वो गांव! तुझे बुला रहे हैं!

जी हाँ!ऐ गांवों से नगरों और फिर नगरों से महानगरों की ओर जाने वालो, तुम्हारे गांव अब तुझे बुला रहे हैं। तुम्हारे गांव का वो बूढ़ा बरगद जिसकी छांव में तुने ना जाने कितनी दुपहरी बिताये थे। पोखरे की वो छपाकछप, बागों के वो टिकोरे,अमराईयों की वो ठंडी छांव और उस छांव में वो गुल्ली- डंडा और चिकई का खेल, वो सरपट भागती पगडंडियां अब तुझे बुला रही हैं। वो मलाईदार कुल्फी और रिकार्डरों से बजते पुराने गानों की मधुर स्वर लहरिया, वो डीह बाबा की पूजा और वो महिलाओं का समूहगान,वो सोहर के गीत तुझे बुला रहे हैं। वो हीरा मोती की जोड़ी और वो पशुओं का मेला, वो रानी सारंगा और सौडी बृजभान की कहानी, दादी और नानी की जुबानी रातों को सुनना और सुनते सुनते सो जाना, वो काका की फटकार और काकी के हाथों नाद की दही का स्वाद एक बार फिर तुझे बुला रहे हैं।”
दरअसल, ये शब्दचित्र भर नहीं हैं बल्कि इसमें निहित पैगा़म गांव की उस सौंधी माटी से आ रहें हैं, जिसके जीवन रस को हमारी पीढ़ियों ने कभी न कभी, न केवल महसूस किया होगा बल्कि जीया भी होगा।
देश में उदारीकरण के बाद जिस तरह से हमारी सोच-संस्कृति और ध्येय में बुनियादी अंतर आने लगा, उसका असर उस गांव पर भी पड़ने लगा, जो गंभीर चरित्र का था। सच कहें तो इस मायाजाल से गांव की बसावट और बुनावट में भी बुनियादी फर्क आने लगा, हमें पता ही नहीं चला कि दबे पांव हमारे गांव बदल रहें हैं। गांव का मिज़ाज और उसकी मौलिकता भी बदल रही है। जिन नगरों की चकाचौंध और नागर जीवन को अतीत में गांव, हेय दृष्टि से देखता चला आया था, समय और बाजारवादी संस्कृति के दबाव में वही नगरी सभ्यता, उसके आदर्श और मानक बन जाएंगे। उसकी विकासयात्रा का पडाव शहरीकरण का अन्धानुकरण हो गया। यह किसी ने कल्पना तक नहीं किया था।लिहाजा इस अंधदौड़ में गांव तो शहर बन नहीं पाये लेकिन गांव भी, अब गांव नहीं रह पाये । वह नगर और गांव के बीच की विकास-यात्रा के ऐसे लक्ष्यहीन प्रतीक बन गयें, जो गांव का कभी सपना ही नहीं था। जैसा बनने के लिए गांवों ने कभी सोचा भी नहीं था। आज गांव बदलते बदलते इतने बदल जाएंगे कि उसकी मूल प्रवृत्ति और वृत्ति भी बदल जाएगी। यह एक भयावह दृश्य है। जिसे बदलने की जरूरत है। गांव को, वही मौलिकता और भदेसपन, वही मिज़ाज और अल्हड़पन की ओर मुड़ना पड़ेगा। तभी गांव बचेगा और उसकी संस्कृति बचेगी।
सच कहें तो ये बाते इस लिए कह रहा हूँ। क्योंकि किसी ने अपने गांव को बनाने का सपना देखा था, किसी ने उसे बदलने का बीडा उठाया था, किसी उसे नया स्वरूप देने का दृढ़ निश्चय किया था और वह इस अभियान में सफल हुआ है। वह इस सामाजिक अनुप्रयोग को कर दिखाया है और उसका गांव अब वादरहित है, विवाद रहित है और इस गांव की ईट भटठे पर काम करने वाली सबसे कमजोरी और दलित महिला की बेटी भी कोर्पोरेट जगत की बड़ी कंपनी में जाब करती है। गरीब बच्चों में डाक्टर और इंजीनियर बनने की होड़ है। लोग बदल रहें हैं, लोगों का परिवेश बदल रहा, लोगों की सोच बदल रही है, गांव के बाहर गये लोग जो डाक्टर, इंजीनियर, अफसर, व्यापारी थे, जिन्होंने नगरों को बनाया,वे अब अपने गांव को बनाने की ठान लिए हैं। और इस परिवर्तन के सूत्रधार बने एनपी सिंह जो कभी ग्राम्य विकास आयुक्त थे, तो कभी मनरेगा के निदेशक थे तो कभी कलेक्टर थे। जो एक बार फिर कलेक्टर बन कर आजमगढ़ आए हुए हैं और अपनी सोच से अपने पैतृक गांव के परिवेश को बदल चूकें हैं। और इस विचारधारा का विस्तार करना चाहते हैं। उनके विस्तार की भूमि अब केवल उनका गांव नहीं रहा, बल्कि वह आजमगढ़ को भी अपने उस प्रयोग की नई जमीन बनाना चाहते हैं। वे आजमगढ़ के बाहर गये प्रवासियो और बुद्धिजीवी यों को एक बार फिर आजमगढ़ अपने गांव की ओर जोड़ना चाहते हैं। वे कहते हैं कि ‘आप जिस गांव की सौंधी माटी की सुगंध लिए, जिस बरगद के पेड़ के नीचे खेले, जिन पगडंडियों पर चले वे गांव अब आप को बुला रहे हैं’ आप के ऊपर मातृ-पितृ ऋण के साथ ग्राम ऋण भी है उसे चुकाइए। और अपनी नगरीय जीवन से कुछ समय अपने गांव को भी दीजिये। आप के छोटे छोटे प्रयासों से आप गांव फिर बदल जाएगा। फिर हीरा मोती और अमराईयों का गांव बन जाएगा। कल कलेक्टर से मुलाकात में जब ये बातें हो रही थीं तो मानो वह दृश्य दिखाई हमारे अतीत से वर्तमान में प्रवेश कर रहा था, जो हमने, हमारे बचपने में जीया और महसूस किया था। क्या यह प्रयोग एक बार फिर सफल हो सकता है ।मन ही मन सोच रहा हूँ। यह अलग बात है कि नये कलेक्टर प्रयोगधर्मी हैं और आजमगढ़ के लालों को एक बार एक मंच पर लाना चाहते हैं।सम्मान करना चाहते हैं और अपनी मिट्टी से जोड़ना चाहते हैं।

अरविंद सिंह-(WRITER)

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