डाक्टर कफील की सेवा, जुगाली राष्ट्रवाद के कोरे भाषणों से बड़ा देशप्रेम है..

@अरविंद सिंह

जब मुजफ्फरपुर बच्चों की मौतों का मज़ार बनता जा रहा था, जब देश में लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर, ‘संसद’ 17वीं लोकसभा की शपथ ले रही थी। जब भारत सरकार के मंत्री बच्चों की लगातार हो रही मौतों पर जुमलेबाजी कर रहे थे। जब सूबे का मुख्यमंत्री और बिहार का सुशासन बाबू घातक लापरवाही तक चुप्पी साध लिया था। जब प्रधानसेवक का इन बेमौत मरते बच्चों पर एक ट्वीट तक नहीं आया, जब आईएमए मौत की गिनती कर रही था। जब बिहार का हेल्थ सिस्टम, बालू की दीवार की तरह, चरमरा कर गिर पड़ा था। जब मासूमों की किलकारियां मौत की आगोश में दम तोड़ती जा रही थी

तब गोरखपुर से एक नौजवान चिकित्सक उन दम तोड़ते नौनिहालों और माँओं की आह! सुन, मुजफ्फरपुर निकल पडा़। यह बगैर सोचे की बिना दवाईयों के बच्चों की जाने कैसे बचायी जाएगी। उसने अपने अन्तर्रात्मा की आवाज़ सुनी और पेशे की ईमानदारी ने उसे मुजफ्फरपुर पहुंचा दिया। उसने यह कभी नहीं सोचा की वह गोरखपुर मेडिकल कॉलेज का एक निलंबित डाक्टर है और उसकी सेवाएं इसी परिक्षेत्र के लिए है।
नाम है डा०कफील खान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शहर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज का सरकारी मुलाजिम है, जिसे पिछले साल जापानी इन्सेफेलाइटिस से गोरखपुर में मर रहे बच्चों के लिए बलि का बकरा बना दिया गया। लेकिन डाक्टर कफील एक एक्टिविस्ट हैं और अन्तर्रात्मा की आवाज़ सुनते हैं। यही आवाज़ और बच्चों की मौतें तथा परिवारों की चित्कारें उन्हें मुजफ्फरपुर खींच लायी।

एक मिशनरी डाक्टर की तरह गाँव गाँव में घुमकर कैंप लगाना शुरू किया और देश-परदेश में संवेदनशील लोगों से सोशल मीडिया के माध्यम से दवाईयों और जरुरी सामानों के लिए अपील करना शुरू। परिणाम यह निकला कि देशभर से दवाईयों और जरुरी सामानों की खेप आने लगी। कोई जहाज से दवाईयां भेजने लगा तो कोई ट्रेन से। डाक्टर कफील एक गांव से दूसरे गांव और फिर तीसरे,चौथे,पांचवे करते हुए लगातार 12 दिन में 15कैंप लगाकर मुजफ्फरपुर, चंपारण,बैशाली,सीतामढ़ी सहित अनेक क्षेत्रों में 4200 से अधिक बच्चों तक पहुँचे और इस जान लेवा चमकी बुखार से ना जाने कितने बच्चों की जाने बचायी।

 

यही नहीं इनकी इस मिशनरी सेवा से प्रेरित होकर,कई राज्यों से समाजसेवी चिकित्सक पहुंचने लगे। उनकी सोशल मीडिया पर इस अपील का, कि ‘यहाँ डाक्टरों की बहुत कमी है।’ उत्तराखंड समेत अन्य जगहों से निस्वार्थ सेवा के लिए डाक्टर पहुंचने लगे। परिणाम यह निकला कि 29 जून को सीतामढ़ी में आखिरी कैंप था कारण, योगीराज ने उन्हें परवाना जारी कर गोरखपुर बुलावा भेजा है। हांलाकि बरसात शुरू हो जाने और लगातार सेवा का परिणाम यह निकला की बच्चों की मौतों का सिलसिला थमने लगा और और उनकी संख्या में भारी कमी होते हुए दो तीन पर जाकर रूक गया है।
दो सौ से अधिक बच्चों की जान ले चुका चमकी बुखार ने सुशासन बाबू के सुशासन की पोल खोल दी। वहीं भारत सरकार की दावों की हकीकत सबके सामने लाकर रख दी। सबसे बड़ी बात की मुख्यधारा की बहुतेरी मीडिया संस्थानों की सत्ता तिमारदारी भी खुल कर सामने आ गयी। डा०कफील एंड टीम ने मर चुके बच्चों की आत्मा की शांति के लिए आखिरी दिन, शाम को एक कैंडिल मार्च भी निकाली। और उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नोटिस का जवाब देने गोरखपुर निकल गये।

डाक्टर कफील ने सच्चे मायने में ऐसे समय में इंसानियत की सेवा की जब लोग सत्ता की चाकरी में दंडवत हो चुके हैं। राग दरबारियों की पूरी जमात देशभर में तैयार हो चुकी है और राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलायी जा रही है। ऐसे समय में कफील की सेवा किसी कोरे जुगाली राष्ट्रप्रेम से कहीं बड़ा राष्ट्र प्रेम और देशप्रेम है। जिसे हर चिकित्सक और पेशेवर को सिखना चाहिए।”

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