि हकीकत यह है कि रेल कभी बैरी नहीं थी, बल्कि उसके लिए बैरी पैसा था और है, जिसको कमाने के लिए उसका पति सुदूर महानगरों की ओर जाता है. घर की गरीबी और मुफलिसी के चक्की में पिसते जवां अरमानों को मारकर भी घर का मर्द कलकत्ता, बंबई और झरिया जाता है. बूढ़े माँ बाप के सहारे जवान और नवविवाहिता पत्नी को छोड़ जब रेल में बैठता है तो उसको गांव-घर और परिवार की याद आने लगतीं हैं. खेत-खलिहान, बाग-बगीचे और अपने पशुओं को याद करने लगता है और इन्हीं स्मृतियों में डूबे, रेल हर पल उसको परिवार से दूर ले जाती है. इधर घर पर पत्नी विरह-व्यथा को हर पल भोगने के लिए अभिशप्त हो जाती है.
दरअसल रोजी रोटी के लिए यह पलायन या विस्थापन समाज की आदिम प्रवृत्ति है. यात्राएं और सामूहिक यात्राएं हमारी सभ्यता और संस्कृति की विकास के सोपान रहे हैं, ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति की वाहक रही हैं. लेकिन जब आदमी अपनी माँ-माटी और स्त्री से बिछोह कर दूर देस कमाने के लिए जाने लगता है तो उसका देस जैसे छूटने लगता है.
पूरब का यह सदियों-सदियों से भोगा गया यथार्थ है. समाज के मानस में बैठा जैसे पीढ़ियों से चला आ रहा यह आदिम भय है कि- ‘अमूक गांव से कलकत्ता कमाने गयें मर्द वापस कभी नहीं आए, बल्कि वहीं जाकर बस गये, कारोबार बढ़ा लिया, पैसा कमा लिया, और उसी के साथ दूसरी बंगालन औरत कर, परिवार बसा लिया, जबकि गाँव की पहली ब्याहता जिसको जीवन भर साथ निभाने का वायदे के साथ लाया था, जीवन भर इंतजार करती रही.इस अंतहीन इंतजार में बूढ़ी हो गयी और एक दिन इंतजार करते-करते मर गयी. मुखाग्नि भी पति के हाथों नसीब नहीं हुआ.’
यह पूरबिया और उत्तर मध्य भारत के सामाजिक जीवन का मिथकीय कहानी भर नहीं है बल्कि भोगी और जी गयी हकीकत है, जिसको लेकर पूरब की आधी आबादी जब भी कोई परदेस कमाने के लिए जाने वाला होता है तो संशय और भय के आगोश में मन ही मन भयभीत हो अपने नियति पर सवाल करती है. उसका यह भय यथार्थ भी और पूरब के सामाजिक और पारिवारिक जीवन का स्याह पक्ष भी. पूरब की पहाड़ सी गरीबी, दाम्पत्य जीवन के रस को सुखा कर, उस एकाकी और नैराश्य जीवन को ही पहाड़ बना देती है.

सदियों से चली और रही और इस सदी के साठ के दशक तक उत्तर- मध्य भारत के गाँवों में यह मिथक था कि- कलकत्ता में काला जादू चलता है. बंगालन औरतें इस जादू से प्रवासी कामगार मर्दों को अपने वश में कर लेती हैं. और उन्हें जो खुबसूरत लगता है उसे सुग्गा( तोता) बना कर पिंजरे में कैद कर देती हैं, फिर वह चाहकर भी आजाद नहीं हो पाता है. घर गांव तो दूर की बातें हैं. बंगाल का काला जादू का आतंक उत्तर मध्य भारत के गांवों में स्त्रियों और बुजुर्गों-महिला-पुरुषों में बहुत दिनों तक बैठा रहा. जिसकी अनुगूँज आज भी कभी-कभार सुनने को मिल जाता है. यह एक अनजाने भय से भयभीत गाँव में सामूहिक चर्चा का विषय आज भी बन जाता है. तो घर की दादी और नानी इस काले जादू को कहानियों में स्त्री मन के भय को बड़ी तन्मयता से सुनाती हैं.
सोनी-बृजभान,और रानी सारंगा की कहानियों के देस में बंगाल के ‘काला जादू’ पर मिथकीय ज्ञान हमारी ना जाने कितनी पीढ़ियों के मानस वाहक बन इसे श्रुति परंपरा में आज तक ढोते आये हैं.तो फिर सवाल उठता कि बंगाल का वह काला जादू क्या था- उसकी हकीकत क्या थी. कैसे किसी को सुग्गा बना कर पिंजरे में कैद कर रखने की कला में पारंगत थीं बंगाल की खुबसूरत औरतें.
दरअसल बंगाल का काला जादू कुछ और नहीं उत्तर मध्य भारत और विशेषकर पूरबिया स्त्रियों के मन में बैठा वह भय था, जिसमें उनके पति कमाने के लिए बंगाल गए. घर पर मनी आर्डर भेजते रहे लेकिन खुद वापस कभी घर नहीं आए बल्कि बंगाल के काले( सांवले) सौन्दर्य के मोहपाश में फंसकर वहीं के होकर रह गयें. बंगालन औरतों से शादी कर घर बसा लिया. धीरे-धीरे गाँव घर माँ- बाप और पत्नी- बच्चे को भी भूल गए. चिठ्ठी पत्री भेजने का क्रम कम होता गया और धीरे-धीरे बंद हो गया. भिखारी ठाकुर का विदेसिया की कथावस्तु उत्तर मध्य भारत और विशेष कर पूरब के लगभग हर घर की कहानी है.
कमाने गया पुरुष नगर में चाकरी करते हुए अपने शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए विकल्प तलाशने लगा. पैसा उसके इस विकल्प की तलाश में सहायक बना. और एक दिन वह स्थायी विवाह बंधन में बंध गया. गांव और नगर के परिवार के बीच सामंजस्य बैठाने के प्रयास में वह दो पाटन के बीच साबित बचा ना कोय की स्थिति को प्राप्त होने लगा. दूसरी ओर स्त्री मनोविज्ञान इंतजार करते करते गांवों में भी विकल्प की तलाश करने लगा. और विवाहेत्तर संबंधों को जमीन तैयार होती चली गयी.
महान मनोवैज्ञानिक फ्रायड कहते हैं कि- दुनिया की सारी संघर्ष और समस्या का कारण स्त्री है. वही मार्क्स इसके लिए धन को कारण मानते हैं. दरअसल दोनों विद्वान आधा-आधा सत्य बोलते हैं. और दोनो महान विद्वानों के आधे-आधे सत्य को मिला दिया जाए तो एक पूरा सत्य निकलता है कि-‘दुनिया की सभी समस्याओं के मूल में स्त्री और पैसा है’
यही पैसा आदमी के लिए बैरी बन जाता है. उसके प्रेम और दाम्पत्य जीवन के लिए बाधक बन जाता है. तो लेकिन विरहिणी स्त्री रेल और जहाज को सौतन और बैरी मान बैठती है.

क्रमशः
(पूरब की जवानी– पूरब का पानी– पूरब का पानी- भाग-3)

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