क्या स्लीपर वाले इंसान नहीं होते…?

  1. #सफर

-कुलीना कुमारी

बढ़ती महंगाई को देखते हुए व बचत करने के ख्याल से इस बार छोटे भाई की शादी में अपना गांव बिहार जाने के लिए मैंने स्लीपर से जाना तय किया। पति ने बहुत रोका स्लीपर का टिकट काटने के लिए, लेकिन चूंकि बेटा भी साथ जा रहा था तो दो आदमी में दिक्कत कम होगी, यह सोचकर मैंने स्लीपर का टिकट काट लिया।
लास्ट मूवमेंट पर टिकट कटाने की वजह से पति ने एक रेलवे अधिकारी मित्र के सहयोग से कल 6 तारीख का टिकट कनफर्म भी करा दिया।

दिल्ली से जयनगर तक जानेवाली स्वतंत्रता सेनानी जब नई दिल्ली स्टेशन पर आयी, मन में बैठा हुआ था कि कही स्लीपर वाले बोगी में भीड़ ज्यादा न हो तो बिना सबके जाना का वेट किए हम भी जल्दी जल्दी अपनी सीट पर पहुंच जाना चाहते थे ताकि हमारी सीट पर दूसरे लोग हक से न बैठ जाय और हमारी सीट हमें ही बैठाने से इंकार कर दें।

जैसे ही गेट पर हम एंट्री किए, शौचालय के बाहर तक लैट्रिन का निशान दिखाई, दुर्गंध इतना ज्यादा कि अपने सीट पर बैठने के बाद भी दुर्गंध आ रहा था। तब महसूस हो रहा था कि पति ने बताया तो ठीक था कि स्लीपर से नहीं जाना चाहिए मगर पुनः दूसरा मन कहा, ” क्या स्लीपर वाले इंसान नहीं होते, उन्हें स्वच्छता व सुविधाएँ नहीं चाहिए क्या?”
खैर, दूर्गंध के साथ यह भी देखा कि हमारे साथ-साथ कुछ अन्य हिस्से में भी लाइट नहीं थी।

यद्यपि दिल्ली में करीब 8:०5 पर स्वतंत्रता सेनानी लग गयी थी व खुली थी, 8:43 पर, मात्र 3 मिनट लेट लेकिन कोई सफाई कर्मी आकर शौचालय साफ नहीं किया, उसके बाहर का हिस्सा भी नहीं, जहाँ गंदगी गेट तक फैली हुई थी।

कैटरिंग सर्विस वाले से मैंने इस सबकी शिकायत की तो उसने कहा, बिहार वाले ट्रेन इस स्वतंत्रता सेनानी का 15 दिन से यहीं हाल है, न बल्ब ठीक कराया गया, हमारे हिस्से का एक पंखा भी खराब…शौचालय भी साफ नहीं और पानी भी नहीं.. अगर कुछ करेगा तो टीटी से शिकायत करें, वहीं कुछ करवा सकता है।

हम टीटी का इंतजार करते रहे। लेकिन इतने कम समय में ही स्लीपर की जो दुर्दशा बेटा ने देखा, उसने तुरंत वापसी का स्लीपर टिकट कैंसिल कर‌ने के लिए कह दिया और फिर एसी का बनवाया।

इससे पहले खाना order लेने वाला आया, उससे जब मैंने खाने के प्लेट का दाम पूछा तो उसने वेज फूड का 130 बताया, तब हमने उसे रेलवे द्वारा दिए खाना का रेट दिखाया तो मुझसे वह 50 रु. प्रति प्लेट देने की सहमति देदी। इसमें तो जरा सुविधा हो गयी। हां खाना आने पर मोबाइल की लाइट जलाकर हम मां-बेटा खाना खा पाए। हां, स्लीपर में आने की आदत नहीं होने की वजह से हम सीट पर खाना रखने के लिए अखबार ही नहीं लाए, चादर भी नहीं क्योंकि यह सब कुछ सालों से आदत में शामिल नहीं थी। खाना सर्विस देने वाला भी नैपकिन देने की जरुरत नहीं समझा, शायद सोचता होगा, या तो स्लीपर वाले खुद इंतजाम रखते होंगे या फिर इनकी हैसियत ही नहीं कि नैपकिन यूज करने के लिए दिए जाय। खैर खाना अच्छा नहीं था, चार पूरी मोटी मोटी, दाल और एक सब्जी-भात भी अच्छा नहीं । आचार, जरा पापर करीब खाना खत्म होने के बाद दिया। जैसे तैसे खाना खाने के बाद हम सीट को रुमाल से साफ कर बैठने लेटने की व्यवस्था बनाए।

हां काफी देर से टीटी का इंतजार कर रहे थे, वे आए तो कुछ का चेक करने के बाद जैसे ही मेरे से बात करने को हुए, मैंने गंदे शौचालय व पानी नहीं होने की समस्या रखी। साथ ही कहा कि मेरा टिकट head office से confirm हुआ है, आप इन समस्याओं को ठीक कराइए वरना ऊपर तक शिकायत कर सकती हूं।

पहले तो वह कहा कि बहुत से आम आदमी का टिकट Head office से confirm होता है, क्या सबको सुनूं?

किंतु जब मैंने कहा कि मैं महिला अधिकार अभियान से हूं, व्यवस्था ठीक कराइए तब वह थोड़ा और गंभीर हुआ और कहा,” मैं आपके सामने आगे तक बात रख देता हूं, बाकी वो लोग जो करें!” और हम सभी के सामने उन्होंने कंट्रोल रूम अथवा संबंधित अधिकारी को फोन किए और बताया,” S-3 में गंदगी भी है व पानी भी नहीं..! आगे आने वाले स्टेशन पर इंतजाम कर दें।” हमलोगों का टिकट चेककर व ऊपर तक हमारी समस्या पहुंचाकर टीटी तो चला गया।

किंतु जरुरतवश रात में एक बार वाशरुम गयी थी मैं, शौचालय में भी लाइट नहीं थी और गंदा इतना था कि अंदर जाया भी नहीं जा सकें। तो s-2 के ट्वालेट को देखा मैंने, गंदा तो वह भी था लेकिन किसी तरह यूजकर मैं बाहर आ पायी । पानी वहां भी नहीं था और अपने सीट तक आते आते मेरे मन में डर बना हुआ था कि मेरे चप्पल से शौचालय का गंदा कही सीट तक तो नहीं पहुंच गया।

सुबह पता चला, पानी की व्यवस्था मेरी शिकायत के बाद देर रात कर दी गयी। शौचालय भी कामचलाऊ बना दिया गया और उसके गेट के बाहर तक फैले लेट्रिन को साफ कर दिया गया।

इन सब बातों को बताने का एक मुख्य उद्देश्य कि आप चाहे स्लीपर से सफर करें या एसी से..हम सभी को अपने अधिकार का पता होना चाहिए। मेरे ख्याल से एसी सीट यूज करने वाले लोग इसलिए नहीं अच्छे कि वे सफर पर अधिक पैसा खर्च करते हैं बल्कि इसलिए अच्छे कि वे अधिक जागरूक है और अगर वे पैसा खर्च करते हैं तो उसी अनुपात में सुविधाएँ भी चाहते हैं, उसके लिए आवाज उठाते हैं तो उन्हें सभी जरूरी सुविधाएं मिलती है।
अच्छी बात है लेकिन अपने अधिकार के प्रति जागरूक.. स्लीपर वाले यात्री को भी होना चाहिए। तभी उन्हें भी जरूरी सुविधाएँ मिलेगी।

#कुलीना कुमारी, 7-7-2019

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