खेत खाय गदहा- मारल जाय जोलहा

चमकी बुखार किसे आ रहा है ? 
जो बच्चे कुपोषण और भूख के शिकार हैं।
इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं?
जिनके हाथ में सूबे और केंद्र का निजाम है या रहा है।
और ठुमुक ठुमुक कर पूछा किससे गया?
आई सी यू से, डॉक्टरों से।
कबीर दास ने कहा है या नहीं कहा है, मैं नहीं जानता लेकिन मुजफ्फरपुर में हुई कल की एक गपशप बैठक में कबीर दास के हवाले से एक डाक्टर ने कहा,
कहे कबीर कि दुनियाँ खोटा/हगे गां.. मजाए लोटा
मैंने कहा कि इसमें ठुमकने वालों का क्या दोष ? उन्हें तो उनके संस्थानों ने कहा होगा जो सब के सब निजी हाथों में हैं जिन्हें आजकल बीमार भारत के उपक्रमों का इलाज माना जा रहा है। डाक्टर साहब रुके नहीं। इस बार उन्होंने महाकवि तुलसीदास के हवाले से कहा,
जब गां.. में नहीं था गूदा/तो क्यों लंका में कूदा।
मेरे पास इन दोनों का कोई जवाब नहीं था। मुस्कराकर टाल गया, इस आग्रह के साथ कि सन्त कबीर और महाकवि तुलसीदास का नाम इन दोहों से अलग कर लीजिए। वर्तमान के अपमान की सजा अपने सन्त साहित्य के स्वर्णिम अतीत को क्यों ? डाक्टर साहब ने कहा कि आपका संशोधन स्वीकार। अब आप भी इस विषय पर कुछ कहिए।
मैंने कहा, ” खेत खाय गदहा-मारल जाय जोलहा।” अपने देश की यह कहावत बहुत पुरानी है। फिर सभी लोग विदा लिए और अपने अपने काम में लग गए। बिहार की यही विशेषता है कि वह रोज विषम परिस्थितियों से जूझता रहेगा, लेकिन चलता रहेगा।
उसकी यही चलते रहने की आदत उसे चाँद पर भी परीक्षा हो तो उसे जीत लेने का साहस प्रदान करती है। इसी के बल पर वह जीतता भी है जिसे देखने के लिए मैं जब भी अवसर मिलता है और अनुज, मित्र श्री रंजन कुमार की उपलब्धता रहती है तो मुजफ्फरपुर आ जाता हूँ।
          पहले बाबा गरीबनाथ को नमन करता हूँ, फिर जो मिले उसे बाबा की कृपा मान ग्रहण कर लेता हूँ। 28 जून को इस गपशप की शुरुआत सुबह आने के साथ ही शुरू हो गई। शुरुआत कराई श्री नीरज श्रीवास्तव ने जो श्री राजेश श्रीवास्तव, श्री उदय झा, डाक्टर अरविंद कुमार, डाक्टर अभय झा, श्री वीरेंद्र पांडेय, श्री प्रियरंजन, श्री मनीष कुमार  सिंह की सस्नेह मुलाकातों के बीच श्री रंजन कुमार जी की देखरेख और दि पार्क के स्नेह से चलती रही। पता नहीं चला कि कब रात हो गई।
इस दौरान पत्रकार, शायर भाई नदीम खान जो स्नेह दिया, उसकी कल्पना भी नहीं थी। खुद दुखी होने के बाद भी पत्रकार विनय पाण्डेय मेरे स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहे। आज 29 जून को सांयकाल भाषाई सौहार्द के लिए दिन रात जूझ रहे नामचीन शायर और संचालक डाक्टर शकील मोईन पहुँचने वाले हैं। फिर उन्हीं के साथ 30 जून को पटना। वहाँ से एक जुलाई को गाज़ीपुर, खेत खाने वाले गदहे या गदहों को कोसते हुए।
-धीरेन्द्रनाथ श्रीवास्तव रुम नम्बर 126,दि पार्क, मुजफ्फरपुर, बिहार।
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