नजरा गैली गुइयाँ
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चंचल
अलविदा शारदा सिन्हा जी ! बहुत याद आयेंगी , बहुमुखी आयाम की चर्चा होगी जब हिंदी की सहोदर भाषाओं के बसावट का ईमानदारी से इतिहास लिखा जाएगा । पीढ़ियाँ लंबी साँस लेकर आह भरेंगी जब साक्ष्य की तलाश होगी तो वहाँ एक विदुषी मुस्कुराती मिलेंगी शारदा सिन्हा । बड़ी बहस चलेगी । कल – बड़ी आस्था का पूजन पर्व छठ की पूर्व संध्या पर , हमेशा के विदा हो रही शारदा जी ने छठ गीत जारी किया , यह भी उनका एक आयाम आएगा यह बताने कि आस्था और और उसका बखान किस कदर , इस गायिका का एक अनूठा जज़्बा रहा । जब तक छठ पर्व जिंदा रहेगा , लोग अहंकार को तिलांजलि देकर पर सिर पर दौरी – दौरा लिए सूर्य को अर्घ देने जलधार की तरफ़ कदम बढ़ायेंगे , उनका मन घूम कर इस विदुषी महिला की तरफ़ बढ़ेगा जिन्हें इतिहास शारदा सिन्हा कह रहा है , इनका वो जज़्बा वहाँ दर्ज मिलेगा साफ़ हर्फ़ में – एक छठ वो भी रही जब मृत्युशैया पर लेटी शारदा सिन्हा का मन बस एक जगह थिर था , छठ । और आख़िरी ख्वाहिश बना छठ गीत । लेकिन शारदा सिन्हा बड़ी लंबी उम्र जियेंगीं क्यों कि उनकी शख़्सियत केवल गीत तक महदूद नहीं है वे और भी बहुत आयाम की मालकिन हैं । हिंदी और इसकी सहोदर भाषाओं भोजपुरी , मैथिली आदि समेत भाषाओं से विलुप्त हो रहे / हो चुके शब्दों की एक विशाल शब्द संपदा भी शारदा सिन्हा के गीतों में सुरक्षित मिलेगा । अपनी मादरी जुबान से दलिद्दर हो चुकी पीढ़ियाँ जब अपनी जुबान टटोलेंगे तो उन्हें शारदा सिन्हा के पास जाना ही होगा –
“पटना से बैदा बुलाय द , नजरा गैली गुइयाँ “
“रोय रोय पतिया लिखे रज मनिया “
या शारदा सिन्हा का कोई भी गीत उठायेंगे , समूचेकायनात में ये विलुप्त शब्द हाजिर मिलेंगे । इतना ही नहीं कि शारदा सिन्हा के गीत हमे शब्दों का जखीरा देकर जा रही हैं , इन शब्दों की पगडंडी एक बीते जमाने का इतिहास भी दिखाता है , समाज का इतिहास , अभाव का अर्थशास्त्र , दरबदर होते समाज की मजबूरी , सब मिलेगा । बटोही टोकेंगा –
– रिकाड बजाओ रिकाड़ , शारदा सिन्हा का !
“बताव चाँद केकरा से , कहाँ मिले जाला “ बज रहा है ।
विनम्र श्रद्धांजली
